साहित्य आजतक 2025 में मनोज तिवारी ने उठाई ‘संस्कार’ की बात, बोले—हम बड़े संस्कारी हैं और बिहार के लोग देश के लिए उदाहरण हैं
दिल्ली देश की राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक राजधानी भी है। ऐसे में जब साहित्य आजतक 2025 का मंच सजा, तो देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कलाकार, लेखक, पत्रकार, साहित्यकार और समाज से जुड़े चेहरे शामिल हुए। इन्हीं में से एक थे—भोजपुरी के लोकप्रिय स्टार, सांसद और गायक मनोज तिवारी, जिन्होंने अपने बेबाक अंदाज़ और संस्कृति से जुड़े विचारों से दर्शकों का दिल जीत लिया।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के बीच जब मनोज तिवारी ने माइक संभाला, तो शुरुआत से ही सभागार में उत्साह भर गया। उनके विचार, उनका सरल अंदाज़ और जड़ों से जुड़ी बातें लोगों को खूब पसंद आईं। इस दौरान उन्होंने युवा पीढ़ी, बिहार, संस्कृति और भारतीय समाज के बदलते मूल्यों पर खुलकर बातें कीं।
“हम बड़े संस्कारी हैं”—मनोज तिवारी का जोरदार बयान
मनोज तिवारी ने अपनी बात की शुरुआत ही इस पंक्ति से की—
“हम बड़े संस्कारी हैं, और बिहार के लोगों को ऐसे ही होना चाहिए—संस्कार, सम्मान और संघर्ष तीनों को साथ लेकर।”
यह बयान केवल एक भावनात्मक संवाद भर नहीं था, बल्कि यह बिहार की संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक व्यवहार की एक मजबूत पहचान का संदेश था। उन्होंने जोर दिया कि बिहार न केवल ज्ञान और बुद्धि का धनी राज्य रहा है, बल्कि यहां के लोग अपनी परंपरा, आदर और व्यवहार को भी महत्व देते हैं।
तिवारी ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां के लोग चाहे जहां भी जाएँ, अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ते। विशेष रूप से बिहार और पूर्वांचल का समाज आज भी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा है।
साहित्य आजतक—एक सांस्कृतिक उत्सव
साहित्य आजतक पिछले कई वर्षों से भारत में साहित्य, कला, पत्रकारिता, किताबों, संगीत और मंचों को एक साथ जोड़ने वाला बड़ा आयोजन रहा है। 2025 का यह संस्करण पहले से भी अधिक बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया।
देश भर से आए लोग यहां विचारों का आदान-प्रदान करने, अपनी भावनाएँ व्यक्त करने और नई जानकारी पाने जुटे थे। मनोज तिवारी का सत्र भी इसी वजह से चर्चा में रहा, क्योंकि उन्होंने केवल कला ही नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक पहचान की बात भी रखी।
बिहार के युवाओं को दिए संदेश
अपने भाषण में मनोज तिवारी ने खासकर बिहार और यूपी के युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा—
- “आज बिहार का युवा दुनिया भर में नाम कमा रहा है।”
- “लेकिन पढ़ाई या नौकरी के लिए घर से बाहर जाने का मतलब यह नहीं कि हम अपनी संस्कृति भूल जाएं।”
- “संस्कार ही हमें भीड़ से अलग पहचान देते हैं।”
उन्होंने बताया कि वह जब पहली बार दिल्ली आए थे, तो उनकी बोली, पहनावा और व्यवहार देखकर लोग उन्हें तुरंत पहचान लेते थे कि यह ‘पूर्वांचल’ का लड़का है, लेकिन यही पहचान उन्हें आगे बढ़ने में मददगार साबित हुई।
मनोरंजन से लेकर राजनीति तक—तिवारी का सफर
साहित्य आजतक के मंच पर उनसे जब उनके फिल्मी करियर और राजनीतिक जीवन के अनुभवों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने सहजता से कहा कि उनकी असली सफलता बिहार के संस्कारों ने ही तय की।
उन्होंने कहा—
“जब आप घर से अच्छे संस्कार लेकर निकलते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको गिरा नहीं सकती। मेहनत करेंगे, ईमानदारी रखेंगे, तो पहचान अपने आप बन जाती है।”
तिवारी ने अपने फिल्मों के दौर, संघर्ष के शुरुआती दिनों और फिर सांसद बनने तक की यात्रा को भी साझा किया।
बिहार—परंपरा और आधुनिकता का संतुलन
अपने भाषण के प्रमुख हिस्से में उन्होंने यह भी कहा कि आज बिहार तेजी से आगे बढ़ रहा है। शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन, ग्रामीण विकास और आईटी सेक्टर में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
उन्होंने कहा—
- “बिहार बुद्ध की भूमि है, सीख की भूमि है, और संघर्ष की भूमि भी है।”
- “यहां के लोग मेहनती हैं, भावुक हैं, और सबसे ज़्यादा अपने परिवार और समाज से जुड़े रहते हैं।”
तिवारी ने यह भी कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने अक्सर बिहार को गलत तरीके से पेश किया है, लेकिन आज बिहार के युवा अपनी प्रतिभा से हर मंच पर इसे गलत साबित कर रहे हैं।
संस्कार बनाम आधुनिक संस्कृति—क्या बदल रहा है समाज?
साहित्य आजतक में इस वर्ष संस्कृति बनाम आधुनिकता की बहस भी बड़ा मुद्दा रही। मनोज तिवारी ने कहा कि आधुनिक होना गलत नहीं है, लेकिन अपनी पहचान और संस्कारों को छोड़ देना गलत है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा—
“दुनिया आधुनिक हो रही है, लेकिन जापान, कोरिया, चीन—सब अपने संस्कार बचाकर आगे बढ़ रहे हैं। भारत को भी उसी दिशा में चलना होगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय परिवार संरचना—संयुक्त परिवार, बुजुर्गों का सम्मान, भाई-बहन का संबंध—ये सभी ऐसी चीजें हैं, जिसने भारत को हमेशा मजबूती दी है।
साहित्य और संगीत—समाज का असली चेहरा
मनोज तिवारी ने कहा कि साहित्य और संगीत किसी भी समाज की आत्मा होते हैं। एक कलाकार केवल गीत या अभिनय नहीं करता, बल्कि समाज की भावनाओं और समस्याओं को भी आवाज देता है।
उन्होंने भोजपुरी संगीत के विकास, फिल्मों की चुनौतियों और बदलते दर्शकों की पसंद पर भी बात की।
उन्होंने कहा—
“भोजपुरी को हमने संस्कारों से जोड़ा, इसलिए वह आज सम्मान पा रही है।”
श्रोताओं ने की जमकर तारीफ
कार्यक्रम खत्म होने के बाद सोशल मीडिया पर भी मनोज तिवारी के बयान—
“हम बड़े संस्कारी हैं”
—की खूब चर्चा रही।
युवाओं ने इसे गर्व से साझा किया और कहा कि ऐसे बयान समाज को सकारात्मक दिशा देते हैं।
निष्कर्ष
साहित्य आजतक 2025 का यह सत्र सिर्फ एक बातचीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जागरूकता का संदेश बन गया। मनोज तिवारी ने यह स्पष्ट किया कि सफलता, आधुनिकता और प्रगति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन संस्कार, संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़ाव उससे भी अधिक जरूरी है।
उनकी यह बात श्रोताओं के मन में गूंजती रही—
“बिहार के लोग बड़े संस्कारी हैं, और उन्हें ऐसे ही रहना चाहिए।”
और यही संदेश साहित्य आजतक जैसे मंचों का असली सार भी है—अपनी पहचान को संजोते हुए आगे बढ़ना।
