कोटा में श्री राम कथा का चतुर्थ दिवस: गुरुदेव जयकीर्ति जी गुरुराज ने समझाई कर्मों की विचित्रता और आहार दान की महिमा
कोटा, राजस्थान। रामपुरा कोटा में विराजमान विशिष्ट राम कथाकार, अनुष्ठान विशेषज्ञ एवं परम पूज्य ध्यान दिवाकर मुनि प्रवर 108 श्री जयकीर्ति जी गुरुराज द्वारा प्रवर्तित श्रीराम कथा का चतुर्थ दिन आध्यात्मिक रस, ज्ञान-वर्षा और नीति-उपदेशों से परिपूर्ण रहा।
दिनांक 21 नवंबर से 30 नवंबर तक चल रही यह भव्य श्री राम कथा पद्म पुराण पर आधारित है, जिसमें प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आध्यात्मिक चिंतन में सहभागी हो रहे हैं। कथा स्थल पर महाराष्ट्र के विद्या गागर म्यूजिकल ग्रुप द्वारा प्रस्तुत मधुर भक्ति संगीत वातावरण को और भी रमणीय बना रहा है।
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” ने बताया कि कथा के चतुर्थ दिवस पर गुरुदेव श्री जयकीर्ति जी ने “संसार में कर्मों की विचित्रता बड़ी निराली है” विषय पर विस्तृत प्रवचन दिया और जीवन में आहार दान के अमूल्य महत्व को सरल, सहज और प्रासंगिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया।
आहार दान: केवल भोजन नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग — गुरुदेव जयकीर्ति जी
गुरुदेव ने अपनी अमृत वाणी में कहा कि—
“आहार दान केवल भोजन देना नहीं है, बल्कि यह दाता को आरोग्य, संयम, ध्यान, ज्ञान, तप, रत्नत्रय और मोक्ष जैसी सर्वोच्च उपलब्धियों का कारण बनता है। सौभाग्यशाली जीव ही मुनिराज को आहार देने का पुण्य अर्जित करते हैं।”
उन्होंने पद्म पुराण का संदर्भ देते हुए बताया कि आहार दान के प्रभाव से ही राम–लक्ष्मण–सीता को दिव्य, सुख-सुविधाओं से युक्त रथ की प्राप्ति हुई, जिसके माध्यम से वे दंडक वन से हिमगिरि पर्वत तक का दिव्य पर्यटन करते हुए पहुंचे। लक्ष्मण द्वारा निर्मित सुंदर कुटिया का वर्णन भी गुरुदेव ने मनोहारी शैली में प्रस्तुत किया।
रावण वंश की उत्पत्ति, कठिन तप और दशानन नाम का रहस्य
कथा के दौरान गुरुदेव जयकीर्ति जी ने राक्षस वंश की उत्पत्ति, रावण का जन्म, उसकी बाल लीला और दशानन नामकरण का रहस्य बताते हुए कई आध्यात्मिक और नैतिक सूत्रों का उद्घाटन किया।
गुरुदेव ने बताया—
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रावण और उसके भाइयों ने कठोर तप किया।
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यक्षों और देवियों के उपद्रवों से विचलित हुए बिना दृढ़ संकल्प से साधना की।
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उनकी तपश्चर्या इतनी तीव्र थी कि यदि उसी स्थान पर कोई मुनिराज साधना करते, तो तत्काल मुक्ति प्राप्त कर लेते।
यह उपदेश तप, संयम और साधना की वास्तविक शक्ति को दर्शाता है।
शूर्पणखा (चंद्रनखा), शम्बूक और सूर्यहास खड्ग की कथा
गुरुदेव ने आगे चंद्रनखा (शूर्पणखा) और उसके पुत्र शम्बूक की कथा का अद्भुत वर्णन किया:
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गुरुजनों ने शम्बूक को सूर्यहास खड्ग साधना से रोका, परंतु उसने जिद में 12 वर्ष कठोर तप किया।
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पुण्योदय से लक्ष्मण को सूर्यहास खड्ग प्राप्त हुआ।
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पापोदय से उसी खड्ग द्वारा शम्बूक का अंत हुआ।
कथा के इस प्रसंग को गुरुदेव ने इतने जीवंत ढंग से प्रस्तुत किया कि सभागार में सभी की भावनाएँ उमड़ पड़ीं।
सीता हरण का हृदयस्पर्शी वर्णन: श्रोताओं की आँखें छलक उठीं
गुरुदेव ने सीता हरण का प्रसंग ऐसी शैली में सुनाया कि वातावरण करुणा और भावनाओं से भर उठा—
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चंद्रनखा का मोह
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खर-दूषण का युद्ध
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रावण का छल
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सीता का हरण
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और अंत में राम का करुण विलाप
गुरुदेव द्वारा राम की व्याकुलता का वर्णन सुनकर श्रोताओं की आँखें नम हो गईं। कथा में गुरुदेव ने बताया कि—
“राम केवल अपनी पत्नी का नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का विलाप कर रहे थे।”
जटायु मोक्ष और णमोकार मंत्र का प्रभाव
कथा के दौरान गुरुदेव ने जटायु प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि—
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रावण से सीता की रक्षा करते हुए जटायु घायल होकर गिरे,
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परंतु राम के मुख से णमोकार मंत्र सुनकर उसी क्षण देवत्व को प्राप्त हो गए।
यह प्रसंग आध्यात्मिक शक्ति, मंत्र-बल और त्याग की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
कथा में गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति
आज की धर्मसभा में कई प्रतिष्ठित श्रावक-श्रेष्ठी उपस्थित रहे, जिनमें शामिल हैं—
विमल जी मूवासा, दीपचंद पहाड़िया, जवाहर जैन, अंतिम बड़जात्या, मनोज बज, विमल जैन दरा, चेतन प्रकाश, राजेंद्र जैन, तेजमल खटोड़, त्रिलोक लुहाड़िया, निखिलेश सेठी, निर्मल पोरवाल सहित कई श्रद्धालु।
इसके अतिरिक्त, मां जिनवाणी की पालकी अर्पण का सौभाग्य
श्रीमती कमलाभाई, दीपक स्वेटर, सन्नी, आंचल गंगवाल परिवार को प्राप्त हुआ।
समापन
कोटा रामपुरा की यह श्री राम कथा आध्यात्म, नीति-ज्ञान और चरित्र निर्माण का अनुपम संगम बनी हुई है। गुरुदेव जयकीर्ति जी गुरुराज की वाणी ने श्रोताओं को कर्म, आहार दान, तप, संयम, त्याग और धर्म के गूढ़ रहस्यों से अवगत कराया।
कथा प्रतिदिन और भी भावपूर्ण रूप ले रही है और श्रद्धालु भक्ति-रस में डुबकी लगाते जा रहे हैं।



