‘बदलता बाल मन एवं बाल साहित्य की भूमिका’ विषय पर परिचर्चा एवं काव्यपाठ संपन्न
Indore । बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, साहित्य अकादमी, संस्कृति परिषद, मध्यप्रदेश शासन द्वारा दिनांक 22 फरवरी 2026 को दोपहर 2 बजे से 5 बजे तक ‘बदलता बाल मन एवं बाल साहित्य की भूमिका’ विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा एवं काव्यपाठ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन ‘सरजू प्रसाद पुस्तकालय, भारती भवन, मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इंदौर’ के सभागार में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में शहर के साहित्यकारों, शिक्षाविदों, बाल साहित्य रचनाकारों एवं साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ सुप्रसिद्ध साहित्य साधिका वाणी जोशी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने पूरे वातावरण को साहित्यिक गरिमा और आध्यात्मिक भाव से आलोकित कर दिया।
प्रथम सत्र : परिचर्चा
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में ‘बदलता बाल मन एवं बाल साहित्य की भूमिका’ विषय पर विचार-विमर्श आयोजित किया गया। मंचासीन अतिथियों में डॉ. विकास दवे (निदेशक, साहित्य अकादमी), वरिष्ठ बाल साहित्यकार एवं ‘देवपुत्र’ पत्रिका के संपादक गोपाल माहेश्वरी, डॉ. मीनू पांडे (निदेशक, बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, भोपाल), मीरा जैन, इंदु पाराशर एवं प्रदीप नवीन उपस्थित रहे।
स्वागत उद्बोधन डॉ. मीनू पांडे द्वारा दिया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आज के परिवर्तित सामाजिक और तकनीकी परिदृश्य में बाल साहित्य की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। बाल मन की जिज्ञासाओं, संवेदनाओं और बदलती मानसिक संरचना को समझे बिना प्रभावी बाल साहित्य की रचना संभव नहीं है। उन्होंने इस आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह परिचर्चा केवल विचार-विनिमय का मंच नहीं, बल्कि समकालीन बाल साहित्य की दिशा तय करने का एक गंभीर प्रयास है।
मुख्य वक्ता डॉ. विकास दवे ने अपने विचार रखते हुए कहा कि “बाल मन का बदलना हम अक्सर एक चुनौती या आरोप की तरह लेते हैं, जबकि इसे हमें एक अवसर और उपहार की तरह स्वीकार करना चाहिए। यदि बाल मन स्थिर रहेगा तो समाज और साहित्य भी स्थिर हो जाएंगे। परिवर्तन जीवन का स्वाभाविक नियम है। प्रश्न यह है कि जिस तीव्र गति से आज का बाल मन बदल रहा है, क्या हम स्वयं भी उसी गति से अपने दृष्टिकोण और सृजन को परिवर्तित कर पा रहे हैं?”
उन्होंने आगे कहा कि तकनीकी हस्तक्षेप, डिजिटल माध्यमों का बढ़ता प्रभाव और सामाजिक संरचना में आए बदलावों ने बच्चों की सोच, रुचि और व्यवहार को गहराई से प्रभावित किया है। ऐसे में बाल साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे इन परिवर्तनों को समझें और बाल साहित्य को समयानुकूल, संवेदनशील और रचनात्मक दिशा प्रदान करें।
वरिष्ठ बाल साहित्यकार गोपाल माहेश्वरी ने कहा कि बाल मन स्वभावतः चंचल, जिज्ञासु और कल्पनाशील होता है। इस चंचलता को सहेजना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही रचनात्मकता का आधार है। उन्होंने कहा कि बच्चों को पूरी स्वतंत्रता देना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उनके हित में कुछ अनुशासनात्मक सीमाएँ भी हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बाल मन गलती करता है, प्रयोग करता है, प्रश्न पूछता है — और इसी प्रक्रिया में सीखता है। बाल साहित्य की सार्थकता भी इसी में है कि वह बच्चों को प्रश्न पूछने, सोचने और स्वयं निर्णय लेने की प्रेरणा दे। उन्होंने कहा कि “हम बच्चों को क्या पढ़ा रहे हैं, कैसी कहानियाँ, कविताएँ और पात्र उनके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं — यही उनके मन के विकास की दिशा तय करता है।”
विषय प्रवर्तन देवेंद्र सिंह सिसोदिया द्वारा किया गया, जिन्होंने बदलते समय में बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। प्रथम सत्र का संचालन मुकेश तिवारी ने प्रभावी ढंग से किया। चर्चाकार के रूप में डॉ. गरिमा दुबे ने विषय की विभिन्न परतों को खोलते हुए समकालीन बाल साहित्य की चुनौतियों और संभावनाओं पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए।

द्वितीय सत्र : काव्यपाठ
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में ‘बदलते बाल मन’ विषय पर काव्यपाठ आयोजित किया गया, जिसमें अनेक रचनाकारों ने अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत कीं। काव्यपाठ करने वालों में गोपाल माहेश्वरी, मनीषा बनर्जी, विनीता चौहान, आशा जाकड़, नयन कुमार राठी, शोभा जोशी ‘साक्षी’, डॉ. रेखा मंडलोई, निरुपमा त्रिवेदी, अमिता मराठे, माधुरी व्यास, अर्चना मंडलोई, अजय जैन ‘विकल्प’, सपना साहू ‘स्वप्निल’, शीला बड़ोदिया, डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, अंजुल कंसल, अर्चना पंडित, संतोष तोशनीवाल, डॉ. एकता गायकवाड़ तथा दामिनी ठाकुर प्रमुख रहे।
इन रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से आज के बाल मन की जिज्ञासा, डिजिटल युग की चुनौतियाँ, पारिवारिक परिवेश में बदलाव, प्रकृति से दूरी और संवेदनात्मक गहराई जैसे विषयों को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया। कुछ कविताएँ बाल मन की सहजता और मासूमियत को रेखांकित करती रहीं, तो कुछ ने तकनीक-प्रधान जीवनशैली के प्रभावों पर विचारोत्तेजक संकेत दिए।
इस सत्र में मीरा जैन, इंदु पाराशर एवं पदमा सिंह ने भी विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और सामाजिक चेतना का आधार है। यदि बाल साहित्य समय की नब्ज को पहचानते हुए आगे बढ़ेगा, तो वह नई पीढ़ी को सही दिशा देने में सक्षम होगा।
कार्यक्रम में डॉ. जी. डी. अग्रवाल, विजय सिंह चौहान, रेणु लेसी फ्रांसिस एवं विश्वनाथ कदम सहित अनेक प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति रही, जिन्होंने आयोजन को गरिमा प्रदान की।
द्वितीय सत्र का संचालन वाणी जोशी ने सहज और प्रभावपूर्ण शैली में किया। अंत में बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के विमर्श और रचनात्मक आयोजन बाल साहित्य को नई दृष्टि और ऊर्जा प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष
‘बदलता बाल मन एवं बाल साहित्य की भूमिका’ विषय पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं था, बल्कि समकालीन संदर्भों में बाल साहित्य की दिशा और दायित्व पर गंभीर चिंतन का मंच सिद्ध हुआ। तकनीकी युग में बच्चों की बदलती मानसिकता को समझते हुए साहित्यकारों, शिक्षकों और अभिभावकों की साझा जिम्मेदारी बनती है कि वे बाल साहित्य को समयानुकूल, मूल्यपरक और संवेदनशील बनाएँ।
इस सार्थक आयोजन ने यह संदेश दिया कि बाल मन में हो रहे परिवर्तनों को नकारने के बजाय उन्हें समझना और सकारात्मक दिशा देना ही बाल साहित्य की वास्तविक भूमिका है। कार्यक्रम ने उपस्थित सभी साहित्य प्रेमियों के मन में एक नई विचार-चेतना का संचार किया और भविष्य में ऐसे और भी रचनात्मक आयोजनों की आवश्यकता को रेखांकित किया।
