मुनि श्री अक्षय सागर जी को पुणे विश्वविद्यालय में प्रवेश से रोका जाने के बाद जैन समाज में भारी रोष है। राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ, विश्व जैन संगठन और समाजजनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से माफी एवं स्पष्टीकरण की मांग की है।
मुनि श्री अक्षय सागर जी को पुणे विश्वविद्यालय में प्रवेश से रोका, जैन समाज में गहरा रोष
मुनि श्री अक्षय सागर जी को पुणे विश्वविद्यालय में प्रवेश से रोका, जैन समाज में गहरा रोष
राजेश जैन दद्दू | इंदौर
“जब तक सूरज चांद रहेगा, मुनियों का सम्मान रहेगा” के उद्घोष के साथ राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ एवं विश्व जैन संगठन से जुड़े समाजजन पुणे में घटी एक घटना के विरोध में सामने आए हैं। सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में आयोजित “भारत की प्राचीन जैन विरासत” विषयक संगोष्ठी में आधिकारिक रूप से आमंत्रित दिगम्बर जैन संत मुनि श्री अक्षय सागर जी को प्रवेश नहीं दिए जाने के आरोपों के बाद जैन समाज में व्यापक रोष व्याप्त हो गया है।
क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत “भारत की प्राचीन जैन विरासत” विषय पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई थी।इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में दिगम्बर जैन संत मुनि श्री अक्षय सागर जी को विधिवत आमंत्रण पत्र भेजा गया था तथा उनकी स्वीकृति भी प्राप्त कर ली गई थी।समाजजनों का आरोप है कि जब मुनिश्री कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके पारंपरिक दिगम्बर स्वरूप के कारण उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया।
जैन समाज ने क्यों जताया विरोध
राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ एवं विश्व जैन संगठन के प्रचारक राजेश जैन दद्दू और मयंक जैन ने इस घटना को केवल एक संत का नहीं बल्कि हजारों वर्षों पुरानी श्रमण संस्कृति, तप, त्याग और अहिंसा की परंपरा का अपमान बताया है।उन्होंने कहा कि दिगम्बरत्व जैन साधुओं की पहचान है। यह केवल वस्त्र त्याग नहीं बल्कि समस्त परिग्रहों के त्याग का प्रतीक है। यह भारत की प्राचीन आध्यात्मिक और श्रमण परंपरा का अभिन्न अंग है।समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि जैन समाज इस घटना को गंभीरता से ले रहा है और इसे धार्मिक असंवेदनशीलता का उदाहरण मान रहा है।
मुनि श्री अक्षय सागर जी को पुणे विश्वविद्यालय में प्रवेश से रोका, समाज ने उठाए सवाल
समाजजनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं।
- यदि कार्यक्रम जैन विरासत पर आधारित था तो दिगम्बर संत को आमंत्रित क्यों किया गया?
- यदि आमंत्रित किया गया तो अंतिम समय में प्रवेश से क्यों रोका गया?
- क्या प्रशासन को पहले से संत के स्वरूप की जानकारी नहीं थी?
- क्या यह धार्मिक परंपराओं के प्रति असंवेदनशीलता नहीं है?
मयंक जैन ने कहा कि इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन को सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता का पक्ष
जैन संगठनों ने इस मामले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का भी उल्लेख किया है।अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय भी पूर्व में दिगम्बर जैन संतों की धार्मिक परंपराओं और सार्वजनिक विचरण को धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत मान्यता दे चुका है।इसी आधार पर समाजजन इस मामले में संवैधानिक और नैतिक दोनों स्तरों पर स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं।
मुनि श्री अक्षय सागर जी को पुणे विश्वविद्यालय में प्रवेश से रोका, देशभर में विरोध की तैयारी
इस घटना के विरोध में देशभर के विभिन्न जैन संगठनों द्वारा मौन प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने की तैयारी की जा रही है।राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ, विश्व जैन संगठन तथा अन्य सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन से लिखित माफी और स्पष्टीकरण की मांग की है।समाज का कहना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो यह विरोध और व्यापक रूप ले सकता है।
समाज के प्रमुख लोगों की प्रतिक्रिया
इस प्रकरण पर इंदौर सहित विभिन्न क्षेत्रों के समाजजनों ने भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।इनमें प्रमुख रूप से:
- आनंद नवीन गोधा
- हर्ष जैन
- अमित कासलीवाल
- सुशील पांड्या
- टीके वेद
- हंसमुख गांधी
- डीके जैन
- डीएसपी मनोहर झांझरी
- पुष्पा कासलीवाल
- श्रीमती मुक्ता जैन
- श्रीमती साधना दगड़े
- श्रीमती रेखा जैन श्रीफल
ने विश्वविद्यालय प्रशासन से खेद व्यक्त करने तथा पूज्य गुरुदेव एवं जैन समाज से माफी मांगने की मांग की है।
निष्कर्ष
जैन समाज का मानना है कि यह विषय केवल एक व्यक्ति विशेष से जुड़ा नहीं है बल्कि भारत की प्राचीन श्रमण परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और धार्मिक सम्मान से संबंधित है।संत परंपरा को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए समाजजनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपेक्षा की है कि वह मामले की निष्पक्ष जांच कर उचित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करे ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
