गुरु-शिष्य का रिश्ता ज्ञान लेने-देने का नहीं, बल्कि विश्वास का रिश्ता होता है : महासती सरोज श्रीजी
नागदा में धर्मसभा के दौरान गुरु-शिष्य संबंध, आत्मविश्वास और समय के महत्व पर दिया संदेश
Nagda जंक्शन। मीडिया प्रभारी नितिन बुड़ावनवाला ने बताया कि नगर में चल रही धार्मिक गतिविधियों के अंतर्गत तपस्या क्रम में सीमा चंद्रप्रकाश काठेड़ के दो उपवास चल रहे हैं, जबकि पायल निलेश ओरा की आठ उपवास की तपस्या पूर्ण हुई। इस अवसर पर दाखा बाई ओरा परिवार की ओर से नवकार महामंत्र के जाप करवाए गए। धार्मिक वातावरण में आयोजित धर्मसभा में महासती सरोज श्रीजी ने श्रद्धालुओं को गुरु-शिष्य संबंध, विश्वास, आत्मविश्वास और समय के महत्व को लेकर प्रेरणादायी संदेश दिया।
महासती सरोज श्रीजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य के शरीर में बुद्धि, इंद्रियां और मन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये तीनों अपने-अपने स्तर पर समय-समय पर कार्य करते हैं, लेकिन जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है। व्यक्ति यदि स्वयं पर और अपने मार्गदर्शक पर विश्वास रखता है तो कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की क्षमता विकसित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में गुरुजनों का सानिध्य लगातार मिलता रहना चाहिए। गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति के जीवन में न केवल ज्ञान की वृद्धि करता है, बल्कि उनके आशीर्वाद और दृष्टि से व्यक्ति को अपने जीवन में सही दिशा चुनने की प्रेरणा भी मिलती है।
गुरु-शिष्य संबंध की नींव है विश्वास
महासती सरोज श्रीजी ने गुरु-शिष्य संबंध की व्याख्या करते हुए कहा कि गुरु और शिष्य के बीच आपसी विश्वास बेहद जरूरी है। यह रिश्ता केवल ज्ञान लेने और देने तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसकी वास्तविक नींव विश्वास पर टिकी होती है।
उन्होंने कहा कि जहां विश्वास होता है, वहां संदेह के लिए कोई स्थान नहीं रहता। इसके विपरीत जब संबंधों में संदेह प्रवेश कर जाता है तो धीरे-धीरे रिश्ते कमजोर होने लगते हैं। इसलिए शिष्य को अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए तथा गुरु के मार्गदर्शन को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गुरु का ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब शिष्य में उस ज्ञान को ग्रहण करने की पात्रता और उसे जीवन में उतारने की इच्छा हो। केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके अनुसार आचरण करना भी आवश्यक है।
समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता
धर्मसभा में महासती सरोज श्रीजी ने समय के महत्व पर भी श्रद्धालुओं को जागरूक किया। उन्होंने कहा कि समय बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है और समय कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। इसलिए व्यक्ति को वर्तमान समय का सदुपयोग करना चाहिए और अपने जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में मन को विशाल और मजबूत बनाना चाहिए। परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, व्यक्ति को धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रावण के पास सोने की लंका और अपार विद्याएं थीं, फिर भी उसे संसार से जाना पड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि धन, ज्ञान और वैभव हमेशा व्यक्ति के साथ नहीं रहते।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को कभी भी किसी अन्य व्यक्ति को अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए। हर व्यक्ति में अपनी विशेषता होती है और प्रत्येक व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने को मिल सकता है। अहंकार से व्यक्ति का विकास रुकता है, जबकि विनम्रता उसे आगे बढ़ने का अवसर देती है।
पात्रता के बिना गुरु ज्ञान भी अधूरा
महासतीजी ने कहा कि गुरु ज्ञान का लाभ तभी मिलता है, जब शिष्य में उसे ग्रहण करने की पात्रता हो। यदि व्यक्ति के भीतर विनम्रता, श्रद्धा और सीखने की भावना नहीं है तो गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान भी उसके जीवन में अपेक्षित परिवर्तन नहीं ला सकता।
उन्होंने कहा कि धार्मिक ज्ञान को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है। उसे व्यवहार में उतारना और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है। गुरु के सानिध्य से प्राप्त सीख व्यक्ति को आत्मचिंतन और आत्मसुधार की दिशा में आगे बढ़ाती है।
तपस्या और धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सहभागिता
धार्मिक कार्यक्रम के दौरान तपस्या करने वाले श्रावक-श्राविकाओं का उत्साहवर्धन किया गया। सीमा चंद्रप्रकाश काठेड़ के दो उपवास की तपस्या चल रही है, जबकि पायल निलेश ओरा ने आठ उपवास की तपस्या पूर्ण की। इस अवसर पर दाखा बाई ओरा परिवार द्वारा नवकार महामंत्र का जाप करवाया गया।
धार्मिक प्रभावना का लाभ दिलीप कुमार, अनिल कुमार, राजेन्द्र कुमार और दाखा बाई ओरा परिवार ने लिया। वहीं अतिथि सत्कार का लाभ दिलीप पार्थ कांठेड़ ने प्राप्त किया।
कार्यक्रम के दौरान 21 घंटे की दया तप का भी आयोजन किया गया, जिसमें 11 श्रावक-श्राविकाओं ने लाभ लिया। धार्मिक आयोजन के माध्यम से श्रद्धालुओं ने तप, जाप और सेवा के माध्यम से धर्म आराधना में सहभागिता की।
धर्मसभा में समाजजन रहे उपस्थित
धर्मसभा में उमेश दलाल, सुशील जैन धारवाले, बंसीलाल कोलन, वर्धमान धोका, जयेश रांठौर, मनोज कोठारी, राजेन्द्र लुणावत, रजनेश भटेवरा, अशोक कोलन, अभय चपलोत, चन्दनमल संघवी और विनोद राठौर सहित समाज के अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने महासती सरोज श्रीजी के प्रवचन का लाभ लिया और गुरु-शिष्य संबंध, आत्मविश्वास, समय के सदुपयोग तथा धार्मिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण संदेशों को आत्मसात किया।
कार्यक्रम के अंत में निर्भय चपलोत ने सभी उपस्थित श्रद्धालुओं, तपस्वियों, अतिथियों और आयोजन से जुड़े परिवारों का आभार व्यक्त किया।
नागदा से जीवनलाल जैन की रिपोर्ट
मो. 9179662633
