इंदौर में गौसेवा-और गौसंवर्धन पर जोर: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गौमूत्र चिकित्सा की प्रशंसा की, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनने का आग्रह किया
इंदौर। गौसेवा और गौसंवर्धन के क्षेत्र में समर्पित प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए आज यहां आयोजित एक प्रमुख कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस अवसर पर गौमूत्र चिकित्सा पद्धति और गौशालाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण पर विशेष चर्चा हुई। इस अवसर पर यूपी के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने प्रदेश की प्रत्येक गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने का आग्रह किया।
गौसेवा-गौसंवर्धन का समर्पित प्रयास
कार्यक्रम का आयोजन श्री वीरेन्द्र कुमार जैन एवं श्रीमती रेखा जैन द्वारा संचालित “रेशम केन्द्र गौशाला” में किया गया, जो गौसेवा एवं गौसंवर्धन को समर्पित है। यह दम्पत्ति पिछले 25 वर्षों से गौमूत्र चिकित्सा पद्धति के माध्यम से गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लगभग 15 लाख से अधिक मरीजों का उपचार कर समाज में अद्वितीय सेवा कार्य कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि को जानकर प्रसन्नता व्यक्त की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गौमाता की सेवा भारत की संस्कृति और जीवनशैली का अभिन्न अंग है। उन्होंने यह बताया कि गौमूत्र चिकित्सा पद्धति तथा गौसेवा-गौसंवर्धन से जुड़े सामाजिक कार्य इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
गौमूत्र चिकित्सा की सराहना
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस अवसर पर विशेष रूप से गौमूत्र चिकित्सा पद्धति को सफल सेवा कार्य माना। उन्होंने कहा कि 15 लाख से अधिक मरीजों का उपचार करने वाले वीरेन्द्र-रेखा जैन दम्पत्ति ने गौमूत्र चिकित्सा के माध्यम से समाज में जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया है। यह गौसेवा-गौसंवर्धन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
वैदिक एवं आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो गौमूत्र एवं अन्य गौउत्पादों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में स्वीकार किया गया है। उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि पञ्चगव्य (गाय के दूध, घी, दही, मूत्र, गोबर) को आयुर्वेद में चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सुधार के साधन के रूप में माना जाता है।
गौशाला का विकास एवं आत्मनिर्भरता का संदेश
कार्यक्रम में स्वामी अच्युतानंद जी महाराज ने बताया कि रेशम केन्द्र गौशाला में जनसहयोग से अब तक लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपए के विकास कार्य सम्पन्न हो चुके हैं, जिससे यह गौशाला प्रदेश की आदर्श गौशालाओं में शुमार हो चुकी है।
कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गौशालाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर बल देते हुए कहा कि गौशालाओं को सिर्फ पशु-संरक्षण का केंद्र न बनाकर आत्मनिर्भर आर्थिक इकाई में बदलने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि गौशालाओं में गौमूत्र और गोबर आधारित मानव औषधि, फसल रक्षक तथा जैविक उर्वरक (बायो फर्टिलाइज़र) का उत्पादन प्रारंभ किया जाए। इससे गौशालाएं आर्थिक रूप से सशक्त बनेंगी तथा प्राकृतिक खेती एवं जैविक कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।
कैबिनेट मंत्री तुलसी सिलावट ने भी वीरेन्द्र-रेखा जैन द्वारा लंबे समय से की जा रही गौसेवा की प्रशंसा की और कहा कि ऐसे समर्पित व्यक्तित्व समाज को प्रेरणा देते हैं। महापौर पुष्पमित्र भार्गव ने रेखा एवं वीरेन्द्र जैन के प्रयासों से बनाए गए 50 लाख रुपए लागत वाले आईसीयू वार्ड की प्रशंसा करते हुए इसे शहर के लिए गौरवपूर्ण पहल बताया।
उच्चस्तरीय जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति
कार्यक्रम में सांसद शंकर लालवानी, सांसद कविता पाटीदार, विधायक मधु वर्मा, विधायक रमेश मैंदोला, गोलू शुक्ला, जिलाध्यक्ष सुमीत मिश्रा, सरवनसिंह चावड़ा, दीपक टीनू जैन, सभी एमआईसी सदस्य, पार्षदगण और सैकड़ों गौभक्त उपस्थित थे। प्रशासनिक पटल से कलेक्टर शिवम वर्मा, नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव, एडीएम रिंकेश कुमार वैश्य तथा कई अधिकारी मौजूद थे।
इस प्रकार यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम नहीं बल्कि गौसेवा-गौसंवर्धन से जुड़ी व्यापक सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पहल का प्रतीक था।
गौमाता के प्रति श्रद्धा, संस्कृति की रक्षा का संकल्प
कार्यक्रम के संचालन के दौरान एक भावनात्मक वातावरण बना, जिसमें उपस्थित जनों ने गौमाता के प्रति श्रद्धांजलि एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया। आभार ज्ञापन श्री निरंजन चौहान ने व्यक्त किया।
इस अवसर ने स्पष्ट कर दिया कि गौसेवा एवं गौसंवर्धन अब सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक विकास-मंच के महत्वपूर्ण अंग बन चुकी है।
निष्कर्ष: गौसेवा-गौसंवर्धन का नए युग में रूप
इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि
-
गौसेवा एवं गौसंवर्धन को सिर्फ सहायक गतिविधि नहीं बल्कि सशक्त सामाजिक मिशन के रूप में देखा जाना चाहिए।
-
गौमूत्र चिकित्सा जैसी परंपरागत पद्धतियों को आज के समय में समाजिक सेवा-कार्य के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
-
गौशालाओं को केवल पशु-संरक्षण के स्थल न बनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर इकाई में परिवर्तित किया जाना चाहिए — जिससे प्राकृतिक कृषि, जैविक उर्वरक और औषधि-उत्पादन जैसी गतिविधियों द्वारा उन्हें स्थायी आर्थिक आधार प्राप्त हो सके।
-
सरकारी प्रतिनिधियों, मंत्रीमंडल एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा इस दिशा में समर्थन एवं मार्गदर्शन जारी है, जिससे क्षेत्रीय गौसेवा-गौसंवर्धन के कार्यों को नई गति मिलेगी।
प्रदेश के लिए यह उम्मीद जगाती घटना है कि गौसेवा और गौसंवर्धन अब सिर्फ धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे जुड़े सामाजिक, आर्थिक एवं स्वास्थ्य-विकास पहल भी तेजी से आगे बढ़ेंगी।

