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गुरुदेव सुधासागर जी बोले- जीते जी उत्तराधिकारी बनाएं, फिर वैराग्य की ओर बढ़ें

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Published On: 14 August 2026

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गुरुदेव सुधासागर जी बोले- जीते जी उत्तराधिकारी बनाएं, फिर वैराग्य की ओर बढ़ें

संवाददाता:   राजेश जैन दद्दू

इंदौर। दलालबाग स्थित देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में जैन मुनि गुरुदेव सुधासागर जी ने गृहस्थ जीवन, दान, सेवा, शास्त्र अध्ययन, संयम और आत्मकल्याण को लेकर श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण संदेश दिए। उन्होंने कहा कि गृहस्थ व्यक्ति को जीवन की जिम्मेदारियों को समझते हुए समय रहते अपना उत्तराधिकारी तैयार करना चाहिए और इसके बाद धीरे-धीरे वैराग्य तथा आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि गुरुदेव ने अपनी मंगल देशना में श्रद्धालुओं से कहा कि मनुष्य को जीवन में कभी किसी की मजबूरी का लाभ नहीं उठाना चाहिए। यदि कोई जरूरतमंद व्यक्ति सहायता मांगता है तो उसकी मदद करनी चाहिए और सहायता के रूप में जो कुछ दिया जाए, उसे वापस लेने की भावना नहीं रखनी चाहिए। दान का उद्देश्य ही निस्वार्थ सेवा और सहयोग होना चाहिए।

जीते जी उत्तराधिकारी बनाने की सीख


गुरुदेव सुधासागर जी ने कहा कि प्रत्येक गृहस्थ को अपने जीवनकाल में ही किसी योग्य व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से धीरे-धीरे मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने गृहस्थों को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर जीवन के आध्यात्मिक उद्देश्य को समझने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को केवल धन, संपत्ति और पारिवारिक जिम्मेदारियों में ही अपना पूरा जीवन नहीं लगा देना चाहिए। जीवन में एक ऐसा समय भी आना चाहिए जब व्यक्ति आत्मचिंतन और वैराग्य की दिशा में आगे बढ़े।

किसी की मजबूरी का फायदा न उठाएं

धर्मसभा में गुरुदेव ने सेवा और मानवता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में कभी भी किसी व्यक्ति की मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहिए। यदि किसी जरूरतमंद की मदद करने का अवसर मिले तो उसे सहयोग देना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सहायता करते समय मन में लेन-देन या बदले की भावना नहीं होनी चाहिए। जो वस्तु, धन या अन्य सहायता किसी जरूरतमंद को दी जाए, उसे दान समझकर देना चाहिए। बाद में उसे वापस मांगना या उसके बदले किसी लाभ की अपेक्षा करना दान की भावना को कमजोर करता है।

शास्त्र इसलिए पढ़ें, ताकि कोई ठग न सके

गुरुदेव ने शास्त्र अध्ययन के उद्देश्य को लेकर भी श्रद्धालुओं को संदेश दिया। उन्होंने कहा कि शास्त्र केवल इसलिए नहीं पढ़ने चाहिए कि व्यक्ति खुद को ज्ञानी समझने लगे। शास्त्र पढ़ने का वास्तविक उद्देश्य जीवन में विवेक और सही-गलत की पहचान विकसित करना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान व्यक्ति को इतना सक्षम बनाए कि वह किसी के बहकावे या धोखे में न आए। ज्ञान का उपयोग अपने जीवन को सही दिशा देने और गलत आचरण से बचने के लिए किया जाना चाहिए।

बाहरी दिखावे से प्रभावित न होने की सलाह

गुरुदेव ने बाहरी वेशभूषा और दिखावे को लेकर भी श्रद्धालुओं को सावधान किया। उन्होंने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के लंबे तिलक, मीठी वाणी या विशेष पहनावे से प्रभावित होकर उसके चरित्र और आचरण का आकलन नहीं करना चाहिए।

उनका संदेश था कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके कर्म, व्यवहार और आचरण से होती है। इसलिए किसी पर आंख मूंदकर विश्वास करने के बजाय विवेक का इस्तेमाल करना आवश्यक है।

इंदौर की जनता को भी किया सावधान

प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने इंदौर की जनता का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां के लोग सरल और सीधे स्वभाव के हैं। उन्होंने कहा कि लोगों की इसी सरलता का कभी-कभी दूसरे लोग फायदा उठा सकते हैं। इसलिए नागरिकों को किसी भी व्यक्ति के बहकावे में आने के बजाय अपने विवेक से निर्णय लेना चाहिए।

उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन में सजग रहने और किसी भी प्रकार के प्रभाव या दिखावे से प्रभावित होकर निर्णय नहीं लेने की सीख दी।

जैन धर्म में नियमों के पालन पर जोर

गुरुदेव सुधासागर जी ने जैन धर्म की आचार संहिता और नियमों के पालन को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धर्म के नियमों का पालन व्यक्ति की सुविधा के अनुसार नहीं किया जाना चाहिए। साधु हों या गृहस्थ, सभी के लिए अपने-अपने धार्मिक कर्तव्यों और अनुशासन का महत्व है।

उन्होंने जैन धर्म की साधना में संयम और अनुशासन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि धर्म केवल प्रवचन सुनने या धार्मिक आयोजनों में शामिल होने का नाम नहीं है। धर्म का वास्तविक प्रभाव व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

‘धर्म की पहचान नहीं, अधर्म से बचाऊंगा’

गुरुदेव ने कहा कि वे प्रवचन के माध्यम से लोगों को केवल धर्म की पहचान कराने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि उनका उद्देश्य लोगों को अधर्म और गलत आचरण से बचने की प्रेरणा देना है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म के सिद्धांतों को सुनने के साथ-साथ उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। सत्य, संयम, सेवा, करुणा और विवेक जैसे गुणों को व्यवहार का हिस्सा बनाना ही धार्मिक जीवन की सार्थकता है।

धर्मसभा में समाजजन रहे मौजूद


दलालबाग स्थित देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे। समाजजनों ने गुरुदेव की मंगल देशना को ध्यानपूर्वक सुना और उनके संदेशों को आत्मसात करने का प्रयास किया।

धर्मसभा में समाजश्रेष्ठी अक्षय कासलीवाल, आकाश कोल, विनोद डोसी, धर्मेंद्र सिनकेम, राहुल जैन स्पोर्ट्स, राजेश जैन दद्दू सहित समाज के अनेक गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु मौजूद रहे।

धर्मसभा के दौरान वातावरण आध्यात्मिक और भक्तिमय रहा। गुरुदेव के प्रवचन में गृहस्थ जीवन में रहते हुए जिम्मेदारियों का निर्वहन करने, जरूरतमंदों की निस्वार्थ मदद करने, शास्त्रों का अध्ययन कर विवेक विकसित करने और जीवन में आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश प्रमुख रहा।

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