गुरु वाणी 10 अगस्त 2026 में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने भ्रम से बचने, कर्म पर विश्वास रखने, शुद्ध आहार करने और मैत्री-क्षमा का संदेश दिया।
गुरु वाणी 10 अगस्त 2026: श्री विशुद्ध सागर जी के 5 शक्तिशाली संदेश, जीवन में लाएंगे सुख और शांति
गुरु वाणी 10 अगस्त 2026: दिल्ली के ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैन महाश्रमण पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन को सुखी, शांत और पवित्र बनाने के लिए महत्वपूर्ण संदेश दिए। उन्होंने कहा कि जैन धर्म अनादि सनातन है। दिगम्बर भ्रमण मुनियों ने अनादि से इसे सम्पुष्ट किया है। यह था, है और हमेशा रहेगा।प्रवचन के दौरान श्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि मनुष्य को किसी भी बात पर जल्दबाजी में निर्णय नहीं लेना चाहिए। पहले बात को सुनें, परिस्थिति को समझें, चिंतन-मंथन करें और उसके बाद निर्णय लें।
देखो, समझो, फिर निर्णय करो
गुरु वाणी 10 अगस्त 2026 में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि जीवन में सुखी रहना चाहते हैं तो अधूरी बात सुनकर निर्णय नहीं करना चाहिए। अचानक कोई दृश्य देखकर भी फैसला नहीं करना चाहिए।कभी-कभी देखा हुआ सत्य नहीं होता और सुना हुआ भी सत्य नहीं होता। इसलिए किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पहले विचार करना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि दुनिया में जितने भी अनर्थ हुए हैं, हो रहे हैं अथवा भविष्य में हो सकते हैं, उनके पीछे भ्रम की बड़ी भूमिका होती है। भ्रम से बचना चाहिए। शंका भी शस्त्र के समान खतरनाक हो सकती है। बात को अच्छी तरह सुनें, देखें, चिंतन-मंथन करें और फिर निर्णय लें।
गिरो मत, गिराओ मत
जीवन में कोई व्यक्ति पीड़ा या कष्ट दे तो उससे बदला लेने की भावना नहीं रखनी चाहिए। कर्म स्वयं अपना हिसाब करता है। कर्म निष्पक्ष है और किसी के साथ पक्षपात नहीं करता।आचार्य श्री ने कहा कि कषाय के वेग और विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संभालना चाहिए। न खुद गिरें और न किसी को नीचे गिराएं। किसी को गिराकर ऊपर उठने के बजाय अपनी योग्यता और पुरुषार्थ से आगे बढ़ें।
शुद्ध आहार, शुद्ध विचार और शुद्ध भाषण
स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए शुद्ध एवं शाकाहारी भोजन को अपनाने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के आहार का प्रभाव उसके भाव और विचारों पर पड़ता है।“जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। जैसा पिओगे पानी, वैसी होगी वाणी।”उन्होंने कहा कि विचार और आचरण को पवित्र रखना है तो भोजन शुद्ध, सात्विक और अल्प होना चाहिए। उचित समय पर ग्रहण किया गया भोजन अमृत के समान हितकारी होता है, जबकि असमय भोजन विष के समान कष्टकारी हो सकता है।भोजन में स्वाद के साथ स्वच्छता, स्वास्थ्य, पवित्रता तथा उत्साह-उमंग का भी ध्यान रखना चाहिए। मानव के लिए शाकाहार सर्वोत्तम आहार है और शाकाहार मानवता की पहचान है।
संग्राम नहीं, समझौता करो
आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि जीवन में शांति चाहिए तो संघर्ष और श्रम करें, लेकिन संग्राम या युद्ध का रास्ता न अपनाएं। संग्राम श्रेष्ठ नहीं है, समझौता श्रेष्ठ है।जीवन में अशांति के लिए एक शत्रु भी बहुत होता है। इसलिए शत्रुता से बचना चाहिए। शत्रुता से शत्रुता बढ़ती है, जबकि मित्रता से मित्रता बढ़ती है।उन्होंने समता भाव धारण करने, मैत्री भावना रखने और क्षमा को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। क्षमा के माध्यम से पूरा विश्व मैत्री के सूत्र में बंध सकता है।
जियो और जीने दो
आचार्य श्री ने कहा कि जीना हमारा अधिकार है तो दूसरों को जीने देना भी हमारा कर्तव्य है। अधिकार मांगने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना भी आवश्यक है।उनके ये संदेश व्यक्ति को संयम, शाकाहार, क्षमा, मैत्री, विवेक और आत्मचिंतन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
प्रवचन: दिगम्बर जैन महाश्रमण पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव
स्थान: ऋषभोदय, दिल्ली
रिपोर्ट/प्रस्तुति: राजेश जैन दद्दू
नमोस्तु शासन, जयवंत हो।


