ईरान-अमेरिका संघर्ष के बावजूद भारत में नहीं आया Petrol-Diesel का संकट
डिजिटल डेस्क। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। इस संकट ने कई देशों में ईंधन की आपूर्ति बाधित कर दी, जिससेPetrol-Diesel की कीमतें बढ़ने लगीं। भारत की तेल और गैस आपूर्ति श्रृंखला भी प्रभावित हुई, लेकिन देश ने कुशल रणनीति अपनाकर संकट को टाला।
रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध के कारण भारत में कच्चे तेल की खपत में करीब 15% की गिरावट आई। आम तौर पर ऐसा समय पेट्रोल-डीजल की कीमतों और उपलब्धता पर सीधा असर डालता है, लेकिन भारत ने रणनीतिक उपायों से उपभोक्ताओं को राहत दी।
रूस से तेल आयात में तेजी
भारत ने अमेरिका द्वारा दी गई 30 दिन की विशेष छूट का लाभ उठाते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। फरवरी की तुलना में मार्च में रूस से तेल आयात लगभग 90% बढ़ गया। यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए निर्णायक साबित हुआ।
इसके अलावा, भारत ने अपनी तेल टोकरी का विस्तार करते हुए अंगोला, गैबॉन और घाना जैसे अफ्रीकी देशों से भी तेल खरीदना शुरू किया। इस रणनीति से न केवल भारत की तेल आपूर्ति बनी रही, बल्कि वैश्विक संकट के समय देश को पेट्रोल और डीजल की कमी से बचाया गया।
एलपीजी और एलएनजी आपूर्ति पर असर
ईरान-अमेरिका संघर्ष ने रणनीतिक “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज” को प्रभावित किया, जिससे भारत के एलपीजी आयात में 40% की गिरावट आई और कतर से होने वाले एलएनजी आयात पर भी दबाव पड़ा। कतर एनर्जी द्वारा घोषित “फोर्स मेज्योर” ने स्थिति और चुनौतीपूर्ण बना दी।
इस कमी की भरपाई के लिए भारत ने अमेरिका, ओमान और नाइजीरिया जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाई। साथ ही, घरेलू उत्पादन बढ़ाकर औद्योगिक खपत को सीमित किया गया, जिससे 33 करोड़ से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी की उपलब्धता सुनिश्चित हुई।
वैकल्पिक मार्गों का महत्व
विशेषज्ञों के अनुसार, सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन और यूएई की हबशान-फुजैराह लाइन जैसे वैकल्पिक मार्गों ने भारत की तेल आपूर्ति बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। समुद्री बाधाओं और युद्ध के बावजूद ये मार्ग देश को ईंधन संकट से बचाने में कारगर साबित हुए।
केप्लर एनालिटिक्स के विशेषज्ञों का कहना है कि रूस से तेल की खरीद अप्रैल तक जारी रहेगी। इसके साथ ही, ईरान और वेनेजुएला से अतिरिक्त आपूर्ति की संभावना भविष्य के जोखिमों को कम कर सकती है।
घरेलू उपाय और रणनीति
भारत ने घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। पेट्रोल और डीजल के संकट से बचने के लिए विभिन्न भंडारण सुविधाओं में रिजर्व बढ़ाया गया।
औद्योगिक खपत को नियंत्रित किया गया और आवश्यक सेवाओं एवं घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी गई। इस रणनीति ने देश में पेट्रोल और डीजल की स्थिरता बनाए रखने में मदद की।
वैश्विक बाजार पर प्रभाव
ईरान-अमेरिका संघर्ष ने वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल ला दिया। कई तेल निर्यातक देशों को भारी चुनौती का सामना करना पड़ा। भारत ने इस दौरान रणनीतिक संतुलन बनाए रखा। इसके चलते घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों में अचानक वृद्धि नहीं हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक तेल संकट लंबी अवधि तक जारी रहा तो भारत को वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और ऊर्जा स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
भविष्य की संभावनाएँ
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर वैश्विक तनाव जारी रहता है, तो भारत को अतिरिक्त वैकल्पिक मार्गों और देशों से कच्चे तेल की खरीद पर जोर देना होगा। रूस, वेनेजुएला और अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाना और घरेलू उत्पादन बनाए रखना आवश्यक होगा।
इसके अलावा, अक्षय ऊर्जा स्रोत जैसे सौर, पवन और बायोफ्यूल में निवेश बढ़ाना दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम कदम होगा।
रणनीतिक निष्कर्ष
भारत ने ईरान-अमेरिका संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा संकट के बावजूद कुशल प्रबंधन और रणनीतिक निर्णयों के जरिए Petrol-Diesel की आपूर्ति बनाए रखी। रूस और अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाना, वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल और घरेलू उत्पादन बढ़ाना इस सफलता के मुख्य कारण रहे।
भविष्य में भी वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत की यह रणनीति निर्णायक साबित होगी।

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