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कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी 2025: धर्म, संस्कृति और साहित्य संरक्षण का ऐतिहासिक व प्रेरक आयोजन

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Published On: 20 December 2025
कुंदकुंद ज्ञानपीठ इंदौर में दुर्लभ पांडुलिपि प्रदर्शनी राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान
— राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर कुंदकुंद ज्ञानपीठ परिसर में आयोजित दुर्लभ पांडुलिपियों एवं संग्रहालय प्रदर्शनी।

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कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी: भूमिका

कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी इंदौर के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई। धर्म, भाषा, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण को समर्पित यह दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन न केवल विद्वानों का संगम बना, बल्कि युवाओं और समाज के लिए प्रेरणास्रोत भी सिद्ध हुआ।

भव्य उद्घाटन समारोह की झलक

इंदौर स्थित दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट द्वारा संचालित कुंद-कुंद ज्ञानपीठ में आयोजित कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज के पावन सानिध्य में हुआ।
मुख्य अतिथि शंकर लालवानी एवं कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. जयकुमार उपाध्ये द्वारा दीप प्रज्वलन कर उद्घाटन किया गया। वेदिका जैन की सांगीतिक प्रस्तुति ने मंगलाचरण से वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति

इस कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षा, संस्कृति और दर्शन जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान उपस्थित रहे, जिनमें

  • प्रोफेसर रेणु जैन
  • बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय के कुलगुरु सुरेशकुमार जैन
  • प्रोफेसर नलिन के शास्त्री
  • महर्षि पाणिनि विश्वविद्यालय के कुलगुरु शिवशंकर मिश्रा
  • प्रोफेसर संगीता मेहता एवं राहुल सिंघई प्रमुख रहे।
कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन सांसद शंकर लालवानी द्वारा दीप प्रज्वलन
कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ, मंच पर प्रमुख अतिथि और विद्वान उपस्थित।

धर्म, भाषा और संस्कृति संरक्षण का संकल्प

सांसद शंकर लालवानी ने कहा कि कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी जैसे आयोजन भारतीय सभ्यता की आत्मा को सहेजने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कासलीवाल परिवार की तीसरी पीढ़ी द्वारा निरंतर किए जा रहे इस सेवा कार्य को “प्रेरक और राष्ट्रहितकारी” बताया।

प्राकृत वाङ्मय और सिरि भूवलय का महत्व

इंजीनियर अनिलकुमार जैन ने अपने उद्बोधन में सिरि भूवलय ग्रंथ की दार्शनिक एवं गणितीय विशेषताओं पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर संगीता मेहता ने प्राकृत विद्या को जनभाषा की आत्मा बताते हुए कहा कि युवाओं के लिए यह ज्ञानपीठ एक सशक्त मंच बन रहा है।

विद्वानों के विचार: भारतीय ज्ञान परंपरा

प्रोफेसर नलिन के शास्त्री ने कहा कि प्राकृत भाषा सदियों तक जन-जन की भाषा रही है और अधिकांश प्राचीन ग्रंथ इसी में रचे गए। कुलगुरु शिवशंकर मिश्रा ने जैन दर्शन के योगदान को भारतीय ज्ञान परंपरा की रीढ़ बताया।

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज का संदेश

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने कहा कि जिनवाणी के प्रचार-प्रसार के लिए विद्वानों का ज्ञान, समाज का सहयोग और साधु का सानिध्य—तीनों का संगम आवश्यक है। यही संगम कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी की सबसे बड़ी शक्ति है।

पांडुलिपि प्रदर्शनी और संग्रहालय उद्घाटन

कार्यक्रम के प्रारंभ में ज्ञानपीठ परिसर में दुर्लभ पांडुलिपियों एवं मूर्तियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ। अतिथियों ने संग्रहालय की मुक्तकंठ से प्रशंसा की और इसे शोधार्थियों के लिए अनमोल धरोहर बताया।

कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी इंदौर में धर्म संस्कृति और साहित्य संरक्षण पर दो दिवसीय आयोजन
इंदौर स्थित कुंदकुंद ज्ञानपीठ में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में धर्म, भाषा और संस्कृति संरक्षण पर विद्वानों का मंथन।

समाज की सहभागिता और प्रेरणा

इस कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी में मनोहर झांझरी, दिलीप पाटनी, विजय काला, रितेश पाटनी, डी.के. जैन (DSP), रेखा जैन, संजय पापड़ीवाल सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

निष्कर्ष

कुंदकुंद ज्ञानपीठ राष्ट्रीय संगोष्ठी ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म, भाषा, संस्कृति और साहित्य का संरक्षण केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है। यह आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा को नई ऊर्जा देने वाला, शक्तिशाली और प्रेरक प्रयास बनकर उभरा है।

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