आज आचार्यश्री उदारसागरजी करेंगे चातुर्मास की मंगल कलश स्थापना, धर्मसभा में आत्मचिंतन का दिया संदेश
आचार्य उदारसागर बोले- अंतरात्मा में विराजमान परमात्मा को पहचानें, मुनिश्री उपशांत सागर ने मंदिर जाने को बताया जीवन में अनुशासन का माध्यम
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य के भीतर आत्मा का परमात्मा से संबंध सदैव बना रहता है। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति अपने जीवन में आत्मचिंतन, धर्म, श्रद्धा और भक्ति को स्थान दे तथा अपनी अंतरात्मा की आवाज को समझने का प्रयास करे।
इसी क्रम में आज श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्ष 2026 के चातुर्मास की मंगल कलश स्थापना का भव्य धार्मिक आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम को लेकर जैन समाज में विशेष उत्साह और श्रद्धा का वातावरण है।
अंतरात्मा में विराजमान परमात्मा को पहचानने का संदेश
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य बाहरी साधनों और दिखावे में अधिक उलझता जा रहा है। वह बाहरी परमात्मा की आराधना तो करता है, लेकिन अपने भीतर मौजूद आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास कम करता है।
उन्होंने कहा कि आत्मा और परमात्मा का संबंध मनुष्य के जीवन का मूल आध्यात्मिक आधार है। जब व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति जागरूक रहता है और परमात्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करता है, तब उसके जीवन में धर्म, श्रद्धा और भक्ति का भाव मजबूत होता है।
आचार्यश्री के अनुसार धर्म केवल बाहरी आडंबर या धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को अपने भीतर झांकने, अपनी कमियों को पहचानने और जीवन को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना है।
आत्मा से विमुख होने पर कमजोर होता है धर्म का भाव
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर आत्मा और परमात्मा के मिलन का भाव बना रहता है, तब तक उसके जीवन में धर्म और भक्ति का प्रवाह बना रहता है।
लेकिन जब व्यक्ति अपनी आत्मा से विमुख होकर केवल बाहरी सुख-सुविधाओं और भौतिक उपलब्धियों में उलझ जाता है, तब उसके जीवन में धर्म का भाव धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में आत्मचिंतन के लिए समय निकालना चाहिए। व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है और उसके कर्म किस प्रकार उसके जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।
प्रतिदिन मंदिर जाने से मन को मिलती है शांति
धर्मसभा को परम पूज्य 108 मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मंदिर जाना केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में अनुशासन, प्रसन्नता और सकारात्मकता लाने का माध्यम भी बन सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को नियमित रूप से मंदिर जाकर भगवान के दर्शन, पूजन और ध्यान का नियम बनाना चाहिए। धार्मिक वातावरण में कुछ समय बिताने से व्यक्ति को आत्मचिंतन का अवसर मिलता है और मन को शांति का अनुभव होता है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति नियमित रूप से धर्म के नियमों का पालन करता है, उसके जीवन में संतोष और प्रसन्नता का भाव मजबूत हो सकता है।
युवा पीढ़ी की दिनचर्या पर भी जताई चिंता
मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने वर्तमान युवा पीढ़ी की दिनचर्या पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में युवा देर रात तक जागने और सुबह देर से उठने की आदत के कारण प्रकृति के सामान्य क्रम से दूर होते जा रहे हैं।
उन्होंने युवाओं को नियमित दिनचर्या अपनाने, समय का सदुपयोग करने और सकारात्मक गतिविधियों से जुड़ने की प्रेरणा दी।
मुनिश्री के अनुसार जीवन में अनुशासन केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
आज होगी वर्ष 2026 के चातुर्मास की मंगल कलश स्थापना
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आज वर्ष 2026 के चातुर्मास की मंगल कलश स्थापना का आयोजन किया जाएगा।
संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर महाराज एवं आचार्यश्री अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज अपने शिष्य मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज, ऐलकश्री उत्साहसागरजी महाराज, क्षुल्लकश्री उपकारसागरजी महाराज, क्षुल्लिका उदितमति एवं उपासनामति माताजी सहित चातुर्मास की मंगल स्थापना करेंगे।
दोपहर 1 बजे से होगा भव्य आयोजन
चातुर्मास मंगल कलश स्थापना समारोह का आयोजन शहर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आज दोपहर 1 बजे से किया जाएगा।
आयोजन में जैन समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। गुरु भक्त, साधर्मी बंधु, माता-बहनें और युवा समारोह में सहभागी बनकर धर्मलाभ लेंगे।
चातुर्मास के दौरान संतों के सान्निध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा।
मंत्रोच्चार के साथ संपन्न होंगी धार्मिक क्रियाएं
मंगल कलश स्थापना समारोह में विभिन्न धार्मिक क्रियाएं विधि-विधान के साथ संपन्न कराई जाएंगी।
कार्यक्रम ब्रह्मचारी प्रदीप जैन ‘पीयूष’ के मार्गदर्शन एवं निर्देशन में आयोजित होगा। समारोह में प्रतिष्ठाचार्य संजय शास्त्री सिहोनिया, प्राचार्य चक्रेश शास्त्री (जैन छात्रावास) तथा विद्वान नवनीत शास्त्री, मुरैना द्वारा मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराई जाएंगी।
समारोह में श्रद्धालुओं की ओर से धार्मिक अनुष्ठान में सहभागिता की जाएगी।
चातुर्मास को लेकर जैन समाज में उत्साह

चातुर्मास की मंगल कलश स्थापना को लेकर मुरैना के जैन समाज में विशेष उत्साह और श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है।
चातुर्मास जैन परंपरा में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। इस दौरान साधु-संत एक स्थान पर रहकर धर्म, अध्यात्म, आत्मचिंतन और अहिंसा से जुड़े संदेशों के माध्यम से समाज को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए यह अवधि धार्मिक साधना और आत्मचिंतन का अवसर मानी जाती है।
आयोजन के बाद सामूहिक वात्सल्य भोज
मंगल कलश स्थापना समारोह के उपरांत उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए सामूहिक वात्सल्य भोज की व्यवस्था भी की गई है।
आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम की तैयारियां की जा रही हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से समारोह में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर धर्मलाभ लेने की अपील की गई है।
धर्म और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश
धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज और मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज के संदेशों का मुख्य केंद्र आत्मचिंतन, अनुशासन, श्रद्धा और सकारात्मक जीवन रहा।
संतों ने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के साथ-साथ व्यक्ति को अपने व्यवहार और कर्मों पर भी ध्यान देना चाहिए। मंदिर और धर्मसभा केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देने वाले माध्यम भी हैं।
निष्कर्ष
मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आज आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज सहित संत समुदाय के सान्निध्य में वर्ष 2026 के चातुर्मास की मंगल कलश स्थापना होगी। इससे पहले आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को अपनी अंतरात्मा में विराजमान परमात्मा को पहचानने और बाहरी आडंबर के बजाय आत्मचिंतन पर ध्यान देने का संदेश दिया।
मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने नियमित मंदिर जाने, धर्म के नियमों का पालन करने और जीवन में अनुशासन बनाए रखने की प्रेरणा दी। चातुर्मास स्थापना समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। आयोजन के बाद सामूहिक वात्सल्य भोज भी रखा गया है।
