छह द्रव्यों के यथार्थ ज्ञान से आत्मा को मिलता है सम्यग्दर्शन — आर्यिका संगममति
जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों का सरल और आध्यात्मिक विवेचन, आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का किया आह्वान
मुरैना/अम्बाह (मनोज जैन नायक)। चातुर्मास के पावन अवसर पर जैन बगीची, अम्बाह में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य गुरुमां आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ने जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों पर प्रेरणादायी प्रवचन दिए। उन्होंने छह द्रव्यों के महत्व को सरल, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि इनका यथार्थ ज्ञान ही आत्मा में सम्यग्दर्शन का उदय कराता है और यही मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी है।
गुरुमां आर्यिका श्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार यह संपूर्ण लोक छह अनादि-अनंत द्रव्यों से निर्मित है। ये छह द्रव्य हैं— जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। प्रत्येक द्रव्य का अपना स्वतंत्र स्वरूप और विशेष महत्व है। इनका सही ज्ञान मनुष्य को वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में समझने की दृष्टि प्रदान करता है।
छह द्रव्यों का बताया आध्यात्मिक महत्व
आर्यिका श्री ने कहा कि जीव द्रव्य चेतन तत्व है, जिसमें ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य जैसे अनंत गुण विद्यमान हैं। जीव ही आत्मा का स्वरूप है और अपने शुद्ध रूप में वह परम आनंद एवं मोक्ष को प्राप्त करने की क्षमता रखता है।
उन्होंने बताया कि पुद्गल द्रव्य जड़ तत्व है, जिससे शरीर और समस्त भौतिक संसार का निर्माण होता है। इसके अतिरिक्त धर्म और अधर्म द्रव्य के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि ये किसी धार्मिक क्रिया या आलस्य के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जैन दर्शन में इन्हें गति और स्थिति में सहायक माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया है।
गुरुमां ने कहा कि धर्म द्रव्य जीव और पुद्गल की गति में सहायक होता है, जबकि अधर्म द्रव्य गति करने वाले द्रव्यों को ठहरने में सहयोग प्रदान करता है। वहीं आकाश द्रव्य सभी द्रव्यों को स्थान उपलब्ध कराता है और काल द्रव्य परिवर्तन, उत्पत्ति, विनाश तथा घटनाओं के क्रम का निमित्त कारण बनता है।

सम्यग्दर्शन के लिए आवश्यक है वास्तविक ज्ञान
आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि जैन दर्शन मनुष्य को प्रत्येक वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में जानने और समझने की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति छह द्रव्यों के स्वभाव और उनके पारस्परिक संबंधों को समझता है, तब उसके भीतर सही श्रद्धा का विकास होता है।
उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षमार्ग के तीन महत्वपूर्ण आधार हैं। इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा आत्मकल्याण के मार्ग को अधूरा बना देती है। इसलिए प्रत्येक साधक को शास्त्रों का अध्ययन, सत्संग, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर आत्मशुद्धि का संदेश
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुमां ने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन को केवल बाहरी आडंबरों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार में संग्रह की प्रवृत्ति मनुष्य को मोह और बंधनों की ओर ले जाती है, जबकि आत्मशुद्धि, संयम, करुणा और विवेकपूर्ण जीवन मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर छिपे राग-द्वेष और कषायों को दूर कर आत्मा की पवित्रता की ओर बढ़ना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मा को निर्मल बनाना और जीवन में शांति एवं सदाचार स्थापित करना है।

बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभ
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, महिलाएं, युवक-युवतियां एवं बच्चों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। सभी ने आर्यिका श्री के ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना तथा धर्मलाभ प्राप्त किया।
प्रवचन के उपरांत श्रद्धालुओं ने आर्यिका संगममति माताजी से आशीर्वाद प्राप्त कर नियमित स्वाध्याय और धर्म साधना करने का संकल्प लिया।
धर्मसभा के प्रारंभ में पूज्य गुरुमां के करकमलों में जिनवाणी प्रदान करने का सौभाग्य श्रीमती नीलम महेशचंद्र जैन, झाबुआ वाले परिवार को प्राप्त हुआ।
