पक्खी पर्व की आराधना के अवसर पर थांदला में 90 वर्षितप आराधकों के पारणे सम्पन्न हुए। साध्वी निखिलशीलाजी ने क्रोध पर नियंत्रण, संयम और आत्मकल्याण का संदेश दिया।
पक्खी पर्व की आराधना में 90 वर्षितप आराधकों के पारणे सम्पन्न, साध्वी निखिलशीलाजी ने क्रोध पर नियंत्रण का दिया संदेश
थांदला। पक्खी पर्व की आराधना के पावन अवसर पर थांदला में धर्ममय वातावरण के बीच वर्षितप आराधकों एवं पक्खी मण्डल तपस्वियों के पारणे सम्पन्न हुए। श्वेतांबर जैन स्थानकवासी परंपरा में पक्खी पर्व को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है और इसी क्रम में जिन शासन गौरव जैनाचार्य पूज्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. “अणु” की दिव्य कृपा से बुद्धपुत्र प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेन्द्रमुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा. आदि ठाणा-4 के पावन सानिध्य में भव्य धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ।
पक्खी पर्व की आराधना का महत्व
पक्खी पर्व की आराधना जिन शासन में आत्मशुद्धि एवं कर्म निर्जरा का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है। धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा. ने कहा कि विशेष तिथियां जीव को अपने कर्मों का परिमार्जन करने और आत्मा को निर्मल बनाने का अवसर प्रदान करती हैं। धर्म आराधना के माध्यम से जीव आगामी भव को सुरक्षित और श्रेष्ठ बना सकता है।उन्होंने भगवान महावीर स्वामी की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीव कषायों के कारण अनादिकाल से संसार में भटक रहा है।
साध्वी निखिलशीलाजी ने बताया क्रोध का वास्तविक स्वरूप
पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा. ने कहा कि आवेशात्मक भाव ही क्रोध है। जब मनुष्य क्रोध के प्रभाव में आता है तो उसका विवेक समाप्त हो जाता है और उसकी बुद्धि मलिन हो जाती है।उन्होंने कहा कि क्रोध मनुष्य के जीवन में अशांति और विनाश का कारण बनता है। क्रोधी व्यक्ति अक्सर अपने व्यवहार को उचित ठहराने का प्रयास करता है और दूसरों को कटु वचन कहकर स्वयं को सही मानता है।
पूज्या श्री ने कहा कि कई बार व्यक्ति स्वार्थ या रागवश चुप तो हो जाता है, लेकिन उसके भीतर क्रोध बना रहता है। यह क्रोध को निष्फल करने का उचित उपाय नहीं है।
क्रोध पर विजय पाने के प्रभावशाली उपाय
पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा. ने क्रोध पर नियंत्रण के अनेक आध्यात्मिक उपाय बताते हुए कहा कि—
- क्रोध उत्पन्न करने वाले विषयों से दूरी रखें।
- क्रोध के दुष्परिणामों पर विचार करें।
- धैर्य और संयम का अभ्यास करें।
- दृढ़ संकल्प शक्ति विकसित करें।
- सामने वाले की मनःस्थिति को समझने का प्रयास करें।
- वृद्धावस्था में विशेष रूप से सहनशीलता अपनाएं।
उन्होंने कहा कि इन उपायों से व्यक्ति क्रोध को निष्फल कर आत्मिक शांति प्राप्त कर सकता है।
प्रियशीलाजी म.सा. ने बताया सत्य और जिनमत का महत्व
इस अवसर पर पूज्या श्री प्रियशीलाजी म.सा. ने चेलना चारित्र के माध्यम से राजा श्रेणिक के बौद्धमत का खंडन और जिनमत का मंडन प्रस्तुत किया।उन्होंने कहा कि जिस प्रकार शुद्ध स्वर्ण हर कसौटी पर खरा उतरता है, उसी प्रकार सत्य भी हर परिस्थिति में सत्य ही रहता है।राग-द्वेष से रहित आत्माओं के कथन त्रिकाल सत्य होते हैं। ऐसे वीतराग वचनों के माध्यम से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है और कर्म बंधनों से मुक्त होने का मार्ग प्राप्त करती है।
तप आराधकों ने ग्रहण किए विभिन्न तप
पक्खी पर्व की आराधना के दौरान अनेक तपस्वियों ने विभिन्न तपों के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
इनमें प्रमुख रूप से—
- उपवास
- आयम्बिल
- निवि
- एकासन
- बियासन
जैसी तप आराधनाएं शामिल रहीं।सभा का संचालन संघ मंत्री हितेश शाह ने किया।
90 वर्षितप आराधकों सहित तपस्वियों के पारणे सम्पन्न
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं प्रवक्ता पवन नाहर ने जानकारी देते हुए बताया कि इस वर्ष पक्खी पर्व पर संघ में चल रहे 90 वर्षितप आराधकों के साथ पक्खी मण्डल तपस्वियों ने भी उपवास तप की आराधना की।धर्ममय वातावरण में सभी तपस्वियों के पारणे अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न हुए।
शाहजी परिवार ने लिया तप अनुमोदना का लाभ
सभी तपस्वियों के पारणे का लाभ श्रीसंघ के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय मांगीलाल शाहजी की धर्मपत्नी स्वर्गीय श्रीमती संपतबाई शाहजी की पुण्य स्मृति में श्रीसंघ के कोषाध्यक्ष रजनीकांत शाह, शांता शाह, आशिष शाह, भूमि शाह, पार्श्वी शाह एवं समस्त शाहजी परिवार ने लिया।शाहजी परिवार द्वारा तपस्वियों का तिलक निकालकर प्रभावना भी प्रदान की गई तथा तप अनुमोदना करते हुए धर्मलाभ प्राप्त किया।
