Indore के भागीरथपुरा की 67 वर्षीय महिला ने जीती जिंदगी की जंग 36 मौतों के बीच 72 दिन का संघर्ष: 16 दिन वेंटिलेटर और 22 दिन ICU में रहीं
Indore के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण फैलने वाली स्वास्थ्य त्रासदी ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। इस गंभीर संकट में जहाँ अब तक 36 लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं इसी कब्र के बीच एक 67 वर्षीय महिला पार्वती कोंडला (Parvati Kondla) ने 72 दिनों की लंबी और कठिन लड़ाई के बाद जिंदगी वापस जीत ली है। यह घटना न केवल एक ‘चमत्कार’ के रूप में उभर कर सामने आई है, बल्कि प्रशासन, स्वास्थ्य सेवाओं और नागरिकों की चिंता और सवालों को भी तेज करती है।
Indore भागीरथपुरा का दूषित पानी संकट: कैसे शुरू हुआ सब कुछ?
दिसंबर 2025 के अंत में Indore के भागीरथपुरा इलाके में रहने वाले कई लोग अचानक उल्टी, दस्त और तेज़ पेट दर्द की शिकायतों के साथ अस्पताल में भर्ती होने लगे। बाद में स्वास्थ्य अधिकारियों ने पुष्टि की कि यहाँ की नलकूप और नगर निगम के पाइपलाइन में सूक्ष्मजीवों से दूषित पानी पहुंचा, जिससे स्थानीय लोगों में जल जनित संक्रमण फैल गया। प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिला कि दूषित पानी में से बैक्टीरिया और दूषित तत्व पाए गए, जो सामान्य नल के पानी से ही नहीं हटाए जा सकते थे।
समय के साथ बीमारी गंभीर रूप लेती गई। अस्पतालों में मरीजों का ताँता लग गया और स्वास्थ्य विभाग ने मामला गंभीर मानते हुए परीक्षण और निगरानी बढ़ा दी। कुछ रिपोर्टों के अनुसार पानी के इस संकट को एक क्षेत्रीय महामारी के रूप में भी घोषित किया गया
लेकिन इसी बीच इस त्रासदी में एक ऐसी कहानी भी जन्मी, जिसने लोगों के दिलों को छू लिया।
पार्वती कोंडला: 72 दिनों की जंग
67 वर्षीय पार्वती कोंडला, भागीरथपुरा की रहने वाली थी जब वह भी दूषित पानी से संक्रमित हो गईं। शुरुआत में मामूली लक्षण दिखे दस्त, उल्टी और कमजोरी — लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति बिगड़ने लगी। पार्वती को स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट दर्ज की गई।
डॉक्टरों ने बताया कि पार्वती के डिहाइड्रेशन, गम्भीर संक्रमण और अन्य जटिलताओं ने उनके शरीर को पूरी तरह से कमजोर कर दिया था। हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया और बाद में 22 दिन तक आईसीयू (ICU) में रखा गया। यहाँ उन्होंने अस्पताल के विशेष मेडिकल स्टाफ की निगरानी में कठिन दौर का सामना किया। वेंटिलेटर और आईसीयू की इन अनिश्चित रातों में पार्वती की हालत बार‑बार बदलती रही, जिससे उनके परिवार और डॉक्टरों दोनों को चिंता बनी रही।
उनके बेटे ने बताया कि “पार्वती मां पहले हमेशा घर के कामों में सक्रिया रहती थीं। लेकिन जब बीमारी ने उन्हें पकड़ लिया, तो हम सब ने शायद ही उम्मीद की थी कि वे इतनी जंग लड़ पाएंगी।” अस्पताल के चिकित्सक भी शुरुआत में उनके बचने की संभावना को कम आंक रहे थे, क्योंकि उनकी उम्र और संक्रमण की तीव्रता दोनों ही चिंताजनक थे।
लेकिन पार्वती की मानसिक दृढ़ता, अस्पताल कर्मियों की मेहनत और परिवार का समर्थन अंततः रंग लाया। 72 दिनों के लम्बे संघर्ष के बाद, जब पार्वती को वेंटिलेटर और ICU से हटाकर आम वार्ड में स्थानांतरित किया गया, तो अस्पताल में मौजूद हर कोई राहत की सांस ले उठा।
जिंदगी की हार नहीं मानी
पार्वती की बेटी, जो रोज अस्पताल में थी, कहती हैं, “हमने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। हर दिन मैं मां से कहती थी कि ‘तुम मजबूत हो, ठीक हो जाओगी’ — शायद यही सकारात्मक सोच ने उन्हें जीने की प्रेरणा दी।”
पार्वती का अब धीरे‑धीरे स्वास्थ्य सुधर रहा है। वह अब अस्पताल से छुट्टी के लिए तैयार हैं और घर वापस जाकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी फिर से शुरू करने की उम्मीद रखती हैं। अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार उनके पॉज़िटिव माइंडसेट और समय पर बेहतर इलाज ने उनका जीवन बचाया।
आलोचक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर संक्रमण को जल्दी पहचान कर समय रहते इलाज किया जाता, तो शायद मृतकों की संख्या कम भी हो सकती थी। इस पूरे संकट ने स्थानीय प्रशासन के जल आपूर्ति नेटवर्क और आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं।
प्रशासन की प्रतिक्रिया और आगे की तैयारी
दूषित पानी से हुई मौतों और बीमारियों के बाद स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम ने मिलकर कई कदम उठाए हैं। पानी की सप्लाई पद्धति की समीक्षा, पाइपलाइन की सफाई और नए जल परीक्षण की प्रक्रिया तेज़ की गई है। साथ ही, प्रभावित परिवारों और पीड़ितों को इलाज में सहायता देने के निर्देश दिए गए हैं।
स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी भी लोगों से लगातार कह रहे हैं कि वे केवल उबालकर या फिल्टर किए हुए पानी का उपयोग करें और किसी भी लक्षण के दिखते ही तुरंत नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाएँ।
निष्कर्ष: एक संघर्ष, कई सबक
Indore भागीरथपुरा का दूषित पानी संकट हमें यह सिखाता है कि स्वच्छ जल सप्लाई की गुणवत्ता को गंभीरता से लेना कितना महत्वपूर्ण है। एक तरफ जहाँ 36 लोगों की जानें गईं, वहीं पार्वती कोंडला जैसे बहादुर लोग इस कहानी में आशा की किरण बने।
पार्वती की जंग न केवल एक व्यक्ति की जीत है, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए प्रेरणा भी है, जिन्होंने इस विपत्ति का सामना किया। यह घटना प्रशासन, स्वास्थ्य व्यवस्था और नागरिक जागरुकता — तीनों के लिए एक बड़ा सबक भी है।
