“अपनी इच्छाओं को कम कर प्रकृति का संरक्षण करें” — Padma Priya, मुख्य वन संरक्षक, इंदौर
इंदौर, 5 जून। विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के कृषि एवं ग्राम विकास प्रभाग द्वारा ज्ञानशिखर ओमशांति भवन में “प्रकृति संरक्षण–जीवन संरक्षण” विषय पर एक विस्तृत एवं विचारोत्तेजक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश की मुख्य वन संरक्षक Padma Priya ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए पर्यावरण संरक्षण, मानव व्यवहार और प्रकृति के बीच बढ़ते असंतुलन पर गहन विचार व्यक्त किए।
मानव जीवन और प्रकृति के बीच बढ़ता असंतुलन
मुख्य वन संरक्षक Padma Priya ने अपने संबोधन में कहा कि आज मानव सभ्यता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां यह प्रश्न गंभीर रूप से खड़ा हो गया है कि क्या आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध वायु, स्वच्छ जल और सुरक्षित भोजन उपलब्ध हो पाएगा या नहीं। उन्होंने कहा कि यह केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि मानव अस्तित्व का संकट बनता जा रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पृथ्वी पर सभी जीवों में केवल मनुष्य ही ऐसी प्रजाति है जिसकी इच्छाएं और लालच सीमित नहीं रहते। मनुष्य भविष्य को सुरक्षित करने के नाम पर आवश्यकता से अधिक संग्रह करता है, जिससे प्रकृति पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है। इसी प्रवृत्ति के कारण जंगलों का विनाश, जल स्रोतों का क्षय और जैव विविधता का नुकसान लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि विकास और उपभोग के बीच संतुलन न होने के कारण जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और प्राकृतिक आपदाएं अब सामान्य घटनाएं बनती जा रही हैं, जो मानव जीवन के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
समाधान की दिशा: 3R सिद्धांत और जीवनशैली परिवर्तन
पद्म प्रिया ने अपने संबोधन में कहा कि भले ही हम प्रकृति को पहले जैसी स्थिति में वापस नहीं ला सकते, लेकिन हम अपनी आदतों में बदलाव लाकर नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से 3R सिद्धांत—Reduce (कम करें), Reuse (पुनः उपयोग करें) और Recycle (पुनर्चक्रण करें)—को जीवन में अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक नागरिक अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले, तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव काफी कम हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि “इच्छाओं को सीमित करना ही असली पर्यावरण संरक्षण है।” यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में संतुलन स्थापित कर ले, तो पृथ्वी पर पर्यावरणीय संकट को नियंत्रित किया जा सकता है।

समाज में जागरूकता की आवश्यकता
इंदौर जोन की क्षेत्रीय निदेशिका ब्रह्माकुमारी हेमलता दीदी ने कार्यक्रम में कहा कि प्रकृति ने मानव को बिना किसी कीमत के सब कुछ दिया है—वायु, जल, भूमि, वृक्ष और जीवन के सभी संसाधन। लेकिन मनुष्य ने इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर उन्हें संकट में डाल दिया है।
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज सामूहिक रूप से जागरूक हो और छोटे-छोटे प्रयासों से बड़े परिवर्तन की शुरुआत करे। उन्होंने विशेष रूप से प्लास्टिक के उपयोग में कमी लाने, पानी की बचत करने और बिजली के अनावश्यक उपयोग को रोकने की अपील की।
उन्होंने कहा कि यदि हर घर में एक छोटा-सा “ग्रीन कॉर्नर” या गृह वाटिका बनाई जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसके साथ ही उन्होंने हर वर्ष कम से कम एक पेड़ लगाने का संकल्प लेने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मानसिक प्रदूषण और पर्यावरण का संबंध
धमतरी (छत्तीसगढ़) से पधारी कृषि एवं ग्राम विकास प्रभाग की जोनल कोऑर्डिनेटर ब्रह्माकुमारी सरिता दीदी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि प्रकृति और मनुष्य दोनों परमात्मा की रचना हैं, लेकिन वर्तमान समय में मनुष्य का मन लोभ, क्रोध और मोह जैसे विकारों से प्रभावित हो गया है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य का मन अशुद्ध होता है, तो उसका प्रभाव उसके कर्मों और पर्यावरण पर भी पड़ता है। यही कारण है कि आज प्राकृतिक आपदाएं, बीमारियां और पर्यावरणीय संकट बढ़ते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी प्रदूषण ही नहीं, बल्कि मानसिक प्रदूषण भी पर्यावरण संकट का बड़ा कारण है। यदि मनुष्य अपने विचारों को शुद्ध कर ले, तो उसका सीधा प्रभाव प्रकृति पर सकारात्मक रूप से पड़ता है।
उन्होंने राजयोग मेडिटेशन को मानसिक शुद्धिकरण का सशक्त माध्यम बताया और कहा कि इसके अभ्यास से व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा विकसित होती है, जो पर्यावरण संतुलन में सहायक होती है।
इसके साथ ही उन्होंने “शाश्वत योगिक खेती” की अवधारणा को भी विस्तार से समझाया और बताया कि किस प्रकार आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ कृषि करने से भूमि की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बेहतर हो सकते हैं।
विकास बनाम पर्यावरण: एक गंभीर बहस
CERPD के अध्यक्ष एवं समाजसेवी डॉ. अनिल भंडारी ने अपने संबोधन में कहा कि आज विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है। शहरों में कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं, जबकि वास्तविक हरियाली लगातार कम होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि इसका सीधा प्रभाव जल स्रोतों पर पड़ रहा है। भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और शुद्ध पेयजल की समस्या गंभीर होती जा रही है। साथ ही उद्योगों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को और बढ़ा रहा है।
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि विकास की परिभाषा को दोबारा परिभाषित किया जाए और पर्यावरण संरक्षण को विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।

कृषि क्षेत्र में पर्यावरणीय चुनौतियां
इंदौर कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी सत्यनारायण जाट ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है। उन्होंने बताया कि भूमि धीरे-धीरे कठोर और बंजर होती जा रही है।
उन्होंने पराली जलाने की समस्या पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे मिट्टी के सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, जो कृषि उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे प्राकृतिक खेती और जैविक विकल्पों को अपनाएं ताकि मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहे और पर्यावरण संतुलन भी सुरक्षित रहे।
स्वास्थ्य और पर्यावरण का गहरा संबंध
V1 हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. ए.एल. शर्मा ने कहा कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य मानसिक रूप से शुद्ध और संतुलित होता है, तो उसका व्यवहार भी प्रकृति के प्रति सकारात्मक होता है।
उन्होंने राजयोग अभ्यास को मानसिक शांति और संतुलन का साधन बताया और कहा कि इससे लोभ, क्रोध और तनाव कम होता है, जिससे पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है।
कार्यक्रम की प्रमुख गतिविधियां
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ की गई, जिसमें सभी अतिथियों ने मिलकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसके बाद सामूहिक रूप से पौधारोपण किया गया, जो कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा।
ब्रह्माकुमारी देवमणि बहन ने उपस्थित सभी लोगों को पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई, जिसमें सभी ने अपने जीवन में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लिया।
इसके बाद ब्रह्माकुमार आशीष भाई ने प्रेरक नारों के माध्यम से सभी को जागरूक किया और वातावरण को ऊर्जावान बनाया।
कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. प्रज्ञा टावरी द्वारा किया गया, जबकि ब्रह्माकुमारी उषा बहन ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

निष्कर्ष: छोटे कदम, बड़ा बदलाव
यह सेमिनार केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामाजिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण प्रयास था। इसमें यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा।
यदि मानव अपनी इच्छाओं को सीमित कर ले, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे, तो पर्यावरण संतुलन को पुनः स्थापित किया जा सकता है।
