प्राइवेट शिक्षक भी शिक्षक हैं—सम्मान उनका अधिकार, एहसान नहीं
संवाददाता: मनोज जैन नायक
आज के दौर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा अक्सर सरकारी और निजी विद्यालयों की तुलना तक सीमित रह जाती है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को जहां सामान्य तौर पर सामाजिक सम्मान और स्थायित्व प्राप्त होता है, वहीं निजी विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को कई बार उनकी मेहनत और योग्यता के अनुरूप सम्मान नहीं मिल पाता। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी शिक्षक का मूल्य केवल इस आधार पर तय होना चाहिए कि वह सरकारी संस्था में पढ़ाता है या निजी संस्था में?
शिक्षक चाहे सरकारी विद्यालय में पढ़ा रहा हो या निजी स्कूल में, उसका मूल कार्य विद्यार्थियों को ज्ञान देना, उनके व्यक्तित्व का निर्माण करना और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करना है। इसलिए शिक्षक के पद, संस्थान और वेतन से अधिक महत्वपूर्ण उसका ज्ञान, समर्पण और विद्यार्थियों के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए।
क्या प्राइवेट शिक्षक होना कम सम्मान की बात है?
मैं स्वयं एक प्राइवेट शिक्षिका हूं। हाल ही में एक भरी सभा में एक ऐसा अनुभव हुआ, जिसने मुझे भीतर तक सोचने पर मजबूर कर दिया। ऐसा महसूस हुआ जैसे निजी विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक का कोई अलग अस्तित्व ही नहीं माना जा रहा हो।
उस अनुभव ने मन में एक सवाल पैदा किया—क्या प्राइवेट शिक्षक की शिक्षा अधूरी है या समाज की सोच अधूरी है?
कुछ समय पहले स्कूल जाते समय रास्ते में अपने पुराने शिक्षक से मुलाकात हुई। वे सरकारी शिक्षक थे। उन्होंने सहजता से पूछा, “क्या करती हो बेटा?” मैंने बताया कि मैं स्कूल में पढ़ाती हूं। उन्होंने आगे पूछा, “सरकारी स्कूल में?”
जब मैंने कहा कि मैं निजी स्कूल में पढ़ाती हूं, तो उन्होंने अगला सवाल किया, “कितने पैसे मिलते हैं?” इसके बाद उन्होंने अपने अनुमान से पांच या दस हजार रुपये की बात कही। उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली सहज मुस्कान ने मुझे भीतर तक सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
उस दिन मन में कई सवाल उठे—क्या प्राइवेट शिक्षक होना कोई कमी है? क्या कम वेतन मिलने से किसी शिक्षक की योग्यता कम हो जाती है? क्या निजी स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक कम ज्ञान रखता है?
शिक्षक की पहचान वेतन से नहीं होती
किसी व्यक्ति की कम आय को उसकी योग्यता का पैमाना मानना उचित नहीं है। आर्थिक परिस्थितियां किसी व्यक्ति की काबिलियत तय नहीं करतीं। खासतौर पर शिक्षक के मामले में उसकी पहचान उसके वेतन से नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों के भविष्य से होनी चाहिए।
एक प्राइवेट शिक्षक भी हर सुबह समय पर विद्यालय पहुंचता है। वह विद्यार्थियों को पढ़ाता है, उनकी गलतियां सुधारता है, उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करता है, उनकी परेशानियां सुनता है और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
कई निजी शिक्षक सीमित वेतन और संसाधनों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं। वे केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करते, बल्कि बच्चों में अनुशासन, संस्कार, आत्मविश्वास और मेहनत की भावना विकसित करने का भी प्रयास करते हैं।
क्या प्राइवेट स्कूलों में पढ़े बच्चे आगे नहीं बढ़ते?
यदि निजी विद्यालयों के शिक्षक और उनकी शिक्षा इतनी कमतर होती, तो क्या समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए प्रेरित होते?
आज निजी विद्यालयों से पढ़कर निकलने वाले अनेक विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, वैज्ञानिक, शिक्षक, उद्यमी और विभिन्न क्षेत्रों में सफल पेशेवर बन रहे हैं। इन विद्यार्थियों की सफलता में उनके माता-पिता के साथ-साथ उनके शिक्षकों की मेहनत और मार्गदर्शन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
किसी विद्यार्थी की सफलता के पीछे केवल एक शिक्षक का योगदान नहीं होता, लेकिन जिस शिक्षक ने उसे किसी विषय को समझने, प्रश्न पूछने और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया, उसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सरकारी और प्राइवेट शिक्षक में अंतर केवल नौकरी का है
सरकारी और निजी विद्यालयों की व्यवस्था अलग हो सकती है। दोनों संस्थानों में वेतन, सेवा शर्तें और सुविधाएं अलग हो सकती हैं। लेकिन शिक्षक का मूल उद्देश्य समान है—विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देना।
सरकारी शिक्षक भी बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत करता है और प्राइवेट शिक्षक भी। एक शिक्षक सरकारी विद्यालय में हो या निजी विद्यालय में, जब वह कक्षा में प्रवेश करता है तो उसके सामने बच्चे होते हैं, जिनके सपने और भविष्य उसके सामने होते हैं।
इसलिए शिक्षक की सामाजिक प्रतिष्ठा केवल उसके नियुक्ति पत्र पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
प्राइवेट शिक्षकों की चुनौतियों को समझना होगा
निजी विद्यालयों में काम करने वाले कई शिक्षकों के सामने रोजगार की अस्थिरता, सीमित वेतन, अतिरिक्त कार्य और लंबे समय तक काम करने जैसी चुनौतियां होती हैं। इसके बावजूद वे अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने में पूरी मेहनत करते हैं।
कई बार शिक्षक को विद्यालय की शैक्षणिक जिम्मेदारियों के साथ परीक्षा, रिकॉर्ड, कार्यक्रम, अभिभावक बैठक और अन्य गतिविधियों में भी योगदान देना पड़ता है। इन सभी जिम्मेदारियों के बीच बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास जारी रहता है।
समाज को इन चुनौतियों को समझने की आवश्यकता है। प्राइवेट शिक्षक को केवल इसलिए कमतर नहीं समझना चाहिए क्योंकि वह सरकारी सेवा में नहीं है।
शिक्षक की असली पहचान विद्यार्थियों की सफलता है
किसी शिक्षक से यह पूछने के बजाय कि वह कितना कमाता है, यह पूछा जाना चाहिए कि उसके विद्यार्थी क्या सीख रहे हैं। उसकी तनख्वाह देखने के बजाय उसके विद्यार्थियों की आंखों में उसके लिए सम्मान देखना चाहिए।
हो सकता है कि आज कोई शिक्षक किसी छोटे से निजी विद्यालय में सीमित संसाधनों के बीच पढ़ा रहा हो। लेकिन उसके द्वारा पढ़ाया गया कोई बच्चा भविष्य में डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, वैज्ञानिक या एक जिम्मेदार नागरिक बने। उस सफलता की नींव रखने में उस शिक्षक की मेहनत भी शामिल हो सकती है।
शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार उसके विद्यार्थियों की सफलता और सम्मान है।
“मेरी नौकरी छोटी हो सकती है, सपने नहीं”
मैं आज भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती हूं—
“हां, मैं एक प्राइवेट शिक्षिका हूं। मेरी नौकरी शायद छोटी हो सकती है, मेरी तनख्वाह शायद कम हो सकती है, लेकिन मेरे सपने छोटे नहीं हैं। मेरी मेहनत छोटी नहीं है और मेरे विद्यार्थियों का भविष्य छोटा नहीं है।”
यह केवल एक शिक्षिका की व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि उन हजारों निजी शिक्षकों की आवाज है जो सीमित संसाधनों में भी शिक्षा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
समाज को बदलनी होगी अपनी सोच
आज जरूरत इस बात की है कि हम शिक्षक को उसके संस्थान के नाम से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और कर्म से पहचानें। सरकारी या निजी होना नौकरी की व्यवस्था का हिस्सा है, शिक्षक की योग्यता का प्रमाण नहीं।
किसी शिक्षक की कम कमाई देखकर उसकी क्षमता का अनुमान लगाना सामाजिक रूप से भी उचित नहीं है। सम्मान हर उस व्यक्ति का अधिकार है जो ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है।
शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता, भविष्य गढ़ता है
शिक्षक का काम केवल किताब के अध्याय पूरे करना नहीं है। शिक्षक बच्चों में सोचने की क्षमता, सही निर्णय लेने का साहस, अनुशासन, संवेदनशीलता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है।
इसलिए शिक्षक की पहचान उसके पद, वेतन या विद्यालय के नाम से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, व्यवहार, ज्ञान और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले प्रभाव से होनी चाहिए।
आज सवाल केवल प्राइवेट शिक्षकों के सम्मान का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच का है। यदि कोई शिक्षक बच्चों को ज्ञान, संस्कार और सपने दे रहा है तो उसकी शिक्षा अधूरी कैसे हो सकती है?
शायद शिक्षा अधूरी नहीं है, बल्कि उसे देखने वाली हमारी सोच अधूरी है।
आइए, शिक्षक को उसकी नौकरी के नाम से नहीं, उसके ज्ञान से पहचानें। उसकी तनख्वाह से नहीं, उसके समर्पण से पहचानें। क्योंकि शिक्षक चाहे सरकारी हो या प्राइवेट—वह केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य गढ़ता है।
भाव लेखिका: कुमकुम जैन
