धर्म और संस्कार पुरुषार्थ के ही परिणाम हैं – आचार्य श्री सुबल सागर महाराज
सिरौल आदित्यपुरम दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे प्रवचनों में आचार्यश्री ने दिया जीवन को सार्थक बनाने का संदेश
ग्वालियर, मध्यप्रदेश: सिरौल स्थित आदित्यपुरम दिगंबर आदिनाथ जैन मंदिर में चल रहे आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ससंघ के प्रवचनों में शुक्रवार को श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या उमड़ी। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने कहा कि “धर्म और संस्कार पुरुषार्थ के ही परिणाम हैं”। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य जीवन में सफलता, शांति और मोक्ष की प्राप्ति केवल पुरुषार्थ के माध्यम से ही संभव है।
आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में निरंतर पुण्य पुरुषार्थ करना चाहिए। पुरुषार्थ का अर्थ केवल परिश्रम नहीं, बल्कि संयम, सदाचार और आत्म-विकास की दिशा में निरंतर प्रयास करना है। जब व्यक्ति धर्ममार्ग पर चलता है, तो उसके जीवन में अच्छे संस्कार और सद्गुणों का विकास होता है, जिससे जीवन धन्य बन जाता है।
मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक है पुरुषार्थ
आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि “पुरुषार्थ से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।” उन्होंने बताया कि मोक्ष का अर्थ है आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करना, और यह तभी संभव है जब व्यक्ति अपने विचार, आचरण और व्यवहार में शुद्धता लाए।
उन्होंने कहा –
“मनुष्य जीवन पाकर यदि पुण्य पुरुषार्थ नहीं किया, तो यह जीवन व्यर्थ हो जाता है। पुरुषार्थ का फल अवश्य मिलता है, चाहे देर से ही क्यों न मिले।”
आचार्यश्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे अपने कर्मों के माध्यम से आत्म-कल्याण करें और दूसरों के जीवन में भी सकारात्मकता व कल्याण लाने का प्रयास करें। यही जीवन को सार्थक बनाने का सर्वोच्च मार्ग है।
गलत विचार और कड़वी वाणी से बढ़ता है दुख
धर्मसभा के दौरान आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गलत आचरण, गलत विचार और कड़वी वाणी ही व्यक्ति के दुख का कारण बनती है।
उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपने विचारों को शुद्ध रखना चाहिए, क्योंकि विचार ही कर्म और परिणाम का आधार हैं।
“जो व्यक्ति अपनी वाणी और आचरण को मधुर रखता है, वही शांति और आनंद प्राप्त करता है।”
आचार्यश्री ने यह भी कहा कि दूसरों का कल्याण करने वाले ही वास्तव में सार्थक जीवन जीते हैं। सत्य के प्रति निष्ठा और आचरण से ही व्यक्ति को सत्य की अनुभूति होती है।
प्रभु, गुरु और माता-पिता के अनुसार जीवन जीने से बनता है सदाचारी
आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने बताया कि प्रभु, गुरु और माता-पिता के बताए मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति सदाचारी बनता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में यदि व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी और निष्ठा से करता है, तो समाज में उसे सम्मान प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है।
आदित्यपुरम जैन मंदिर में हुआ आचार्यश्री का मंगल प्रवेश
प्रवचन के पूर्व आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ससंघ के चरणों में जैन समाज के अनेक श्रद्धालुओं ने श्रीफल चढ़ाकर आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख श्रद्धालुओं में –
सौरभ जैन, गौरव जैन, डॉ. संजय जैन, राजेश जैन, रविन्द्र जैन, विकास जैन, विवेक जैन, वीरेंद्र बाबा, प्रमोद जैन आदि शामिल रहे।
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने जानकारी दी कि आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ससंघ 11 अक्टूबर (शनिवार) को सुबह 6 बजे पदविहार कर आदित्यपुरम से रेसकोस रोड स्थित केशरबाग अपार्टमेंट की ओर प्रस्थान करेंगे।
वहां सुबह 8 बजे मंगल प्रवेश होगा और 8:30 बजे से प्रवचन प्रारंभ होंगे। जैन समाज द्वारा इस अवसर पर भव्य स्वागत व धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
धर्म, संयम और पुरुषार्थ का संदेश
आचार्य श्री ने प्रवचन के अंत में कहा कि धर्म केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला है। जब व्यक्ति अपने भीतर संयम, करुणा, और सत्य का भाव जगाता है, तभी धर्म साकार होता है।
उन्होंने कहा –
“पुरुषार्थ का अर्थ केवल संसारिक सफलता नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है। जब व्यक्ति अपने कर्मों को नियंत्रित करता है, तो वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।”
आचार्यश्री के इन प्रवचनों ने जैन समाज के साथ-साथ अन्य धर्मावलंबियों के बीच भी गहरा प्रभाव छोड़ा। उपस्थित श्रद्धालु आचार्यश्री के विचारों से प्रभावित होकर धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।
मुख्य संदेश
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पुरुषार्थ से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
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धर्म और संस्कार, पुरुषार्थ के ही परिणाम हैं।
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गलत विचार, गलत आचरण और कड़वी वाणी व्यक्ति के दुख का कारण बनती है।
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प्रभु, गुरु और माता-पिता के अनुसार जीवन जीने वाला ही सदाचारी कहलाता है।
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दूसरों का कल्याण ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।



