मुनि सुधा सागरजी ने इंदौर की धर्मसभा में भारतीय और जैन होने पर गर्व करने का संदेश दिया। उन्होंने गुरु, मनुष्य जीवन, जैन संस्कार, अहिंसा और आत्मसुधार पर महत्वपूर्ण सीख दी।
भारतीय होने एवं जैन होने पर गर्व करो: मुनि सुधा सागरजी का प्रेरणादायक संदेश, जानिए जीवन सुधारने की 5 बड़ी सीख
रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू
इंदौर।
मुनि सुधा सागरजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारा जन्म भारत में हुआ और जैन कुल मिला, इसका तुम्हें गर्व होना चाहिए, क्योंकि भारत तीर्थंकरों की पवित्र भूमि है। यहां तुम्हारा जन्म जैन कुल में हुआ और तुम्हें जैनत्व के संस्कार मिले, मां जिनवाणी मिली, मंत्रों का राजा महामंत्र णमोकार मिला, देव दर्शन, पूजन-अभिषेक के लिए जैन मंदिर मिले और मुनियों को आहार देने का सौभाग्य मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि पुण्य कमाने के लिए शाश्वत जैन तीर्थ मिले, शाश्वत पर्व मिले, संतों के चातुर्मास मिले और पाषाण से भगवान बनने की कला जानने के लिए पंचकल्याण मिले। हिंसा से बचने एवं अहिंसा के पालन के लिए मांसाहार और रात्रि भोजन के त्याग के संस्कार मिले।
मुनि सुधा सागरजी ने बताया भारत और जैन कुल में जन्म का महत्व
मुनि सुधा सागरजी ने कहा कि विचार करें कि क्या यह सब भारत के अलावा अमेरिका या किसी अन्य देश में तुम्हारा जन्म होता तो तुम्हें यह सब कुछ मिलता? इनके सामने अमेरिका का व्हाइट हाउस कुछ नहीं है।
उन्होंने कहा कि इसलिए भारत का भिखारी होना गर्व की बात है, अमेरिका का राष्ट्रपति बनने में गर्व नहीं। ऐसी अनुभूति तुम्हें हो जाए तो तुम सच्चे जैनी और भारतीय हो।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में मुनि श्री ने भारतीय संस्कृति, जैन धर्म, गुरु के महत्व और मनुष्य जीवन की सार्थकता पर विस्तार से अपने विचार रखे।
गुरु तुम्हारी अच्छाइयां नहीं, दोष देखे तो समझो वह सच्चा गुरु है
मुनि सुधा सागरजी ने धर्मसभा में यह भी कहा कि जो गुरु तुम्हारी अच्छाइयों पर दृष्टि रखे, वह अच्छा गुरु नहीं। गुरु वह अच्छा है जो तुम्हारे दोषों पर नजर रखे।
पिता और गुरु तुममें दोष देखें तो उन पर नाराज मत होना, बल्कि शुभ भाव रखना। यह जानने का प्रयास करना कि पिता और गुरु की दृष्टि में मुझमें क्या और कितने दोष हैं? इससे तुम्हारा विकास होगा।
उन्होंने समझाया कि मनुष्य को अपनी कमियों को जानने और उन्हें स्वीकार करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। जब व्यक्ति अपनी कमियों को समझता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक सुधार की शुरुआत होती है।
अपनी बुराई पहले अंतरंग में खोजें
मुनि श्री ने कहा कि वही व्यक्ति सुधर सकता है, जो अपनी बुराई पहले अंतरंग में खोजे और स्वीकार करे तथा कहे कि मुझे सुधारना है।
गुरु इसलिए बनाना कि जो गलती मैं अपने दोष में नहीं देख पाता, वह गुरु की आंख देख लेती है। इसलिए तुम्हारी बुराई और दोष दुनिया देखे, उसके पहले गुरु को दिखा देना।
मुनि सुधा सागरजी के अनुसार गुरु का कार्य केवल शिष्य की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा दिखाना भी है। गुरु शिष्य के उन दोषों को पहचान सकता है, जिन्हें कई बार व्यक्ति स्वयं नहीं पहचान पाता। ऐसे में गुरु द्वारा बताई गई कमियों पर नाराज होने के बजाय उन्हें अपने जीवन में सुधार का माध्यम बनाना चाहिए।
84 लाख योनियों में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ
धर्मसभा में मुनि सुधा सागरजी ने मनुष्य जीवन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि ही सर्वश्रेष्ठ है। इस योनि को पाने के लिए देवता भी तरसते हैं।
मनुष्य जीवन मिलने के बाद व्यक्ति को इसे केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं में व्यतीत नहीं करना चाहिए, बल्कि धर्म, अहिंसा, आत्मकल्याण, सदाचार और पुण्य के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
जैन दर्शन में मानव जीवन को आत्मकल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मनुष्य अपने विवेक, संयम और साधना के माध्यम से अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। इसी कारण मुनि श्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को मनुष्य जीवन की महत्ता समझने और इसे सार्थक बनाने की प्रेरणा दी।
जैनत्व के संस्कारों पर गर्व करने का संदेश
मुनि सुधा सागरजी ने जैन कुल में मिले संस्कारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जिनवाणी, णमोकार महामंत्र, मंदिरों में देव दर्शन, पूजन-अभिषेक, संतों के दर्शन, मुनियों को आहार देने का अवसर, जैन तीर्थ, पर्व, चातुर्मास और पंचकल्याण जैसे धार्मिक अवसर व्यक्ति के जीवन को धर्म से जोड़ते हैं।
उन्होंने अहिंसा के पालन, मांसाहार के त्याग और रात्रि भोजन से बचने जैसे संस्कारों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। जैन धर्म में अहिंसा को विशेष महत्व दिया गया है और यही संस्कार व्यक्ति को जीवों के प्रति करुणा एवं संवेदनशीलता की प्रेरणा देते हैं।
भारत तीर्थंकरों की पवित्र भूमि होने के कारण जैन समाज के लिए विशेष महत्व रखता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित जैन तीर्थ और मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं।
पिता और गुरु की सीख से होता है विकास
धर्मसभा में मुनि श्री ने कहा कि पिता और गुरु यदि व्यक्ति के दोष बताते हैं तो उसे नाराज नहीं होना चाहिए। उनके प्रति शुभ भाव रखते हुए स्वयं के अंदर सुधार का प्रयास करना चाहिए।
व्यक्ति जब अपनी कमियों को स्वीकार करता है, तभी वह उन्हें दूर करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। स्वयं की गलतियों को छिपाने या दूसरों द्वारा बताई गई कमियों पर नाराज होने से सुधार का मार्ग बंद हो जाता है।
मुनि सुधा सागरजी का संदेश था कि गुरु की दृष्टि शिष्य के जीवन को बेहतर बनाने के लिए होती है। गुरु के बताए मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति अपने आचरण और विचारों में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन रहे उपस्थित
धर्मसभा में पवन जैन चेलेजर, आलोक जैन कोल, अरविंद सोधिया, पवन मोदी, आनंद मनीष गोधा, डॉ. जैनेंद्र जैन, अशोक-विनोद डोसी, महेंद्र रसिया, मुक्ता जैन आदि समाज श्रेष्ठी उपस्थित थे।
धर्मसभा का संचालन अर्पित वाणी ने किया।
मुनि सुधा सागरजी के प्रवचन में भारतीय होने, जैन धर्म के संस्कारों को जीवन में उतारने, गुरु की सीख को स्वीकार करने और अपने दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनि श्री के विचारों को श्रद्धापूर्वक सुना।

