Indore : डेली कॉलेज बोर्ड पर नीतिगत फैसलों पर रोक, हाई कोर्ट ने दिए सीमित अधिकार; चुनाव प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
Indore स्थित प्रतिष्ठित डेली कॉलेज की चुनावी प्रक्रिया और उसके बाद बने नए बोर्ड को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी विवाद सामने आया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि नवनिर्वाचित बोर्ड फिलहाल कोई भी नीतिगत (पॉलिसी) निर्णय नहीं ले सकेगा और उसे केवल नियमित प्रशासनिक कार्यों तक ही सीमित रहना होगा। इस फैसले के बाद कॉलेज प्रशासन और चुनाव प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
हाई कोर्ट में हुई अहम सुनवाई
यह मामला 29 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्रीष्मकालीन एकलपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लैई की बेंच में हुई, जहां दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी गईं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि डेली कॉलेज के चुनाव 21 मई को संपन्न हो चुके हैं, इसलिए अदालत ने चुनाव प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव भले ही पूरे हो गए हों, लेकिन फिलहाल जो नया बोर्ड गठित हुआ है, वह किसी भी प्रकार के नीतिगत निर्णय लेने के लिए अधिकृत नहीं होगा।
बोर्ड के अधिकार सीमित किए गए
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नया बोर्ड केवल रूटीन कार्यों को ही संचालित कर सकेगा। इसका मतलब यह है कि कॉलेज के दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव, प्रशासनिक संरचना में बड़े निर्णय, वित्तीय नीतियां या अन्य महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसले फिलहाल नहीं लिए जा सकेंगे।
इस आदेश को एक तरह से “स्टे ऑर्डर ऑन पॉलिसी डिसीजन” के रूप में देखा जा रहा है, जिससे कॉलेज के प्रशासनिक अधिकार सीमित हो गए हैं।
याचिकाकर्ता की आपत्ति और नामांकन विवाद
इस पूरे मामले की जड़ चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियों में है। याचिकाकर्ता नरेंद्र सिंह बिडवाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। वे फाउंडर और ओल्ड डोनर श्रेणी में प्रत्याशी थे, लेकिन उनका नामांकन पत्र तकनीकी कमियों का हवाला देकर निरस्त कर दिया गया था।
याचिका में आरोप लगाया गया कि नामांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और चुनावी गाइडलाइन को लेकर भी कई अनियमितताएं हुईं। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान नियमों में बदलाव या नई गाइडलाइन जारी करना उचित नहीं था।
चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवाल
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि चुनावी प्रक्रिया 21 अप्रैल से शुरू हो चुकी थी और नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद ही कई नई गाइडलाइंस जारी की गईं। कोर्ट ने इस पहलू को गंभीरता से लेते हुए यह स्वीकार किया कि चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों में बदलाव करना विवादास्पद हो सकता है।
याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद नियमों में संशोधन या नए दिशा-निर्देश लागू करने की अनुमति किस सीमा तक दी जा सकती है।
कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्देश
Indore हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस मामले में विस्तृत जांच आवश्यक है। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा की गई शिकायतों की जांच फर्म एंड सोसायटी रजिस्ट्रार द्वारा की जाए।
साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी संबंधित पक्षों को सुनने के बाद विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाए और 15 दिनों के भीतर हाई कोर्ट में प्रस्तुत की जाए।
साइबर सेल को भी जांच का जिम्मा
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस की साइबर सेल को भी जांच में शामिल किया है। अदालत ने साइबर सेल को निर्देश दिया है कि वह सभी डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच कर 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट में प्रस्तुत करे।
यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की तकनीकी या डिजिटल अनियमितता की जांच की जा सके।
अन्य उम्मीदवारों की स्थिति
मामले में यह भी सामने आया कि तकनीकी कमियों के कारण एक अन्य फॉर्म भी निरस्त कर दिया गया था। इसके बाद इस श्रेणी में प्रियव्रत खिलचीपुर और विक्रम पंवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे।
यह स्थिति भी विवाद का हिस्सा बनी हुई है, क्योंकि कुछ पक्ष इसे प्रतिस्पर्धा की कमी और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल के रूप में देख रहे हैं।
गाइडलाइन और प्रक्रिया पर बहस
याचिका में यह भी कहा गया कि चुनावी गाइडलाइन बाद में तैयार की गई, जबकि प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। कोर्ट ने भी इस तथ्य को नोट किया कि नामांकन और चुनाव की पूरी प्रक्रिया की रूपरेखा पहले से स्पष्ट नहीं थी।
इससे यह सवाल उठा कि क्या चुनाव प्रक्रिया के दौरान नियमों में बदलाव करना उचित था या नहीं।
प्रशासनिक और कानूनी असर
इस आदेश का सीधा असर डेली कॉलेज के प्रशासनिक कामकाज पर पड़ेगा। नया बोर्ड फिलहाल केवल नियमित कार्य ही कर सकेगा और बड़े निर्णयों के लिए उसे कोर्ट के अंतिम फैसले तक इंतजार करना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला भविष्य में शैक्षणिक संस्थानों की चुनावी प्रक्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है।
निष्कर्ष
Indore डेली कॉलेज चुनाव विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि संस्थागत चुनावों में पारदर्शिता, नियमों की स्पष्टता और निष्पक्षता कितनी महत्वपूर्ण है। हाई कोर्ट का यह अंतरिम आदेश न केवल वर्तमान बोर्ड की शक्तियों को सीमित करता है, बल्कि पूरे चुनावी ढांचे की जांच का रास्ता भी खोलता है।
अब सभी की नजरें 15 दिनों में आने वाली फर्म एंड सोसायटी रजिस्ट्रार और साइबर सेल की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है।
