—Advertisement—

Morena की माटी से समाधिसम्राट बनने तक, जानिए आचार्य सुमतिसागर जी महाराज का जीवन

Author Picture
Published On: 2 October 2026
Morena

—Advertisement—

मासोपवासी समाधिसम्राट आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज : तप, त्याग और आत्मसाधना की प्रेरणादायी यात्रा

3 अक्टूबर समाधि दिवस पर विशेष आलेख

Morena । मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की धरती ने अनेक संतों और तपस्वियों को जन्म दिया है। इन्हीं में एक प्रमुख नाम मासोपवासी समाधिसम्राट आचार्य श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज का है। कठोर तप, त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मसाधना को जीवन का आधार बनाने वाले आचार्यश्री को बीसवीं शताब्दी के प्रमुख दिगंबर जैन आचार्यों में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। शांत, गंभीर, सरल और तपस्वी व्यक्तित्व वाले आचार्यश्री ने अपना जीवन आत्मकल्याण और धर्मप्रभावना को समर्पित किया।

मासोपवास जैसी कठिन तप साधनाओं के कारण उन्हें श्रद्धालुओं द्वारा ‘मासोपवासी’ और समाधिपूर्वक देह त्याग के कारण ‘समाधिसम्राट’ के रूप में स्मरण किया जाता है। प्रकाशित जीवन-वृत्त के अनुसार वे उत्तर भारत की शांतिसागर छाणी परंपरा के पंचम पट्टाचार्य थे।

Morena के श्यामपुरा में हुआ जन्म

आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1974, आसोज शुक्ल चतुर्थी, 20 अक्टूबर 1917 को मध्यप्रदेश के वर्तमान मुरैना जिले के श्यामपुरा ग्राम में हुआ था। उनका जन्मनाम नत्थीलाल जैन था। उनके पिता श्री छिद्दूलाल जी जैन और माता श्रीमती चिरोंजाबाई जैन थीं। वे जैसवाल जैन समाज के भंडारी गोत्र से संबंधित थे।

परिवार में धार्मिक संस्कारों का गहरा प्रभाव था। माता-पिता ने बचपन से ही नत्थीलाल जी को धर्म, सदाचार, संयम और संस्कारों की शिक्षा दी। उनके तीन भाई और एक बहन थी। उनके छोटे भाई आगे चलकर आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए।

बाल्यकाल से ही नत्थीलाल जी का स्वभाव शांत, गंभीर, सुशील और एकांतप्रिय था। सांसारिक विषयों की अपेक्षा उनका झुकाव धर्म, स्वाध्याय और आत्मचिंतन की ओर अधिक दिखाई देता था।

गृहस्थ जीवन के बीच बढ़ता गया वैराग्य

लगभग 12 वर्ष की आयु में उनका विवाह मुरैना जिले के खबरोली निवासी श्री रामचंद्र जी की पुत्री श्रीमती रामश्री देवी के साथ हुआ। विवाह के बाद वे मुरैना में रहने लगे और कुछ समय तक खाद्यान्न व्यापार से जुड़े रहे।

गृहस्थ जीवन का निर्वहन करते हुए भी उनके भीतर धीरे-धीरे वैराग्य की भावना प्रबल होती गई। धर्म, स्वाध्याय और आत्मसाधना के प्रति उनका झुकाव बढ़ता गया। उनकी पत्नी श्रीमती रामश्री देवी ने भी उनके वैराग्य भाव को समझते हुए त्याग और संयम के मार्ग में सहयोग दिया।

आचार्य विमलसागर जी से मुलाकात बनी जीवन का मोड़

उनके जीवन में निर्णायक परिवर्तन तब आया, जब आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज का मुरैना आगमन हुआ। नत्थीलाल जी के परिवार को आचार्यश्री को आहार कराने का अवसर मिला। आचार्यश्री के तप, त्याग, संयम और साधना से वे गहराई से प्रभावित हुए।

इस मुलाकात के बाद उनके भीतर वैराग्य की भावना और प्रबल होती गई। उन्होंने क्रमशः अनेक व्रत ग्रहण किए और सांसारिक मोह-ममता से स्वयं को दूर करते हुए आत्मकल्याण को जीवन का लक्ष्य बनाया।

ऐलक और मुनि दीक्षा से शुरू हुई नई आध्यात्मिक यात्रा

वैराग्य भावना के निरंतर बढ़ने के बाद नत्थीलाल जी ने विक्रम संवत 2025, चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, वर्ष 1968 में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से ऐलक दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के बाद उन्हें ऐलक श्री वीरसागर जी महाराज नाम प्राप्त हुआ।

ऐलक अवस्था में उन्होंने कठोर संयम, स्वाध्याय और तपस्या का जीवन अपनाया। इसके बाद वर्ष 1968 में गाजियाबाद में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से उन्होंने मुनि दीक्षा ग्रहण की और मुनि श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज नाम प्राप्त हुआ।

मुनि जीवन में उनका व्यक्तित्व और अधिक निखरता गया। ध्यान, तप, स्वाध्याय और आत्मचिंतन उनकी साधना के प्रमुख आधार बने। देश के विभिन्न क्षेत्रों में विहार करते हुए उन्होंने जैन धर्म, अहिंसा, अनेकांत, संयम और आत्मकल्याण का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।

1973 में मिला आचार्य पद

उपलब्ध जीवन-वृत्त के अनुसार 13 अप्रैल 1973 को मुरैना में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज ने उन्हें आचार्य पद प्रदान किया। आचार्य पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने शांतिसागर छाणी परंपरा की साधना, तप और धर्मप्रभावना को आगे बढ़ाया।

उनका जीवन कठोर संयम, अनुशासन, स्वाध्याय और आत्मसाधना का उदाहरण बन गया। विभिन्न धार्मिक आयोजनों, पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं और वेदी प्रतिष्ठाओं में उनका सान्निध्य एवं मार्गदर्शन श्रद्धालुओं को प्राप्त होता रहा।

कठोर तपस्या से मिली ‘मासोपवासी’ की पहचान

आचार्यश्री की साधना का सबसे विशिष्ट पक्ष उनकी कठोर तपस्या थी। वे लंबे उपवास और कठिन व्रत करते थे। अनेक अवसरों पर उन्होंने मासोपवास जैसी कठिन साधनाएं कीं। इसी कारण श्रद्धालुओं के बीच वे ‘मासोपवासी समाधिसम्राट आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज’ के नाम से श्रद्धापूर्वक प्रसिद्ध हुए।

उनकी तपस्या का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्मसंयम, कर्मनिर्जरा और आत्मकल्याण की दिशा में साधना करना था।

धर्मप्रभावना और शिष्यों को संयम की शिक्षा

आचार्यश्री ने अपने जीवनकाल में देश के विभिन्न राज्यों में विहार किया और जैन धर्म की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। उनके सान्निध्य में अनेक धार्मिक आयोजन हुए। उन्होंने साधु-साध्वियों और श्रावकों को स्वाध्याय, तप, विनय, अनुशासन और आत्मकल्याण के मार्ग की प्रेरणा दी।

उनके जीवन-वृत्त में लगभग 50 व्यक्तियों को दीक्षा देकर संयम मार्ग पर अग्रसर करने का उल्लेख मिलता है। उनके प्रमुख शिष्यों में विद्याभूषण सन्मति सागर महाराज, सराकोद्धारक ज्ञानसागर महाराज और ज्ञेय सागर महाराज जैसे साधु-संतों का उल्लेख किया जाता है। उनके गुरु-शिष्य संबंध में ज्ञान, साधना और संयम की परंपरा को विशेष महत्व प्राप्त रहा।

सोनागिरि में समाधिमरण

जीवन के अंतिम समय में भी आचार्यश्री अपनी साधना के प्रति सजग रहे। उपलब्ध जीवन-वृत्त के अनुसार उन्हें अपने समाधि समय का पूर्वाभास हुआ था और उन्होंने साधु-संघ को संकेत दिया कि शरीर और आत्मा की अंतिम यात्रा निकट है।

3 अक्टूबर 1994 को मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र सोनागिरि में प्रातः लगभग 9:30 बजे उन्होंने नश्वर शरीर का त्याग कर समाधिमरण प्राप्त किया। लगभग 77 वर्ष के जीवन में गृहस्थ से ऐलक, मुनि और फिर आचार्य पद तक की उनकी आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण हुई।

आज भी आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज का जीवन तप, त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मसाधना के प्रति समर्पण की प्रेरणा के रूप में स्मरण किया जाता है। 3 अक्टूबर के समाधि दिवस पर श्रद्धालु उनके जीवन और साधना को नमन करते हुए उनके बताए संयम और आत्मकल्याण के मार्ग को स्मरण करते हैं।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp