Mahashivratri 2026: भगवान शिव और माता पार्वती का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा
इंदौर, भोपाल और देशभर के मंदिरों में Mahashivratri 2026 को बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। हिंदू धर्म के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए इस दिन विशेष व्रत रखा जाता है और शिवलिंग का विधिवत जलाभिषेक किया जाता है। भक्त इस दिन पूरे दिन और रात जागरण करते हुए भोलेनाथ की आराधना करते हैं।
Mahashivratri का महत्व
महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र पर्व है। इसे शिवरात्रि भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने हला हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी। इस कारण उन्हें नीलकंठ कहा जाता है। भक्त इस दिन जागरण करते हुए शिव की स्तुति और भजन करते हैं। साथ ही, इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
Mahashivratri 2026 का शुभ मुहूर्त
जलाभिषेक के लिए शुभ मुहूर्त:
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पहला मुहूर्त – सुबह 08:24 से 09:48 तक
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दूसरा मुहूर्त – सुबह 09:48 से 11:11 तक
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तीसरा मुहूर्त – सुबह 11:11 से दोपहर 12:35 तक
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चौथा मुहूर्त – सुबह 06:11 से 07:47 तक
चार प्रहर पूजा के मुहूर्त:
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पहला प्रहर – 15 फरवरी शाम 06:11 से रात 09:23 तक
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दूसरा प्रहर – रात 09:23 से रात 12:35 तक
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तीसरा प्रहर – 16 फरवरी रात 12:35 से सुबह 03:47 तक
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चौथा प्रहर – 16 फरवरी सुबह 03:47 से सुबह 06:59 तक
व्रत और पारण:
महाशिवरात्रि का व्रत 15 फरवरी शाम 05:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी शाम 05:34 बजे तक रहेगा। पारण 16 फरवरी को सुबह 06:59 बजे से दोपहर 03:24 बजे तक किया जाएगा।
Mahashivratri पर शुभ योग और राजयोग
इस साल महाशिवरात्रि पर 10 बड़े शुभ योग बन रहे हैं। इनमें शिव योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, प्रीति योग, आयुष्मान योग, सौभाग्य योग, शोभन योग, साध्य योग, शुक्ल योग और ध्रुव योग शामिल हैं।
चार प्रमुख राजयोग:
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बुध और सूर्य की युति से बुधादित्य राजयोग बनेगा।
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बुध और शुक्र मिलकर लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण करेंगे।
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सूर्य और शुक्र से शुक्रादित्य योग बनेगा।
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शनि अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ में रहकर शश महापुरुष राजयोग बनाएंगे।
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सूर्य, बुध, शुक्र और राहु की एक साथ उपस्थिति से चतुर्ग्रही योग बन रहा है।
इन योगों के प्रभाव से इस दिन की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
Mahashivratri की पूजा सामग्री
पूजन में निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है:
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बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, भांग
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दीपक, आक का फूल, सफेद फूल
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चंदन, रोली, सिक्का, अक्षत (चावल)
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सुपारी, कलश, लौंग, इलायची, जनेऊ, नारियल
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मिठाई और फल
महाशिवरात्रि पूजा विधि
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सुबह जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लें।
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पूजा स्थल पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर चौकी रखें।
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चावल पर शिवलिंग स्थापित करें और कलश पर स्वास्तिक बनाकर पानी व गंगाजल भरें।
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कलश में सुपारी, सिक्का और हल्दी डालें।
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भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाएं।
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शिवलिंग का अभिषेक गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, मिश्री) से करें।
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अभिषेक करते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।
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बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और फल-फूल अर्पित करें।
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महाशिवरात्रि की कथा पढ़ें और कपूर से आरती करें।
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अंत में भगवान को मिठाई और खीर का भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें।
महाशिवरात्रि की कथा
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शिव-पार्वती विवाह – फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ। इस दिन व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन में खुशियाँ आती हैं।
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नीलकंठ कथा – समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और इस दिन रात जागरण का महत्व बढ़ गया।
निष्कर्ष
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति, आस्था और जीवन में सकारात्मक बदलाव का अवसर है। इस दिन की विधिपूर्वक पूजा, जलाभिषेक और जागरण से न केवल भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
इस महापर्व पर भक्त पूरी आस्था और उत्साह के साथ शिवालयों में जलाभिषेक और रात्रि जागरण में भाग लेंगे।
