मीठी वाणी का चमत्कारी प्रभाव: सरोज श्रीजी ने बताए रिश्ते संवारने के 7 शक्तिशाली सूत्र
मीठी वाणी इंसान के संस्कारों और व्यक्तित्व का सबसे सुंदर परिचय है। नागदा जंक्शन स्थित महावीर भवन में पूज्य महासती चारित्रप्रभा श्रीजी ठाणा-3 के सानिध्य में चल रहे चातुर्मास के दौरान पूज्य महासतीजी सरोज प्रभाश्रीजी ने श्रावक-श्राविकाओं को वाणी के संयम और मधुर व्यवहार का महत्व समझाया।
वाणी ही संस्कारों का आईना
मीडिया प्रभारी नितिन बुड़ावनवाला ने बताया कि महावीर भवन में चल रहा चातुर्मास निरंतर आध्यात्मिक वातावरण में आगे बढ़ रहा है। पूज्य महासतीजी सरोज प्रभाश्रीजी के नित्य प्रवचन प्रतिदिन श्रावक-श्राविकाओं को उच्च संस्कार और जीवन जीने की प्रेरणा दे रहे हैं।
जिह्वा और मीठी वाणी विषय पर प्रवचन देते हुए पूज्यश्री ने कहा कि वाणी इंसान के संस्कारों का आईना होती है। मधुर शब्द किसी दुखी व्यक्ति के मन को भी शांति और सुकून प्रदान कर सकते हैं। जिह्वा छोटी जरूर है, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है।
पूज्यश्री ने कहा कि जिह्वा से भाषा का स्वाद और भोजन का स्वाद दोनों जुड़े हैं। साधु-साध्वी अपनी अमृतवाणी से ही शोभायमान होते हैं। वचन लब्धि के लिए हित, मित और परिमित बोलना आवश्यक है।
कड़वी वाणी का घाव लंबे समय तक रहता है
सरोज श्रीजी ने कहा कि सत्य ऐसा बोलना चाहिए, जिससे वह किसी पाप का कारण न बने। सच्चा सत्य बोलने वाला व्यक्ति स्वयं भी तिरता है और दूसरों को भी तारने का माध्यम बनता है।
उन्होंने कहा कि मन, वचन और काया के साथ-साथ क्रोध के वशीभूत होकर कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। मीठी वाणी बोलने में किसी धन की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम बहुत बड़े होते हैं।
पूज्यश्री ने समझाया कि कड़वे शब्द तीर के समान होते हैं। तीर का घाव समय के साथ भर सकता है, लेकिन कड़वी वाणी से लगा मन का घाव लंबे समय तक दुख देता है। इसलिए जहां मौन उचित हो, वहां मौन ही सबसे सुंदर उत्तर है।
रिश्ते बचाने में वाणी की बड़ी भूमिका
पूज्य महासतीजी ने कहा कि जिह्वा पर संयम रखना ही सच्ची समझदारी है। कई बार रिश्ते बिगड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण हमारी अपनी वाणी होती है। इसलिए बोलते समय शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए।
उन्होंने संदेश दिया कि वाणी में मिठास और व्यवहार में विनम्रता रखिए। अपनी जुबान से ऐसा बोलिए कि सुनने वाले के मन को शांति मिले।
बदलती दिनचर्या पर भी जताई चिंता
प्रवचन के दौरान पूज्यश्री ने कहा कि हमारी दिनचर्या धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति से जुड़ती जा रही है। रविवार आते ही देर से सोना और देर से उठना जैसी आदतें दिनचर्या को प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि सम्यक दृष्टि वाला जीव पाप से बचने का प्रयास करता है।
उन्होंने जीवन की अनिश्चितता का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी में इतनी शक्ति नहीं कि वह अपनी मुट्ठी में काल को बांध सके। जब इंसान अपनी पत्नी, बच्चों और अपने लोगों को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता, तो काल को कैसे बांध पाएगा।
विभिन्न श्रीसंघों ने लिया अमृत जिनवाणी का लाभ
आज के प्रवचन में खाचरोद, बागरोद, गुराडिया, जावरा, उपरवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से श्रीसंघ दर्शनार्थ एवं अमृत जिनवाणी श्रवण करने नागदा पहुंचे।
इन श्रीसंघों के आतिथ्य-सत्कार की व्यवस्था का लाभ दिलीप पार्थ कांठेड़ परिवार ने लिया। इस अवसर पर सभी संघों के प्रमुखों ने अपने विचार भी व्यक्त किए।
वहीं निर्मलाबहन चंडालिया के तीन उपवास चल रहे हैं। चातुर्मास के दौरान श्रद्धालुओं में धार्मिक उत्साह और साधना का वातावरण बना हुआ है।
संदेश यही है—शब्द छोटे हो सकते हैं, लेकिन उनका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। इसलिए हमेशा ऐसी मीठी वाणी बोलें, जो सामने वाले के मन में शांति, सम्मान और सकारात्मकता पैदा करे।
