*मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज का लखनऊ में होगा चातुर्मास*
16 को मंगल प्रवेश,19 को कलश स्थापना
मुरैना/लखनऊ (मनोज जैन नायक) Jain संत गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवृती शिष्य उपाध्याय विहसंत सागर महाराज का मंगल वर्षायोग उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आशियाना जैन मंदिर में होने जा रहा है । पूज्य महाराजजी का 16 जुलाई को भव्य नगर प्रवेश होगा एवं 19 जुलाई को वर्षायोग मंगल कलश स्थापना समाराेह होगा ।
जैन संतों का वर्षायोग लगभग चार माह का होता है । वर्षा ऋतु के चार महीनों जुलाई से अक्टूबर तक के समय को चातुर्मास या वर्षायोग कहते हैं ।
इस दौरान जैन साधु संत मुनि, आर्यिका और उनका संघ एक ही स्थान पर रहकर साधना करते है। इस दौरान जैन साधु संत पदयात्रा या विहार नहीं करते हैं और एक ही नगर या मंदिर में रहकर धर्म-प्रसार, ध्यान और स्वाध्याय करते हैं । इस समय वर्षा ऋतु में छोटे जीवों, कीड़े-मकोड़ों और वनस्पतियों की उत्पत्ति अत्यधिक होती है। निरंतर विहार करने से अनजाने में इन जीवों को नुकसान पहुँच सकता है।

अहिंसा के व्रत का पालन करने के लिए संत एक ही स्थान पर स्थिर हो जाते हैं ताकि जीव हिंसा न हो । यह समय संतों के गहन ध्यान, तपस्या और श्रद्धालुओं को धार्मिक शिक्षा देने के लिए समर्पित होता है । आगम अथवा जैन शास्त्रीय विधान के अनुसार, यह योग आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी की रात से शुरू होकर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तक चलता है । यह समय संतों के गहन ध्यान, तपस्या और श्रद्धालुओं को धार्मिक शिक्षा देने के लिए समर्पित होता है ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बहुत जल्द लखनऊ की धरा एक ऐसे मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसंत सागर जी महाराज का चातुर्मास होने वाला है जिनके ज्ञान, भक्ति और शक्ति से लोग एक अलग तरह की ऊर्जा प्राप्त करेंगे। चार महीने चलने वाले चातुर्मास कई तरीके के अनुष्ठान किए जाएंगे ।

वर्षायोग हेतु 16 जुलाई को पूज्यश्री का भव्य मंगल प्रवेश लखनऊ में होगा एवं आगामी 19 जुलाई को श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर जैन आशियाना लखनऊ में मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री विहसंत सागर मुनिराज (ससंघ) अपने चातुर्मास का कलश स्थापना करेंगे।
मेडिटेशन गुरु ने अपने संत जीवन में दस वर्षा योग उत्तर प्रदेश, पांच वर्षा योग दिल्ली, सात वर्षा योग मध्य प्रदेश, दो वर्षा योग छत्तीसगढ़ व एक वर्षा योग हरियाणा मैं किया है। जिन्होंने अब तक 80 मंदिरो का जीर्णोद्धार, 55 पंचकल्याणक, 380 वेदी प्रतिष्ठा, 95 शिखर, 780 शिखर कलशा रोहण, 47 नवीन जिन मंदिर, 13 चौबीसी मान स्तंभ, कीर्ति स्तंभ,187 संत भवन, 59 श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान, 6 हॉस्पिटल, 7 जैन स्कूल व 3 भोजन शाला संचालित करवाई है।

गुरुश्री अब तक 26 वर्षो में 90 हजार किलोमीटर की पद यात्रा कर चुके है। महाराज श्री ने आजीवन 80 चीजों को अपने खान-पान से त्याग कर रखा है। जिसमें मुख्य रूप से दही, तेल और मीठी वस्तुएं शामिल है। वह मंदिर का जीर्णोद्धार के समय एक चीज का त्याग करते है। फिर संकल्प के साथ जीर्णोधार पूर्ण होने पर उसका आजीवन उसका त्याग करते है।
महाराज श्री के वचन में हमेशा सरस्वती विराजमान रहती है जिनका कहा हर कार्य लगभग पूरा होता है। महाराज श्री दिन भर में चार बार लोगों को धर्म और भक्ति का ज्ञान भी देते हैं। महाराज श्री आजीवन हर प्रकार की दवाइयों का त्याग कर रखा है। महाराज श्री से पूरे भारत वर्ष में हजारों श्रद्धालु जुड़े हुए हैं। महाराज श्री की भक्ति से हमेशा लोगों का कल्याण हुआ है।

