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Govt अफसरों की कुर्सी पर क्यों बिछा होता है सफेद तौलिया? रुतबे की पहचान या ब्रिटिश विरासत

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Published On: 21 April 2026
Govt अफसरों की कुर्सी पर क्यों बिछा होता है सफेद तौलिया? रुतबे की पहचान या ब्रिटिश विरासत

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दफ्तरों में आज भी कायम है यह पुरानी परंपरा

किसी भी Govt दफ्तर में कदम रखते ही अक्सर एक चीज तुरंत ध्यान खींचती है—बड़े अधिकारी की कुर्सी पर करीने से बिछा हुआ सफेद तौलिया। आधुनिक दौर में जहां दफ्तर पूरी तरह एयर कंडीशनर, आरामदायक रिवॉल्विंग कुर्सियों और मॉडर्न इंटीरियर से लैस हो चुके हैं, वहीं यह सफेद तौलिया आज भी अपनी जगह मजबूती से कायम है।

यह देखने में भले ही एक साधारण कपड़ा लगे, लेकिन इसके पीछे इतिहास, परंपरा और प्रशासनिक संस्कृति की एक लंबी कहानी छिपी हुई है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ सुविधा का हिस्सा है या फिर किसी अधिकारी के रुतबे और पद की पहचान?

ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ी है इसकी शुरुआत

इस परंपरा की जड़ें ब्रिटिश शासनकाल तक जाती हैं। माना जाता है कि अंग्रेज अधिकारी जब भारत में प्रशासनिक कामकाज करते थे, तो वे अक्सर घोड़ों या खुली गाड़ियों में लंबी यात्रा करके दफ्तर पहुंचते थे।

उस समय रास्ते कच्चे और धूल-भरे होते थे। यात्रा के बाद उनके कपड़े धूल और पसीने से खराब हो जाते थे। ऐसे में कुर्सी को साफ रखने और अपने कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए तौलिया या सफेद कपड़ा कुर्सी पर बिछाया जाने लगा।

धीरे-धीरे यह आदत प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन गई और भारतीय दफ्तरों में भी अपनाई जाने लगी।

स्वच्छता और हाइजीन से जुड़ा कारण

शुरुआती दौर में इसका सबसे बड़ा कारण स्वच्छता था। दफ्तरों में सफाई और हाइजीन बनाए रखने के लिए यह एक आसान उपाय था।

  • अधिकारी यात्रा के बाद सीधे कुर्सी पर बैठते थे
  • पसीना और धूल कुर्सी को खराब कर सकता था
  • तौलिया कुर्सी को सुरक्षित रखता था
  • कपड़ों को भी गंदगी से बचाया जाता था

इस तरह यह एक व्यावहारिक समाधान के रूप में शुरू हुआ।

पसीना और गर्मी से राहत का साधन

80 और 90 के दशक तक सरकारी दफ्तरों में एयर कंडीशनर लग्जरी माना जाता था। अधिकतर कार्यालयों में केवल पंखे होते थे, जो गर्मियों में राहत कम और गर्म हवा ज्यादा देते थे।

ऐसे में सफेद सूती तौलिया एक उपयोगी साधन बन गया।

  • यह पसीना सोख लेता था
  • कपड़ों को भीगने से बचाता था
  • लंबे समय तक बैठने में मदद करता था

इस तरह यह सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि एक जरूरत भी बन गया।

धीरे-धीरे बन गया रुतबे का प्रतीक

समय के साथ यह तौलिया सिर्फ उपयोगिता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक तरह का स्टेटस सिंबल बन गया।

सरकारी सिस्टम में जहां हर चीज पद और अधिकार से जुड़ी होती है, वहां कुर्सी पर बिछा सफेद तौलिया भी अधिकारी के ओहदे की पहचान बन गया।

  • बड़े अधिकारियों की कुर्सी पर यह जरूर दिखता था
  • यह पदानुक्रम (Hierarchy) को दर्शाने लगा
  • दफ्तर में प्रवेश करते ही यह अधिकार का संकेत बन गया

कई लोग इसे देखकर ही समझ जाते थे कि यह सीट किसी वरिष्ठ अधिकारी की है।

ब्यूरोक्रेसी कल्चर का हिस्सा

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में कई ऐसी परंपराएं हैं जो समय के साथ विकसित हुई हैं। सफेद तौलिया भी उसी ब्यूरोक्रेसी कल्चर का हिस्सा बन गया।

  • फाइलों में लाल और हरे पेन का उपयोग
  • टेबल पर नाम पट्टिका
  • और कुर्सी पर सफेद तौलिया

ये सभी चीजें मिलकर एक औपचारिक प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाती हैं।

90 के दशक तक गाड़ियों में भी था अनिवार्य

दिलचस्प बात यह है कि 80 और 90 के दशक तक यह परंपरा केवल दफ्तरों तक सीमित नहीं थी।

  • सरकारी एंबेसडर कारों में भी सफेद तौलिया रखा जाता था
  • जीप और अन्य सरकारी वाहनों में यह आम था
  • अधिकारी इसे यात्रा के दौरान भी इस्तेमाल करते थे

इससे साफ होता है कि यह केवल दफ्तर की आदत नहीं बल्कि प्रशासनिक जीवनशैली का हिस्सा था।

आधुनिक दौर में बदलता नजरिया

आज के समय में जब दफ्तर पूरी तरह आधुनिक हो चुके हैं, इस परंपरा पर सवाल भी उठने लगे हैं।

कुछ युवा अधिकारी इसे औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक मानते हैं और इसे छोड़ने की वकालत करते हैं।

  • आधुनिक दफ्तरों में अब केवल गद्देदार कुर्सियां दिखाई देती हैं
  • कई जगहों पर तौलिया परंपरा खत्म हो रही है
  • नई पीढ़ी इसे अनावश्यक मानती है

हालांकि इसके बावजूद कई सरकारी विभागों में यह परंपरा आज भी जारी है।

परंपरा बनाम आधुनिकता की बहस

यह विषय आज एक दिलचस्प बहस का हिस्सा बन चुका है—क्या यह परंपरा बनाए रखी जानी चाहिए या इसे खत्म कर देना चाहिए?

समर्थकों का मानना है कि:

  • यह प्रशासनिक गरिमा का हिस्सा है
  • यह व्यवस्था और अनुशासन दिखाता है
  • यह एक ऐतिहासिक पहचान है

वहीं विरोधियों का कहना है कि:

  • यह पुरानी औपनिवेशिक सोच का प्रतीक है
  • आधुनिक सुविधाओं में इसकी जरूरत नहीं
  • यह अनावश्यक औपचारिकता बढ़ाता है

सामाजिक और प्रशासनिक पहचान का हिस्सा

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि प्रशासनिक पहचान का हिस्सा बन चुका है।

यह दर्शाता है कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में परंपराएं कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। समय बदल गया है, तकनीक बदल गई है, लेकिन कुछ प्रतीक आज भी अपने अस्तित्व को बनाए हुए हैं।

निष्कर्ष

सफेद तौलिया जो कभी सिर्फ स्वच्छता और गर्मी से बचाव का साधन था, आज भारतीय प्रशासनिक संस्कृति का एक अनोखा प्रतीक बन चुका है। यह ब्रिटिश काल की देन भी है और भारतीय ब्यूरोक्रेसी की परंपरा भी।

हालांकि आधुनिकता के साथ इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन यह अभी भी कई दफ्तरों में एक अधिकारी के रुतबे, पद और व्यवस्था का संकेत बना हुआ है।

कह सकते हैं कि यह सफेद तौलिया सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और प्रशासनिक संस्कृति की एक जीवित कहानी है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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