MP News: ₹5000 करोड़ की अमृत योजना अटकी, 15 जिलों में सिर्फ 55% काम पूरा, भोपाल-इंदौर समेत बड़े शहर भी पिछड़े
MP में शहरी विकास और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए शुरू की गई अमृत योजना (AMRUT) एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। लगभग ₹5000 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत राज्य के शहरों में शुद्ध पेयजल आपूर्ति, सीवरेज व्यवस्था और शहरी विकास से जुड़े कार्य किए जाने थे, लेकिन अब तक कई जिलों में काम की रफ्तार बेहद धीमी पाई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 15 जिलों में इस योजना के तहत औसतन केवल 55 प्रतिशत कार्य ही पूरा हो सका है। वहीं भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे बड़े महानगर भी तय लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं। स्थिति यह है कि कई जगहों पर काम वर्षों से लंबित है, जिससे शहरी विकास की गति प्रभावित हो रही है।
₹5000 करोड़ की योजना अधर में
अमृत योजना के तहत प्रदेश में लगभग ₹5000 करोड़ के विकास कार्य प्रस्तावित हैं, जिनमें पेयजल व्यवस्था, सीवरेज नेटवर्क, वॉटर बॉडी रिवाइवल और हरित क्षेत्र विकास जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। लेकिन इन परियोजनाओं को तय समयसीमा में पूरा नहीं किया जा सका है।
अधिकांश कार्यों को पांच वर्षों में पूरा किया जाना था, लेकिन अब स्थिति यह है कि कई प्रोजेक्ट अब भी अधूरे हैं। इससे शहरों में बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।
15 जिलों में बेहद धीमी प्रगति
राज्य के 15 प्रमुख जिलों में अमृत योजना के कार्यों की प्रगति 55% से लेकर 70% के बीच ही अटकी हुई है। इनमें कुछ प्रमुख जिले इस प्रकार हैं:
- इंदौर: 70.43%
- जबलपुर: 68.02%
- सागर: 67.92%
- गुना: 66.08%
- कटनी: 65.21%
- शिवपुरी: 65.13%
- भिंड: 63.59%
- दमोह: 63.13%
- सिंगरौली: 62.57%
- सिवनी: 61.68%
- भोपाल: 60.97%
- ग्वालियर: 59.10%
- दतिया: 57.30%
- मुरैना: 56.12%
- बुरहानपुर: 55.95%
इन आंकड़ों से साफ है कि कई जिलों में काम की गति बेहद धीमी है और कुछ जिलों में तो स्थिति चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है।
भोपाल और इंदौर जैसे महानगर भी पिछड़े
MP की राजधानी भोपाल और आर्थिक केंद्र इंदौर भी इस योजना के क्रियान्वयन में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं। भोपाल में लगभग 61 प्रतिशत और इंदौर में 70 प्रतिशत के आसपास ही कार्य पूरा हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े शहरों में जनसंख्या और बुनियादी ढांचे का दबाव अधिक होने के बावजूद योजनाओं की धीमी गति चिंता का विषय है।
कई जिलों ने किया बेहतर प्रदर्शन
हालांकि कुछ जिलों ने इस योजना में बेहतर प्रदर्शन भी किया है। बालाघाट जिले ने 85.51 प्रतिशत कार्य पूरा कर प्रदेश में पहला स्थान हासिल किया है। इसके बाद मंडला (85.49%), टीकमगढ़ (83.67%), नरसिंहपुर (83.35%) और आगर (80.73%) जैसे जिले शामिल हैं।
इन जिलों ने समयबद्ध तरीके से परियोजनाओं को आगे बढ़ाया और 80 प्रतिशत से अधिक कार्य पूरा कर लिया है।
देरी के पीछे क्या हैं कारण?
रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर परियोजनाओं में देरी की प्रमुख वजह प्रशासनिक अड़चनें, टेंडर प्रक्रिया में देरी और स्थानीय स्तर पर सहमति की कमी बताई जा रही है।
कुछ मामलों में आरोप यह भी है कि टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर विवाद होते रहे हैं, जिससे काम प्रभावित हुआ है। कई परियोजनाएं महापौर परिषद (MIC) में लंबे समय से लंबित पड़ी हैं।
MIC में अटके कई बड़े प्रोजेक्ट
सूत्रों के अनुसार, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, बुरहानपुर और सागर जैसे शहरों में लगभग ₹1000 करोड़ से अधिक के कार्य महापौर परिषद में अटके हुए हैं। इन शहरों में पेयजल पाइपलाइन, ड्रेनेज सिस्टम और क्रॉस कनेक्शन जैसी बुनियादी समस्याओं पर काम धीमा चल रहा है।
कई बार टेंडर और स्वीकृति को लेकर असहमति के कारण परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।
लापरवाही पर कार्रवाई भी जारी
हालांकि नगरीय प्रशासन विभाग समय-समय पर परियोजनाओं की समीक्षा कर रहा है और लापरवाही पर कार्रवाई भी की जा रही है। पिछले तीन महीनों में 20 से अधिक ठेका कंपनियों को नोटिस जारी किए गए हैं और कुछ को ब्लैकलिस्ट भी किया गया है।
इसके अलावा 40 से अधिक इंजीनियरों पर निलंबन और कारण बताओ नोटिस की कार्रवाई भी की गई है। विभाग का कहना है कि काम की गुणवत्ता और समयसीमा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
वॉटर सप्लाई और सीवरेज सिस्टम पर असर
अमृत योजना का मुख्य उद्देश्य शहरों में स्वच्छ पेयजल आपूर्ति और बेहतर सीवरेज सिस्टम विकसित करना है। लेकिन परियोजनाओं की धीमी प्रगति के कारण कई शहरों में अभी भी पुरानी जल लाइनें और ड्रेनेज सिस्टम की समस्या बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर ये प्रोजेक्ट पूरे नहीं हुए तो शहरी जनजीवन और अधिक प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर MP में ₹5000 करोड़ की अमृत योजना गंभीर देरी का शिकार है। जहां कुछ जिलों ने बेहतर प्रदर्शन किया है, वहीं बड़े शहरों सहित कई जिले अब भी लक्ष्य से काफी पीछे हैं।
लगातार अटकी परियोजनाएं और धीमी गति से चल रहा काम शहरी विकास पर सवाल खड़े कर रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और प्रशासन आने वाले समय में इन अटकी योजनाओं को कितनी तेजी से पूरा कर पाते हैं।
