धार की ऐतिहासिक भोजशाला की Jain पहचान: राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ का आधिकारिक पक्ष
धार (मध्य प्रदेश):
धार स्थित ऐतिहासिक स्थल भोजशाला को लेकर राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने अपना आधिकारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। संघ के वरिष्ठ प्रतिनिधि राजेश जैन दद्दू और मयंक जैन ने बताया कि समाज के प्रतिष्ठित शोधकर्ता एवं समाजसेवी श्री सलेकचंद जी जैन ने वर्षों के शोध और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किया है कि भोजशाला मूलतः जैन धर्म और संस्कृति का हिस्सा है।
संघ ने शासन-प्रशासन से अपील की है कि इस पावन स्थल की जैन विरासत को संरक्षित किया जाए और इसके ऐतिहासिक महत्व को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाए। यह स्थल न केवल धार का बल्कि पूरे भारत के जैन समाज के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
ब्रिटिश म्यूजियम के प्रमाण
श्री सलेकचंद जी Jain के अनुसार, लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित अम्बिका देवी और जैन सरस्वती देवी की प्रतिमाएं, जिनमें 5 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं शामिल हैं, मूलतः धार स्थित भोजशाला से ही प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड में इन्हें “Jain प्रतिमा” के रूप में दर्ज किया गया है।
यह तथ्य स्पष्ट करता है कि भोजशाला केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं है, बल्कि यह जैन धर्म की प्राचीन और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। इसे सामान्य सांस्कृतिक स्थल के रूप में मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से गलत होगा।
ऐतिहासिक संदर्भ और विद्वानों का समर्थन
सलेकचंद जी जैन ने ब्रिटिश विद्वान फर्गुसन की पुस्तक ‘Indian Architecture’ और ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए गए दौरों का हवाला देते हुए यह सिद्ध किया कि भोजशाला का निर्माण जैन स्थापत्य और मंदिर परंपरा पर आधारित है।
स्थल पर पाए गए अवशेषों और स्थापत्य कला के प्रमाण यह दर्शाते हैं कि यह स्थल प्राचीन काल से जैन धार्मिक गतिविधियों और सांस्कृतिक आयोजन का केंद्र रहा है। यह स्थल जैन धर्म के इतिहास और स्थापत्य कला को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
भोजशाला में सर्वेक्षण और स्थापत्य पहचान
वर्तमान सर्वेक्षण में पाए गए अवशेषों के आधार पर सलेकचंद जी जैन ने निम्नलिखित विशेषताएं उजागर की हैं:
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प्राकृत शिलालेख:
भोजशाला में पाए गए शिलालेखों की भाषा प्राकृत है, जो जैन आगमों की पवित्र भाषा रही है। यह स्पष्ट रूप से इस स्थल की जैन पहचान को प्रमाणित करता है। -
तीर्थंकरों के लांछन:
शंख, कछुआ, अश्व और मकर जैसे प्रतीक स्पष्ट रूप से जैन तीर्थंकरों से जुड़े हैं। इन्हें केवल सांस्कृतिक प्रतीक मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से अनुचित होगा। -
कला और स्थापत्य:
भोजशाला में पाए गए शिल्प और स्तंभों की बनावट माउंट आबू के देलवाड़ा जैन मंदिरों जैसी है। इस स्थापत्य शैली से स्पष्ट होता है कि भोजशाला की पहचान जैन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई है।
राजेश जैन दद्दू ने पूरे जैन समाज से अपील की कि वे धरोहर के संरक्षण और जागरूकता फैलाने में सक्रिय योगदान दें। मयंक जैन ने कहा कि यद्यपि जैन और हिंदू समाज सदैव सहोदर रहे हैं, परंतु इस पावन भूमि की वास्तविक जैन पहचान को अक्षुण्ण रखना अनिवार्य है।
संघ का संदेश और समाज से अपील
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ का कहना है कि भोजशाला की जैन विरासत को संरक्षित करना केवल स्थानीय समाज के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के जैन समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संघ ने अपने संदेश में कहा:
“सलेकचंद जी जैन ने जिस निष्ठा और मेहनत से भोजशाला की जैन विरासत को संरक्षित करने का संकल्प लिया है, वह पूरे भारत के जैन समाज के लिए प्रेरणास्पद है। हमारी प्राचीन धरोहर के प्रति चुप रहना अन्याय होगा।”
संघ सभी जैन धर्मावलंबियों से अनुरोध करता है कि वे शांति और संवैधानिक तरीके से इस पावन स्थल की रक्षा में योगदान दें।
भोजशाला की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्वता
भोजशाला केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं है, बल्कि यह जैन धर्म और संस्कृति की पहचान का प्रतीक है।
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यह स्थल प्राचीन जैन मंदिरों और तीर्थंकरों के अवशेषों का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
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भोजशाला की स्थापत्य कला और शिल्प शैली जैन धर्म की प्राचीन परंपरा की झलक दिखाती है।
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यह स्थल जैन समाज के लिए धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
सलेकचंद जी Jain की भूमिका
श्री सलेकचंद जी Jain ने भोजशाला की जैन विरासत को बचाने और संरक्षित करने के लिए वर्षों तक शोध और प्रयास किए हैं। उनके प्रयास यह दिखाते हैं कि संरक्षण, जागरूकता और प्रमाण आधारित अध्ययन के माध्यम से प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है।
उनके शोध ने यह सिद्ध किया कि भोजशाला में पाए गए अवशेष और स्थापत्य शैली माउंट आबू के देलवाड़ा जैन मंदिरों से मिलती-जुलती है, जिससे इस स्थल की जैन पहचान और भी स्पष्ट होती है।
निष्कर्ष
धार की भोजशाला की जैन पहचान को प्रमाणित करना और उसकी सुरक्षा करना राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ और सलेकचंद जी जैन का प्रमुख उद्देश्य है। यह पहल न केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को जैन धर्म और स्थापत्य की प्राचीन धरोहर से परिचित कराती है।
संघ और सलेकचंद जी जैन का प्रयास यह संदेश देता है कि धरोहर का संरक्षण और जागरूकता फैलाना प्रत्येक जैन समाज सदस्य की जिम्मेदारी है।
