Indore BRTS High Court Case में नया मोड़, कबाड़ी ठेकेदार ने 10 लाख की रैलिंग बेचकर काम बंद किया। निगम हाईकोर्ट आदेश का इंतजार कर रहा है।
Indore BRTS High Court Case: रैलिंग बिकी, तुड़ाई रुकी, निगम की निगाहें अब हाईकोर्ट पर
Indore BRTS High Court Case ने शहर की राजनीति, प्रशासन और आम जनता – तीनों को उलझा कर रख दिया है। बीआरटीएस हटाने का फैसला पहले मुख्यमंत्री स्तर से आया, फिर हाईकोर्ट तक पहुंचा, लेकिन ज़मीन पर हालात ऐसे बन गए कि काम शुरू होकर भी अधूरा ही रह गया।
इस पूरे मामले में अब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। जिस कबाड़ी ठेकेदार को बीआरटीएस की रैलिंग हटाने का जिम्मा दिया गया था, उसने काम बीच में छोड़ दिया और इससे पहले लगभग 10 लाख रुपए की रैलिंग बेच डाली। अब निगम हाईकोर्ट के अगले आदेश का इंतजार कर रहा है और बीआरटीएस की तुड़ाई फिलहाल पूरी तरह ठप पड़ी है।
बीआरटीएस हटाने की शुरुआत कैसे हुई
इंदौर में बीआरटीएस को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। कहीं इसे ट्रैफिक का समाधान माना गया, तो कहीं इसे ही जाम की जड़ बताया गया।
जब मुख्यमंत्री स्तर से यह बयान आया कि लगभग साढ़े 11 किलोमीटर लंबे बीआरटीएस कॉरिडोर को हटाया जाएगा, तब लोगों को लगा कि अब यह काम तेजी से पूरा होगा। बाद में यही मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया और कोर्ट ने भी प्रशासन, निगम और पीडब्ल्यूडी से जवाब तलब कर लिया।
यहीं से Indore BRTS High Court Case की असली कहानी शुरू होती है।
हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला
बीआरटीएस हटाने की प्रक्रिया को लेकर कई याचिकाएं दायर हुईं। किसी ने इसे जल्द हटाने की मांग की, तो किसी ने इसे पूरी तरह खत्म करने के फैसले पर सवाल उठाए।
हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए निगम, प्रशासन, ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी सभी को तलब कर लिया। अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी गई और तब से निगम भी सतर्क मोड में आ गया।
निगम का साफ कहना है कि –
“अब सारी प्रक्रिया हाईकोर्ट के हवाले है, जब तक आदेश नहीं आएगा, तब तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जाएगा।”
ठेकेदारों की नाकामी की कहानी
बीआरटीएस की तुड़ाई के लिए जब टेंडर निकाले गए, तो हालात बेहद अजीब रहे।
- तीन बार टेंडर निकाला गया
- लेकिन कोई ठेकेदार तैयार नहीं हुआ
- आखिरकार एक स्थानीय ठेकेदार को जैसे-तैसे राजी किया गया
- उसके नाम पर एग्रीमेंट हुआ
- निगम ने 7 लाख रुपए जमा भी करवा लिए
लेकिन कुछ ही समय बाद वह ठेकेदार भी पीछे हट गया। इसके बाद पेटी कॉन्ट्रैक्टर लाया गया, लेकिन वह भी काम छोड़कर भाग गया।
यहीं से मामला और उलझता चला गया।
कबाड़ी ठेकेदार और 10 लाख की रैलिंग
जब बड़े और छोटे ठेकेदार पीछे हट गए, तब निगम ने एक कबाड़ी ठेकेदार को काम सौंप दिया।
हाईकोर्ट की फटकार के चलते एक तरफ की रैलिंग हटाई गई और एक बस स्टॉप तोड़ा गया। इससे लोगों को लगा कि अब काम रफ्तार पकड़ेगा।
लेकिन कुछ ही दिन में कबाड़ी ठेकेदार ने भी काम बंद कर दिया। उसने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि –
“यह काम घाटे का सौदा है।”
काम बंद करने से पहले उसने जो रैलिंग और अन्य सामान निकाला था, उसे लगभग 10 लाख रुपए में बेच दिया।
यही बात जब निगम को पता चली, तो हड़कंप मच गया।

निगम की कार्रवाई और जब्ती
जैसे ही निगम को रैलिंग बिकने की खबर मिली, तुरंत कार्रवाई की गई।
- बची हुई रैलिंग जब्त की गई
- सामान आजाद नगर जीटीएस और ट्रेंचिंग ग्राउंड में रखवाया गया
- पूरी प्रक्रिया अब निगम की निगरानी में है
फिलहाल बीआरटीएस की तुड़ाई का काम कई दिनों से पूरी तरह ठप पड़ा है।
निगम का कहना है कि –
“अब सब कुछ हाईकोर्ट के आदेश पर निर्भर है। जब तक निर्देश नहीं मिलते, कोई नया ठेका या काम शुरू नहीं किया जाएगा।”
महापौर की “रात वाली कार्रवाई”
इस पूरे मामले में राजनीति भी पीछे नहीं रही।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव एक रात करीब साढ़े 11 बजे जीपीओ चौराहे पहुंचे और खुद रैलिंग हटाने की शुरुआत की। इसके फोटो और वीडियो जारी कर दिए गए।
इससे यह संदेश देने की कोशिश हुई कि काम तेज़ी से शुरू हो गया है। लेकिन उसके बाद जो हालात बने, वह किसी मज़ाक से कम नहीं लगे –
- ठेकेदार भागते गए
- टेंडर फेल होते गए
- और आखिर में कबाड़ी ठेकेदार भी हाथ खड़े कर गया
यानी दिखावे की शुरुआत तो हुई, लेकिन ज़मीनी हकीकत बहुत कमजोर निकली।
जनता की नाराजगी और सवाल
आम लोग अब पूछ रहे हैं –
- क्या बीआरटीएस हटेगा या नहीं?
- अगर हटेगा तो कब?
- रैलिंग बेचने वाला ठेकेदार कैसे बच निकला?
- नगर निगम की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
लोगों को रोज़ाना जाम से जूझना पड़ता है और उन्हें लग रहा है कि यह पूरा मामला सिर्फ फाइलों और बयानों तक ही सिमट कर रह गया है।
आगे क्या हो सकता है
अब सबकी नजरें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
संभावनाएं ये हैं –
- कोर्ट सख्त आदेश देकर तुड़ाई फिर शुरू करवा सकता है
- ठेकेदारों पर कार्रवाई के निर्देश दे सकता है
- या पूरी प्रक्रिया का नया प्लान मांगा जा सकता है
जो भी हो, इतना तय है कि Indore BRTS High Court Case अब सिर्फ सड़क का मुद्दा नहीं रहा, यह प्रशासनिक क्षमता की भी परीक्षा बन चुका है।
निष्कर्ष
इंदौर का बीआरटीएस एक समय शहर की पहचान माना जाता था, लेकिन आज वही पहचान सिरदर्द बन गई है।
- मुख्यमंत्री का फैसला
- हाईकोर्ट की सख्ती
- निगम की असमंजस भरी स्थिति
- और ठेकेदारों की मनमानी
इन सबके बीच आम जनता सबसे ज्यादा परेशान है।
अब देखना यह है कि हाईकोर्ट का अगला आदेश इस उलझे हुए मामले को सुलझाता है या इसे और लंबा खींच देता है।
