Indore मुनिश्री आदित्य सागर जी का संदेश इंदौर में धर्मसभा के दौरान गूंजा। उन्होंने कहा कि संत, पंथ और संघ के भेदभाव से जिन शासन बदनाम हो रहा है। जानिए पूरा प्रवचन और धर्मसभा की मुख्य बातें।
राजेश जैन दद्दू
इंदौर
मुनिश्री आदित्य सागर जी का संदेश: संत पंथ और संघ के भेदभाव से बचने का आह्वान
मुनिश्री आदित्य सागर जी का संदेश जैन समाज के लिए आत्ममंथन का विषय बन गया है।Indore के छत्रपति नगर स्थित दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय में आयोजित धर्मसभा में श्रुत संवेगी महाश्रमण आदित्य सागर जी महाराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज जैन समाज संत, पंथ और संघ के आधार पर बंटता जा रहा है, जबकि जैन धर्म का मूल सिद्धांत समता, श्रद्धा और सभी साधुओं के प्रति समान भाव रखना है।
उन्होंने कहा कि समाज प्रतिदिन “णमो लोए सव्ब साहूणम” का जाप करता है, जिसका अर्थ है लोक के सभी साधुओं को नमस्कार। लेकिन व्यवहार में कई लोग साधु को उसके संघ, पंथ या परंपरा के आधार पर सम्मान देते हैं। यह प्रवृत्ति जिन शासन की छवि को नुकसान पहुंचा रही है।
धर्मसभा में मुनिश्री आदित्य सागर जी का संदेश
Indore के छत्रपति नगर स्थित दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय में अपने तीन दिवसीय प्रवास के अंतिम दिन आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रुत संवेगी महाश्रमण मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज ने समाज को एकता और समरसता का संदेश दिया।उन्होंने कहा कि यदि कोई साधु आपकी मान्यताओं का नहीं है, तो भी उसके प्रति श्रद्धा का भाव होना चाहिए। साधु का मूल्यांकन संघ या पंथ के आधार पर नहीं बल्कि उसके संयम, तप और साधना के आधार पर होना चाहिए।
संत, पंथ और संघ के भेदभाव पर चिंता
मुनिश्री ने कहा कि आज समाज तेरापंथ, बीसपंथ या अन्य संघों के नाम पर विभाजित होता जा रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है।उन्होंने कहा—
“अपने भीतर संत, पंथ और संघ की सीमाओं से बाहर निकलो तथा णमो लोए सव्ब साहूणम के भाव के अनुसार सभी साधुओं को श्रद्धा के साथ नमस्कार करो।”
मुनिश्री ने स्पष्ट कहा कि साधुओं के प्रति भेदभाव और उपेक्षा का भाव व्यक्ति को पाप की ओर ले जाता है।
णमो लोए सव्ब साहूणम का वास्तविक अर्थ
मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को बताया कि नवकार मंत्र का प्रत्येक शब्द गहन आध्यात्मिक महत्व रखता है।“णमो लोए सव्ब साहूणम” का अर्थ केवल उच्चारण करना नहीं बल्कि उसके भावों को जीवन में उतारना है।यदि व्यक्ति सभी साधुओं के प्रति समान श्रद्धा नहीं रखता तो वह नवकार मंत्र के वास्तविक संदेश को नहीं समझ पाया है।
पुण्य और पाप पर मुनिश्री का विशेष प्रवचन
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में मुनिश्री ने पुण्य और पाप विषय पर भी विस्तार से चर्चा की।उन्होंने कहा कि संसार का प्रत्येक प्राणी पुण्य का फल चाहता है लेकिन पुण्य के कार्य करने से बचता है।इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति पाप का फल नहीं चाहता लेकिन पाप की क्रियाओं में लिप्त रहता है।
कौन-कौन सी क्रियाएं पाप की ओर ले जाती हैं
मुनिश्री ने कहा कि निम्न क्रियाएं व्यक्ति को पाप की ओर ले जाती हैं—
- रात्रि भोजन
- झूठ बोलना
- चोरी करना
- हिंसा
- कुशील
- परिग्रह
- ईर्ष्या
- द्वेष
- कषाय
उन्होंने कहा कि इन दोषों से बचना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
स्वाध्याय को बताया जीवन का आधार
indore मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज ने कहा कि यदि व्यक्ति पाप कर्मों से बचना चाहता है तो उसे जिनवाणी का स्वाध्याय करना चाहिए।उन्होंने कहा—
“जिसका मन स्वाध्याय में लग जाता है, उसका मन पाप कर्मों में नहीं लगता।”
जिनवाणी का अध्ययन व्यक्ति के भीतर आत्मचिंतन, संयम और सकारात्मकता विकसित करता है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन रहे उपस्थित
धर्मसभा में समाज के अनेक वरिष्ठजन एवं समाजश्रेष्ठी उपस्थित रहे।इस अवसर पर—
- रमेश चंद्र जैन एमपीईबी
- आलोक जैन नेता
- पवन जैन चैलेंजर
- डॉ. जैनेंद्र जैन
- डॉ. वी.सी. जैन
- अखिलेश
- अरविंद सोधिया
- निलेश जैन
- उज्ज्वल जैन
सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।धर्मसभा का संचालन भूपेंद्र जैन ने किया।
जैन समाज के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह संदेश
वर्तमान समय में जब समाज विभिन्न विचारधाराओं और समूहों में विभाजित दिखाई देता है, तब मुनिश्री आदित्य सागर जी का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक माना जा रहा है।यह संदेश केवल जैन समाज के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण समाज के लिए समानता, सम्मान और सह-अस्तित्व की सीख देता है।
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