Jabalpur आबकारी विभाग में टेंडर विवाद: अफसर की पत्नी को मिला शराब गोदाम का ठेका
Jabalpur , मध्यप्रदेश: जबलपुर आबकारी विभाग में शराब भंडारण गोदाम के टेंडर को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश के पांच जिलों Jabalpur , सीहोर, सिवनी, मंडला और छिंदवाड़ा में शराब भंडारण के लिए रखे गए टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। विवाद का केंद्र इस बार वह टेंडर रहा, जिसमें सबसे महंगी बोली लगाने वाली निविदाकर्ता को ही ठेका मिल गया। इस निविदाकर्ता का संबंध सीधे विभाग के वरिष्ठ अधिकारी से है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
टेंडर प्रक्रिया और विवाद
टेंडर प्रक्रिया 10 जून 2023 को शुरू की गई थी। इसमें चार पक्षों ने निविदा पेश की थी। राशी सोनी ने आठ रुपये प्रति वर्ग फीट, आर एग्रो मार्केटिंग कंपनी की संचालक भावना अग्रवाल ने 11 रुपये, भूमि एग्रो की संचालक प्रो. चेतना पांडे ने आठ रुपये और मीना पांडे, पत्नी अरुण कुमार पांडे ने 17.30 रुपये प्रति वर्ग फीट की बोली दी। इन चारों में सबसे महंगी बोली देने वाली मीना पांडे को ठेका दिया गया।
विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि मीना पांडे, मप्र के पूर्व आबकारी आयुक्त अरुण पांडे की पत्नी हैं। विवाद यह है कि टेंडर में सबसे महंगी बोली को स्वीकार करना सामान्य प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना जाता। आम तौर पर, न्यूनतम दर पर बोली देने वाले को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि राज्य के संसाधनों और जनता के हितों का संरक्षण हो सके।
गोदाम का असामान्य उपयोग
इस टेंडर के तहत जबलपुर स्थित महाराजपुर में पूर्व में गेहूं और चावल के भंडारण के लिए इस्तेमाल होने वाले वेयरहाउस को अब शराब गोदाम में परिवर्तित कर दिया गया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या विभाग ने गोदाम का उचित उपयोग सुनिश्चित किया है या निजी हितों को प्राथमिकता दी गई।
दस्तावेज छिपाने और शिकायतों पर दबाव
सूत्रों के अनुसार, टेंडर के दस्तावेज और प्रक्रिया से संबंधित जानकारियाँ लंबे समय तक सार्वजनिक नहीं की गईं। मामले की शिकायत भोपाल स्थित आबकारी विभाग तक पहुंची थी, लेकिन इसे दबा दिया गया। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के बजाय दबाव और संरक्षण के माध्यम से विशेष पक्ष को लाभ पहुंचाया गया।
Jabalpur में यह पूरी प्रक्रिया उस समय हुई जब केसी अग्निहोत्री उपायुक्त के पद पर थे। टेंडर खुलने के दौरान सहायक जिला आबकारी अधिकारी विकास त्रिपाठी, सिवनी के जिला आबकारी अधिकारी शैलेष जैन, संभागीय उड़नदस्ते के सहायक ग्रेड तीन अशोक जायसवाल और प्रभारी सहायक आयुक्त रामजी पांडे मौजूद थे। इन सभी अधिकारियों के हस्ताक्षर टेंडर में शामिल हैं।
सबसे महंगी बोली क्यों स्वीकार की गई?
टेंडर के दस्तावेजों के अनुसार, मीना पांडे की बोली 17.30 रुपये प्रति वर्ग फीट थी, जो अन्य तीन बोलीदाताओं से कहीं अधिक थी। सामान्य नियमों के अनुसार न्यूनतम दर पर बोली देने वाले को प्राथमिकता मिलती है, लेकिन इस मामले में सबसे महंगी बोली स्वीकार की गई। इससे सवाल उठते हैं कि क्या निविदा प्रक्रिया में पक्षपात हुआ या यह केवल नियमानुसार फैसला था।
तीन साल तक दस्तावेज दबाए गए
टेंडर पूरा होने के बाद भी अन्य तीन पक्षों ने किसी विरोध की आवाज नहीं उठाई। सूत्रों के अनुसार, इसे सुनिश्चित करने के लिए विभाग और ठेका पाने वाले पक्ष ने दबाव बनाया। ऐसे में यह आरोप भी लग रहे हैं कि निविदा प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता नहीं थी और दस्तावेज तीन साल तक सार्वजनिक नहीं किए गए।
अधिकारियों और संबंधित पक्ष का बयान
सहायक जिला आबकारी अधिकारी विकास त्रिपाठी ने कहा, “शराब भंडार का टेंडर दो साल पूर्व हुआ था और मीना पांडे को मिला। इसके अलावा मुझे इस संबंध में अधिक जानकारी नहीं है।”
पूर्व आबकारी आयुक्त अरुण पांडे ने कहा, “इस संबंध में आप संबंधित आबकारी अधिकारी और कलेक्टर से संपर्क करें। मैं इस पर कुछ नहीं बता सकता।”
विभागीय जांच और भविष्य की कार्रवाई
Jabalpur आबकारी विभाग ने मामले की जांच गुप्त रूप से शुरू कर दी है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि टेंडर प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता हुई या नहीं। यह मामला मध्यप्रदेश में सरकारी टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
निष्कर्ष
Jabalpur आबकारी विभाग का यह टेंडर विवाद यह दर्शाता है कि सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनाए रखना कितना आवश्यक है। जब अधिकारी और उनके परिवार के सदस्य लाभार्थी बन जाते हैं, तो जनता और मीडिया में सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रदेश की आबकारी नीति और टेंडर नियमों को अब और स्पष्ट करना होगा ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके और सरकारी संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित हो।
