नवकार महामंत्र से प्रभावित 34 जापानी नागरिक भारत में पर्यूषण पर्व की आराधना कर रहे हैं। मनोचिकित्सक चूरूसी मियाजावा ने बताया कि कैसे नवकार जाप ने उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया।
जापानियों के जीवन में नवकार मंत्र जाप ने लाया सकारात्मक परिवर्तन, 25 वर्षों से जापान में हो रही नवकार आराधना
दीपक जैन
मुंबई। नवकार महामंत्र की आराधना ने जापान के कई नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया है। जापान की मनोचिकित्सक चूरूसी मियाजावा के अनुसार नवकार महामंत्र के नियमित जाप से उन्हें असीम शांति और मानसिक स्थिरता का अनुभव हुआ। पिछले करीब 25 वर्षों से जापान में नवकार आराधना की जा रही है और अब जापान से आए 34 नागरिक भारत में जैन धर्म के पर्यूषण पर्व की आराधना में लीन हैं।
10 वर्ष की उम्र में जैन धर्म से प्रभावित हुईं चूरूसी मियाजावा
धाराप्रवाह हिंदी बोलने वाली जापान की मनोचिकित्सक चूरूसी मियाजावा बताती हैं कि वर्ष 2004 में महज 10 वर्ष की उम्र में भारत यात्रा के दौरान जैसलमेर के जैन मंदिरों और जैन धर्म की शिक्षाओं ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
जन्म से बौद्ध मियाजावा का कहना है कि जैन धर्म और त्रिस्तुतिक संघ नायक, गच्छाधिपति आचार्य जयंतसेन सूरीश्वरजी से उनका संबंध उन्हें किसी पुराने आध्यात्मिक रिश्ते जैसा महसूस होता है। उनका दावा है कि आचार्य के प्रत्यक्ष दर्शन से पहले ही वे उन्हें स्वप्न में देख चुकी थीं। जब पहली बार आचार्य के साक्षात दर्शन हुए तो वे स्वयं भी इस संयोग से आश्चर्यचकित रह गईं।
इसके बाद उनकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू हुई, जो आज तक जारी है। गुरुदेव से नवकार महामंत्र का अर्थ समझने के बाद उन्होंने जापान में इसके प्रचार-प्रसार का कार्य शुरू किया।
पर्यूषण पर्व की आराधना में जुटे 34 जापानी नागरिक
श्री त्रिस्तुतिक संघ में चातुर्मास हेतु विराजमान पुण्य सम्राट के शिष्य एवं प्रखर प्रवचनकार मुनिराज श्री निपुणरत्न विजयजी म.सा. के सानिध्य में 34 जापानी नागरिक जैन धर्म के पर्यूषण पर्व की आराधना में लीन हैं।
इनमें 9 पुरुष और 25 महिलाएं शामिल हैं। डॉक्टर, नर्स, बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ इंजीनियर और विद्यार्थी भी इस समूह का हिस्सा हैं।
जापान से भारत आकर जैन धर्म की साधना कर रहे इन लोगों का कहना है कि नवकार महामंत्र ने उनके जीवन की दिशा बदल दी है। पर्यूषण पर्व के दिनों में वे न केवल सभी नियमों का पालन कर रहे हैं, बल्कि स्वयं को मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों से भी दूर रख रहे हैं।
नवकार महामंत्र में व्यक्ति नहीं, गुणों की स्तुति
मियाजावा के अनुसार गुरुदेव से मिलने और नवकार महामंत्र को समझने के बाद उन्हें आभास हुआ कि यह जैन धर्म का सबसे पवित्र, सारगर्भित और अनादि मंत्र है। इसे नमस्कार मंत्र, पंच-नमस्कार मंत्र और मूल मंत्र भी कहा जाता है। यह किसी व्यक्ति की स्तुति नहीं, बल्कि गुणों की स्तुति है।
नवकार मंत्र का स्वरूप—
णमो अरिहंताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं।
एसो पंच णमोक्कारो,
सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं,
पढमं हवइ मंगलं।
मियाजावा कहती हैं कि इसका अर्थ पांच पदों को नमस्कार करना है। उनके अनुसार नवकार महामंत्र का जाप करने से उन्हें असीम शांति मिलती है।
पांच पदों का बताया महत्व
मियाजावा के अनुसार अरिहंत पद उन अरिहंतों को समर्पित है जिन्होंने क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी चार घाती कर्मों का नाश किया और जो मार्ग दिखाते हैं। सिद्ध वे हैं जिन्होंने सभी आठ कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया और सिद्धशिला पर विराजमान हैं।
आचार्य पद उन आचार्यों के लिए है जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हैं और साधु-साध्वियों को पालन कराते हैं। उपाध्याय जैन शास्त्रों का ज्ञान देते हैं और 11 अंग व 14 पूर्व के ज्ञाता माने जाते हैं। साधु संसार से विरक्त होकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलते हैं।
मियाजावा के अनुसार इसकी विशेषता यह है कि इसमें किसी व्यक्ति के नाम के बजाय पद और गुणों को वंदन किया जाता है। उनका कहना है कि किसी भी धर्म या जाति का व्यक्ति इन पांच पवित्र पदों को वंदन कर सकता है।
108 गुणों का प्रतीक है नवकार महामंत्र
मियाजावा बताती हैं कि नवकार महामंत्र में पांच पदों के कुल 108 गुणों को नमस्कार किया गया है। इनमें अरिहंत के 12, सिद्ध के 8, आचार्य के 36, उपाध्याय के 25 और साधु के 27 गुण बताए गए हैं। माला के 108 मनकों को भी इन्हीं गुणों का प्रतीक माना जाता है।
उनका कहना है कि नियमित नवकार जाप से मन में चल रहे विचार शांत होते हैं और यह उनके लिए ध्यान का माध्यम भी बना है। जैन धार्मिक मान्यता के अनुसार मंत्र को कर्म निर्जरा, राग-द्वेष में कमी और आध्यात्मिक कल्याण से भी जोड़ा जाता है।
मियाजावा बताती हैं कि गुरुजी से नवकार महामंत्र का अर्थ समझने के बाद उन्होंने जापान में इसके प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया। उन्होंने ‘नवकार महिमा’ का जापानी भाषा में अनुवाद भी किया है।
गुरु की सीख को जारी रखा : निपुणरत्न विजयजी
जयंतसेन सूरीश्वरजी के शिष्य मुनिराज श्री निपुणरत्न विजयजी कहते हैं कि गुरु के न होने पर भी इन जापानी नागरिकों का समर्पण भाव देखकर बहुत अच्छा लगता है कि वे उनके बताए मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन में गुरु का होना सौभाग्य है, लेकिन गुरु के शारीरिक रूप से न होने पर भी उनके प्रति समर्पण बनाए रखना ही सच्चे शिष्य की पहचान है। समर्पण शरीर से नहीं, आत्मा से होता है।
मुनिराज ने कहा कि खुशी है कि ये श्रद्धालु गुरु के बताए नियमों का पालन कर रहे हैं, उनके दिए मंत्र और शिक्षा को नहीं भूले हैं और उनके दिखाए मार्ग से भटक नहीं रहे। यही सच्चा समर्पण है। जैसे सूर्य बादलों के पीछे छिप जाने पर भी प्रकाश देना बंद नहीं करता, वैसे ही सच्चा शिष्य गुरु के दिखाई न देने पर भी उनकी सीख को नहीं छोड़ता।

