‘हथियार सौंपना चाहते हैं’: हिडमा के खात्मे के बाद सरेंडर मोड में नक्सली, महाराष्ट्र CM को लिखी चिट्ठी
नक्सल मोर्चे पर बड़ा बदलाव: हिडमा के खात्मे के बाद नक्सलियों के सुर बदले
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सरहद पर सुरक्षा बलों की लगातार दबाव नीति और हाल ही में टॉप नक्सली कमांडर हिडमा के खात्मे के बाद अब माओवादी संगठन में हलचल तेज हो गई है। पहली बार नक्सली संगठनों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर सरेंडर की इच्छा जताई है, जिसे सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नक्सलियों द्वारा वर्षों बाद किसी राज्य के शीर्ष पदाधिकारी को इस तरह का पत्र लिखना इस बात का संकेत है कि अब जंगलों में सक्रिय संगठन की कमर टूटने लगी है और उसके काडर में असुरक्षा बढ़ रही है।
हिडमा के खात्मे से नक्सलियों की बड़ी चोट
हाल ही में छत्तीसगढ़ पुलिस और सुरक्षाबलों की संयुक्त कार्रवाई में कुख्यात नक्सली नेता हिडमा उर्फ देवा को मार गिराया गया था। हिडमा बस्तर में नक्सलियों की सबसे हिंसक टुकड़ी पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का चीफ था और कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता था।
हिडमा से जुड़े प्रमुख हमले
- 2010 दंतेवाड़ा हमले में 76 जवानों की शहादत
- 2013 झीरम घाटी हमला
- कई आईईडी धमाके और एम्बुश
- बस्तर और गढ़चिरौली क्षेत्रों में आतंक का नेटवर्क
हिडमा की मौत के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने इसे नक्सलियों की रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक क्षमता पर एक बहुत बड़ी चोट बताया था। अब इसी का असर नक्सल इलाकों में साफ दिखने लगा है।
महाराष्ट्र मुख्यमंत्री को नक्सलियों की चिट्ठी—क्या लिखा है?
सूत्रों के अनुसार गढ़चिरौली क्षेत्र में सक्रिय माओवादी कमांडरों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को गोपनीय पत्र भेजकर कहा है कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं और हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं।
चिट्ठी में नक्सलियों ने कुछ मांगें और शर्तें भी रखी हैं—
चिट्ठी में प्रमुख बिंदु
- सुरक्षित सरेंडर प्रक्रिया की गारंटी
- पुलिस कार्रवाई से अस्थायी राहत
- पुनर्वास योजनाओं की पारदर्शिता
- संगठन छोड़ने वालों के परिवारों को सुरक्षा
- आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास पैकेज में सुधार
नक्सलियों ने दावा किया है कि हिडमा की मौत के बाद उनका मनोबल गिरा है और जंगलों में सुरक्षा बलों की तैनाती लगातार बढ़ रही है, जिससे उन्हें लगता है कि सशस्त्र संघर्ष अब पिछड़ रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति सफल—सरेंडर मोड में नक्सली
गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2025 के बीच नक्सल हिंसा में 70% से अधिक की कमी आई है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा सहित कई जिलों में सुरक्षा बलों की संयुक्त रणनीति ने माओवादी नेटवर्क को लगातार कमजोर किया है।
सरेंडर बढ़ने के कारण
- उच्च रैंक के नेताओं की मौत या गिरफ्तारी
- सुरक्षित सरेंडर नीति
- जंगलों में सुरक्षा बलों की बढ़ी उपस्थिति
- ग्रामीण क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की शुरुआत
- नक्सली आंतरिक विवाद और संसाधनों की कमी
विशेषज्ञों का मानना है कि हिडमा का खत्म होना नक्सल संरचना में टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है। उसके बाद माओवादी कैडर में डर और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
गढ़चिरौली और बस्तर: दो प्रमुख नक्सल फ्रंट दबाव में
गढ़चिरौली लंबे समय से महाराष्ट्र का सबसे संवेदनशील नक्सल क्षेत्र रहा है। यहां 90% से अधिक नक्सली गतिविधियां जंगल के पहाड़ी इलाकों में होती रही हैं।
सुरक्षा बलों ने न केवल ऑपरेशन तेज किया है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार भी किया है, जिससे नक्सलियों के लिए स्थानीय समर्थन तेजी से कम हुआ है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी विकास कार्य तेजी से बढ़े हैं। नक्सली कई गांवों में अपनी पकड़ खो रहे हैं।
नक्सलियों के आत्मसमर्पण के संकेत—क्या नया दौर शुरू हो रहा है?
विशेषज्ञों के अनुसार नक्सली आमतौर पर सरकारों को औपचारिक पत्र लिखकर बात नहीं करते। यह घटना बताती है कि हिडमा के खात्मे के बाद उन्हें भविष्य अंधकारमय लगने लगा है।
सरेंडर के लिए तैयार नक्सली अब अपनी जान बचाने और परिवार को सुरक्षित माहौल देने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
क्या आने वाले दिनों में बड़े सरेंडर होंगे?
सुरक्षा अधिकारी मानते हैं कि—
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आने वाले महीनों में 20 से 100 नक्सलियों का समूह सरेंडर करने की तैयारी कर सकता है।
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कई माओवादी दलम अब छोटे समूहों में बंट गए हैं।
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केंद्रीय एजेंसियां ऐसे संकेतों को गंभीरता से ले रही हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया: ‘मुख्यधारा में लौटने वालों का स्वागत’
महाराष्ट्र सरकार ने अब तक इस पत्र पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री कार्यालय ने पत्र की पुष्टि कर सुरक्षा विभाग से रिपोर्ट मांगी है।
राज्य सरकार का कहना है कि जो नक्सली हिंसा छोड़कर सामान्य जीवन अपनाना चाहते हैं, उनका स्वागत है, और उन्हें पुनर्वास योजना के तहत सभी सुविधाएं दी जाएंगी।
निष्कर्ष—हिडमा के बाद नक्सल मोर्चा कमजोर, अब शांति की दिशा में कदम?
हिडमा का खात्मा नक्सली संगठन के लिए केवल एक नेता की मौत नहीं, बल्कि उस कठोर मानसिक आधार का टूटना है जिस पर दशकों से नक्सलवाद की खूनी विचारधारा टिकी थी।
पहली बार नक्सलियों द्वारा मुख्यमंत्री को लिखी गई सरेंडर की चिट्ठी यह संकेत देती है कि आने वाले समय में पूरे बस्तर–गढ़चिरौली–गोंदिया बेल्ट में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ी तो जंगलों में वर्षों से छिपी हिंसा और असुरक्षा के बादलों के बीच पहली बार शांति की किरण दिखाई दे सकती है।


