देलवाड़ा Jain मंदिरों को यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित करने की मांग,
इंदौर।
भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्यसभा सांसद नीराज डांगी ने राजस्थान के माउंट आबू स्थित विश्वप्रसिद्ध देलवाड़ा Jain मंदिरों को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने की पुरज़ोर मांग की है। मंगलवार, 3 फरवरी 2026 को राज्यसभा के शून्यकाल के दौरान उन्होंने यह विषय उठाकर केंद्र सरकार का ध्यान इस अनुपम धरोहर की ओर आकर्षित किया।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जानकारी देते हुए बताया कि सांसद डांगी ने देलवाड़ा जैन मंदिरों को भारतीय स्थापत्य कला, संगमरमर शिल्प और जैन सांस्कृतिक परंपरा का बेजोड़ उदाहरण बताते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय संरक्षण और सम्मान दिलाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अरावली की चोटियों पर बसी अद्भुत धरोहर
राजस्थान के सिरोही जिले में माउंट आबू की अरावली पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटी पर स्थित देलवाड़ा जैन मंदिर न केवल Jain धर्म के प्रमुख तीर्थस्थल हैं, बल्कि ये भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्टता का जीवंत प्रमाण भी हैं। श्वेत संगमरमर से निर्मित ये मंदिर अपनी बारीक नक्काशी, अलौकिक सौंदर्य और वास्तु संतुलन के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।
सांसद डांगी ने कहा कि इन मंदिरों की कला इतनी सूक्ष्म और जीवंत है कि संगमरमर पत्थर होने के बावजूद इनमें कोमलता और प्रवाह का अनुभव होता है, जो दुनिया में दुर्लभ है।
11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच हुआ निर्माण
सदन को संबोधित करते हुए सांसद डांगी ने बताया कि देलवाड़ा Jain मंदिरों का निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य हुआ था। यह मंदिर समूह कुल पांच प्रमुख जैन मंदिरों से मिलकर बना है, जिनमें—
- विमलसही मंदिर
- लूणवसही मंदिर
- महावीर स्वामी मंदिर
- पीतलहर मंदिर
- पार्श्वनाथ मंदिर
शामिल हैं। इनमें विमलसही और लूणवसही मंदिरों को स्थापत्य और शिल्पकला की दृष्टि से विश्व में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
14 वर्षों की तपस्या और हजारों शिल्पियों का योगदान
मंदिर परिसर में उपलब्ध शिलालेखों का उल्लेख करते हुए सांसद डांगी ने बताया कि वर्ष 1031 ईस्वी में इन मंदिरों के निर्माण की शुरुआत हुई थी। करीब 1500 कुशल शिल्पकारों और 1200 श्रमिकों ने लगभग 14 वर्षों तक लगातार परिश्रम कर इन मंदिरों को आकार दिया।
उस समय के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण पर लगभग 18.53 करोड़ रुपये की लागत आई थी, जो उस युग की आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक समृद्धि को दर्शाती है।
शिल्प सौंदर्य की बेजोड़ मिसाल
देलवाड़ा Jain मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी अद्वितीय नक्काशी है। मंदिरों की छतों और गुंबदों पर स्फटिक बिंदुओं की तरह झूलते कलात्मक पिंड, तोरणद्वारों की सूक्ष्म सजावट और संगमरमर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
पशु-पक्षियों, लताओं, पुष्पों और देवी-देवताओं की इतनी बारीक शिल्पकला है कि पत्थर जीवंत प्रतीत होता है। सांसद डांगी ने कहा कि ऐसी शिल्पकला की तुलना विश्व के किसी भी स्थापत्य से नहीं की जा सकती।
Jain संस्कृति के साथ लोक जीवन का समन्वय
इन मंदिरों में जैन तीर्थंकरों की 57 देहरियों में प्रतिमाएं स्थापित हैं। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के साथ-साथ यहां मां सरस्वती, लक्ष्मी जी, अंबाजी, नृसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप वध, श्रीकृष्ण द्वारा कालिया दमन और शेषनाग पर शयन करते विष्णु की मूर्तियां भी अंकित हैं।
यह दर्शाता है कि देलवाड़ा मंदिर केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उस काल की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय की भावना को भी दर्शाते हैं। यहां की शिल्पकला में लोक जीवन, नृत्य-नाट्य और तत्कालीन समाज की झलक भी मिलती है।
लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आकर्षण
हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक देलवाड़ा जैन मंदिरों के दर्शन के लिए आते हैं। यह स्थल धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्यटन का भी बड़ा केंद्र बन चुका है।
यदि इन्हें यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिलता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान और बढ़ेगी, जिससे संरक्षण, शोध और पर्यटन को नई दिशा मिलेगी।
पहले भी मिल चुका है राष्ट्रीय सम्मान
साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने बताया कि भारत सरकार के डाक विभाग द्वारा 14 अक्टूबर 2009 को देलवाड़ा जैन मंदिरों पर आधारित पांच रुपये का बहुरंगी स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था। यह दर्शाता है कि भारत सरकार पहले से ही इन मंदिरों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को स्वीकार करती रही है।
Jain समाज ने किया स्वागत
विश्व Jain संगठन, जिन शासन एकता संघ और समग्र जैन समाज के वरिष्ठजनों—महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, डॉ. जैनेन्द्र जैन, हंसमुख गांधी, टी.के. वेद, मंयक जैन एवं फेडरेशन की शिरोमणि संरक्षिका श्रीमती पुष्पा कासलीवाल ने सांसद नीरज डांगी के इस प्रयास का स्वागत किया और जैन समाज की ओर से आभार प्रकट किया।
विश्व धरोहर का दर्जा क्यों है जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि देलवाड़ा जैन मंदिर यूनेस्को के सभी मानकों पर खरे उतरते हैं। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से—
- अंतरराष्ट्रीय संरक्षण मिलेगा
- शिल्प और संरचना का वैज्ञानिक संरक्षण होगा
- पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा
- भारत की सांस्कृतिक छवि वैश्विक स्तर पर और मजबूत होगी
