दाहोद में आचार्य सुनील सागर और प्रसन्न सागर महामिलन का ऐतिहासिक आयोजन सम्पन्न हुआ। अंकलिकर परंपरा के दो महान संघों के मिलन से धर्मप्रभावना, एकता और श्रद्धा का अद्भुत संदेश मिला। हजारों श्रद्धालु इस दिव्य अवसर के साक्षी बने।
दाहोद में आचार्य सुनील सागर और प्रसन्न सागर महामिलन: अंकलिकर परंपरा के दो महान संघों का ऐतिहासिक संगम
राजेश जैन दद्दू, इंदौर।
दाहोद में आचार्य सुनील सागर और प्रसन्न सागर महामिलन
दाहोद की पावन धरा पर अंकलिकर परंपरा के दो महान संघों का ऐतिहासिक एवं मंगलमय संगम सम्पन्न हुआ। यह अवसर जैन समाज एवं श्रद्धालुओं के लिए धर्मप्रभावना, प्रेरणा और सौभाग्य का अविस्मरणीय पर्व बन गया। भव्य मिलन के दिव्य दृश्य को देखकर समाजजन हर्ष और उत्साह से भर उठे।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू, इंदौर ने जानकारी देते हुए बताया कि परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज ससंघ एवं अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ससंघ का दिव्य एवं आलौकिक मिलन दाहोद में सम्पन्न हुआ।
आचार्य सुनील सागर एवं प्रसन्न सागर का दिव्य संगम
दाहोद में आयोजित इस ऐतिहासिक महामिलन ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। दोनों आचार्य भगवंतों के ससंघ आगमन से सम्पूर्ण क्षेत्र भक्तिभाव से सराबोर हो उठा। समाजजन “नमोस्तु शासन जयवंत हो” के जयघोष के साथ इस दुर्लभ अवसर का स्वागत करते दिखाई दिए।
धार्मिक वातावरण में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को और भी भव्य बना दिया। श्रद्धालुओं ने दोनों आचार्य भगवंतों के दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस किया।
श्रद्धालुओं के लिए बना अविस्मरणीय अवसर
महामिलन के दौरान दोनों संघों के साधु भगवंतों का मैत्रीपूर्ण आलिंगन, आत्मीय संवाद और ससंघ विहार का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आंखों का महापर्व बन गया।
धर्मप्रेमियों ने कहा कि ऐसे दिव्य और दुर्लभ अवसर बहुत कम देखने को मिलते हैं। दोनों महान संतों का एक साथ मिलन जैन समाज के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय है।
शोभायात्रा और धर्मप्रभावना का अद्भुत दृश्य
आचार्य द्वय एवं उनके ससंघ ने पिच्छी-कमंडल के साथ भव्य शोभायात्रा में सहभागिता की। शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु जैन ध्वज लहराते हुए शामिल हुए।
दाहोद की सड़कों पर धर्म, श्रद्धा और उत्साह का अनूठा संगम देखने को मिला। जयकारों और मंगल ध्वनियों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठा।
अंकलिकर परंपरा की एकता का प्रतीक
राजेश जैन दद्दू ने कहा कि यह मिलन केवल दो संघों का संगम नहीं बल्कि अंकलिकर परंपरा की एकता, समर्पण और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है।
श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक अवसर को धर्म की प्रभावना और संघ शक्ति के रूप में देखा। समाज के विभिन्न वर्गों ने इसे जैन संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के लिए महत्वपूर्ण बताया।
अंतर्मना वाणी का संदेश
इस अवसर पर “ॐ हूं कल्पतरू प्रसन्न सागराय नमः” के जयघोष से पूरा मिलन स्थल गुंजायमान हो उठा।
दोनों आचार्य भगवंतों के आशीर्वचन एवं पावन उपस्थिति ने श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, साधना और आत्मकल्याण का संदेश दिया। यह ऐतिहासिक महामिलन लंबे समय तक श्रद्धालुओं की स्मृतियों में जीवंत रहेगा।
