हाईकोर्ट में गरमाया IAS Vandana Vaidya के फार्म हाउस केस का विवाद, टीआई निलंबन पर सवाल
IAS Vandana Vaidya के फार्म हाउस पर जुआ पकड़ने के मामले ने अब कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इस पूरे प्रकरण में थाना प्रभारी लोकेंद्र सिंह हिहोरे के निलंबन को लेकर दायर याचिका पर सोमवार को हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई, जिसमें कोर्ट ने कई गंभीर सवाल उठाए और आदेश को सुरक्षित रख लिया।
यह मामला न सिर्फ पुलिस कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि प्रशासनिक हस्तक्षेप और निष्पक्ष जांच जैसे मुद्दों को भी केंद्र में ला रहा है।
जुआ पकड़ने की कार्रवाई से शुरू हुआ विवाद
घटना 10 और 11 मार्च 2026 की रात की बताई जा रही है, जब पुलिस ने एक सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए आईएएस अधिकारी वंदना वैद्य के फार्म हाउस पर छापा मारा था। उस समय पुलिस ने मौके से कुछ लोगों को जुआ खेलते हुए पकड़ा था।
इस कार्रवाई का नेतृत्व थाना प्रभारी लोकेंद्र सिंह हिहोरे कर रहे थे। पुलिस का कहना था कि कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई थी और इसके लिए वरिष्ठ अधिकारियों से आवश्यक अनुमति और वारंट भी लिया गया था।
हालांकि, इस कार्रवाई के बाद स्थिति अचानक बदल गई और मामला प्रशासनिक विवाद में तब्दील हो गया।
टीआई का निलंबन और प्रशासनिक कार्रवाई
जुआ पकड़ने की इस कार्रवाई के तुरंत बाद, 11 मार्च को थाना प्रभारी लोकेंद्र सिंह हिहोरे सहित दो उपनिरीक्षकों को निलंबित कर दिया गया था।
बाद में दो पुलिसकर्मियों का निलंबन वापस ले लिया गया, लेकिन लोकेंद्र सिंह हिहोरे को बुरहानपुर अटैच कर दिया गया। इसी निर्णय को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
टीआई का कहना है कि उन्होंने केवल अपने कर्तव्यों का पालन किया था और कार्रवाई पूरी तरह नियमों के अनुसार की गई थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उठे गंभीर सवाल
सोमवार को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। कोर्ट ने पूछा कि—
- आईएएस अधिकारी वंदना वैद्य का बयान अब तक क्यों नहीं लिया गया?
- फार्म हाउस पर लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज कहां हैं?
- टीआई को कार्रवाई करने के बावजूद निलंबित क्यों किया गया?
- जब पुलिस ने वारंट के आधार पर कार्रवाई की थी, तो सजा क्यों दी गई?
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में कई तथ्य अस्पष्ट हैं और प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता की कमी दिखाई दे रही है।
“नाम बदलने का दबाव” वाला आरोप
टीआई लोकेंद्र सिंह हिहोरे ने अपनी याचिका में गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कार्रवाई के बाद उन पर दबाव बनाया गया था कि जुआ पकड़े जाने की रिपोर्ट में आईएएस अधिकारी का नाम और स्थान बदला जाए।
उनके अनुसार, उन्होंने इस तरह के किसी भी बदलाव से इनकार कर दिया, क्योंकि यह गलत और नियमों के खिलाफ होता।
याचिका में यह भी कहा गया है कि दबाव न मानने के कारण ही उन्हें निलंबन जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
अदालत में उठी समान कार्रवाई की मांग
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि इसी तरह की एक अन्य कार्रवाई 15 मार्च को सिमरोल क्षेत्र में भी हुई थी, जहां जुआ पकड़ा गया था। लेकिन वहां के टीआई पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि जब नियम सभी के लिए समान हैं, तो फिर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग कार्रवाई क्यों की गई।
IAS Vandana Vaidya का बयान न होने पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरे मामले में अब तक आईएएस अधिकारी वंदना वैद्य का बयान दर्ज नहीं किया गया है, जो कि जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी जांच में सभी संबंधित पक्षों के बयान लेना जरूरी होता है, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
सीसीटीवी फुटेज को लेकर भी संदेह
कोर्ट ने सबसे अहम सवाल यह उठाया कि फार्म हाउस में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज आखिर कहां हैं। यदि वे उपलब्ध हैं तो उन्हें जांच में शामिल क्यों नहीं किया गया।
यह पहलू मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पुलिस कार्रवाई बनाम प्रशासनिक निर्णय
यह मामला अब केवल एक जुआ पकड़ने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक निर्णयों के टकराव का उदाहरण बन गया है।
एक ओर पुलिस का दावा है कि उन्होंने कानून के तहत कार्रवाई की, वहीं दूसरी ओर निलंबन और स्थानांतरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
कोर्ट का रुख और अगला कदम
लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब यह मामला आने वाले दिनों में और महत्वपूर्ण निर्णय की ओर बढ़ सकता है।
कोर्ट के रुख से स्पष्ट है कि वह इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से देख रहा है और सभी तथ्यों की गहन जांच चाहता है।
निष्कर्ष
आईएएस वंदना वैद्य के फार्म हाउस से जुड़े इस जुआ प्रकरण ने प्रशासन और पुलिस व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां पुलिस अधिकारी अपनी कार्रवाई को सही ठहरा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ निलंबन और दबाव के आरोपों ने मामले को और जटिल बना दिया है।
अब सबकी नजरें हाईकोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।
