Indore नगर निगम के ₹92 करोड़ फर्जी ड्रेनेज-बिल घोटाले में ED की बड़ी कार्रवाई, तीन गिरफ्तार
Indore । प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इंदौर नगर निगम से जुड़े बहुचर्चित ₹92 करोड़ के फर्जी ड्रेनेज और सीवरेज बिल घोटाले में बड़ी कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में कथित मास्टरमाइंड और नगर निगम के पूर्व सहायक इंजीनियर अभय राठौर के साथ ठेकेदार मोहम्मद जाकिर और राहुल वडेरा शामिल हैं।
यह मामला नगर निगम में हुए उस बड़े वित्तीय घोटाले से जुड़ा है, जिसमें बिना किसी वास्तविक निर्माण कार्य के केवल कागजों पर ड्रेनेज लाइन डालने और सीवरेज कार्य पूरे दिखाकर करोड़ों रुपये का भुगतान निकाल लिया गया था।
कागजों पर काम, जमीन पर कुछ नहीं
जांच एजेंसी के अनुसार यह पूरा घोटाला योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया। ठेकेदारों और कुछ निगम अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी बिल, जाली दस्तावेज और झूठे कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र तैयार किए गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सरकारी खजाने से भारी-भरकम भुगतान प्राप्त किया गया, जबकि जमीनी स्तर पर कई स्थानों पर कोई काम ही नहीं हुआ था।
ED की प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि ड्रेनेज और सीवरेज लाइन बिछाने के नाम पर फर्जी कार्य दिखाकर करोड़ों रुपये की निकासी की गई और इस पूरे नेटवर्क में तकनीकी अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई।
ED की गिरफ्तारी और PMLA कोर्ट में पेशी
ED ने लंबी जांच के बाद तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर विशेष PMLA (Prevention of Money Laundering Act) कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें आगे की पूछताछ के लिए रिमांड पर भेज दिया गया है। एजेंसी अब इस घोटाले से जुड़े पूरे नेटवर्क और अन्य संभावित आरोपियों की भूमिका की गहन जांच कर रही है।
जांच एजेंसी का मानना है कि यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक संगठित नेटवर्क की भूमिका हो सकती है, जिसमें ठेकेदारों, अधिकारियों और बिचौलियों की मिलीभगत शामिल रही है।
पहले भी हुई थी ₹34 करोड़ की संपत्ति कुर्की
इस मामले की जांच के दौरान ED पहले ही बड़ा कदम उठा चुकी है। एजेंसी ने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में आरोपियों से जुड़ी लगभग ₹34 करोड़ से अधिक की अचल संपत्तियों को कुर्क किया था। इसमें कई जमीनें, भवन और अन्य संपत्तियां शामिल थीं, जिन्हें अवैध रूप से अर्जित धन से खरीदा गया माना जा रहा है।
ED अधिकारियों के अनुसार यह कुर्की कार्रवाई घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू को ध्यान में रखते हुए की गई थी और आगे भी और संपत्तियों की पहचान की जा रही है।
फर्जी बिलिंग का पूरा खेल
प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि ठेकेदारों ने नगर निगम के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर ऐसे प्रोजेक्ट तैयार किए जिनमें कार्य केवल कागजों पर दिखाया गया। फर्जी माप पुस्तिकाएं (Measurement Books), नकली कार्य पूर्णता रिपोर्ट और झूठे बिल तैयार कर भुगतान स्वीकृत कराया गया।
इन दस्तावेजों के आधार पर नगर निगम के खातों से करोड़ों रुपये जारी कर दिए गए, जबकि वास्तविकता में कई स्थानों पर या तो काम शुरू ही नहीं हुआ या फिर नाममात्र का कार्य कर दिखाया गया।
जांच का दायरा बढ़ने की संभावना
ED की इस कार्रवाई के बाद अब जांच का दायरा और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं और धन की हेराफेरी किन-किन चैनलों के माध्यम से की गई।
अधिकारियों के अनुसार आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां भी संभव हैं तथा कई अन्य संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई की जा सकती है।
Indore नगर निगम प्रणाली पर सवाल
इस बड़े घोटाले के सामने आने के बाद इंदौर नगर निगम की कार्यप्रणाली और उसके निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बिना किसी वास्तविक भौतिक सत्यापन और स्थल निरीक्षण के आखिर करोड़ों रुपये के भुगतान की मंजूरी कैसे दे दी गई। सामान्य नियमों के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य के भुगतान से पहले तकनीकी जांच, माप पुस्तिका की पुष्टि और मौके पर कार्य की स्थिति का सत्यापन अनिवार्य होता है, लेकिन इस मामले में इन प्रक्रियाओं की अनदेखी होने की आशंका जताई जा रही है, जो जांच का प्रमुख बिंदु बन गया है।
स्थानीय स्तर पर ED की कार्रवाई और गिरफ्तारियों के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। नगर निगम और संबंधित विभागों में आंतरिक समीक्षा की चर्चा भी शुरू हो गई है। पूरे मामले को लेकर कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच असहजता का माहौल है, जबकि शहर में भी इस बड़े वित्तीय घोटाले को लेकर व्यापक चर्चा और चिंता का वातावरण बना हुआ है।
निष्कर्ष
₹92 करोड़ के इस फर्जी ड्रेनेज और सीवरेज बिल घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई ने एक बार फिर शहरी निकायों में वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की गंभीरता को उजागर किया है। यह मामला स्पष्ट करता है कि किस प्रकार कुछ अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों के नाम पर बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ियां की जा सकती हैं। बिना वास्तविक कार्य किए केवल कागजों पर परियोजनाओं को पूरा दिखाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया, जो प्रणालीगत खामियों की ओर इशारा करता है।
तीन प्रमुख आरोपियों की गिरफ्तारी और लगभग ₹34 करोड़ की संपत्तियों की कुर्की के बाद जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही हैं। ED यह पता लगाने में जुटी है कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और धन की हेराफेरी किन-किन माध्यमों से की गई। आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे तथा संभावित गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे यह जांच और व्यापक हो सकती है।
