छहढाला आत्मा को मोक्षमार्ग का सही ज्ञान कराने वाला अनुपम ग्रंथ : आर्यिका श्री 105 संगममति माताजी
संवाददाता: मनोज जैन नायक
अम्बाह/मुरैना। मुरैना जिले के अम्बाह नगर स्थित जैन बगीची में वर्षायोग के लिए विराजमान पूज्य आर्यिका श्री 105 संगममति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘छहढाला’ की महत्ता पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि छहढाला केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाला और मोक्षमार्ग की दिशा दिखाने वाला अनुपम आध्यात्मिक मार्गदर्शक है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि यदि जीवन में आत्मिक शांति, संयम और मोक्ष की भावना को प्राप्त करना है, तो छहढाला का नियमित अध्ययन और उसके सिद्धांतों को जीवन में अपनाना आवश्यक है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, महिला-पुरुष, युवा और बच्चे उपस्थित रहे। सभी ने गुरुमां के प्रेरणादायी प्रवचनों का श्रवण कर धर्म, आत्मचिंतन और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
छहढाला आत्मज्ञान का सरल और प्रभावी ग्रंथ
अपने प्रवचन में आर्यिका श्री 105 संगममति माताजी ने कहा कि छहढाला जैन दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण, सरल और व्यवहारिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है और यह समझाता है कि मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है।
उन्होंने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और भौतिक सुखों की दौड़ में इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने वास्तविक अस्तित्व को भूलता जा रहा है। छहढाला मनुष्य को आत्मा की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है और यह सिखाता है कि वास्तविक सुख भीतर है, बाहरी वस्तुओं में नहीं।
सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का महत्व

आर्यिका माताजी ने कहा कि जैन धर्म के अनुसार सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र ही मोक्षमार्ग के तीन प्रमुख आधार हैं। छहढाला इन तीनों तत्वों का अत्यंत सरल और प्रभावी वर्णन करता है।
उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति सही दृष्टिकोण अपनाता है, सही ज्ञान प्राप्त करता है और अपने आचरण को धर्मानुकूल बनाता है, तभी उसका जीवन सार्थक होता है।
उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक अनुष्ठान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धर्म को व्यवहार में उतारना ही वास्तविक साधना है।
कर्मों के बंधन से मुक्ति का मार्ग बताता है छहढाला
गुरुमां ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक जीव अनादिकाल से कर्मों के बंधन में बंधा हुआ है। यही कर्म उसे जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य अपने भीतर झांकना सीख जाए, अपने दोषों को पहचान ले और राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया तथा लोभ जैसी कषायों का त्याग कर दे, तो वह धीरे-धीरे आत्मा की शुद्ध अवस्था की ओर बढ़ सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्मों का बंधन बाहर से नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने विचारों और व्यवहार से होता है। इसलिए आत्मसुधार ही मोक्षमार्ग की पहली सीढ़ी है।
छहढाला केवल पढ़ने का नहीं, जीवन में उतारने का ग्रंथ
आर्यिका श्री संगममति माताजी ने कहा कि छहढाला का महत्व केवल इसे पढ़ लेने तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य इसके सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में नहीं अपनाता, तब तक इसका वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि छहढाला का प्रत्येक अध्याय व्यक्ति को संयम, सदाचार, सत्य, विनम्रता, आत्मनिरीक्षण और वैराग्य की शिक्षा देता है। यदि इन शिक्षाओं को व्यवहार में उतार लिया जाए तो जीवन स्वतः ही शांत, संतुलित और सुखद बन सकता है।
बाहरी सुखों में उलझकर नहीं मिल सकती आत्मिक शांति
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुमां ने कहा कि आधुनिक जीवन में अधिकांश लोग बाहरी सुख-सुविधाओं, धन, पद और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इन सभी उपलब्धियों के बावजूद मनुष्य के भीतर अशांति बनी रहती है, क्योंकि वास्तविक शांति आत्मा से जुड़ने पर ही प्राप्त होती है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के विकारों को समाप्त नहीं करेगा, तब तक उसे स्थायी सुख नहीं मिल सकता।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि वे जीवन में सादगी, संयम और संतोष को अपनाएं तथा अनावश्यक इच्छाओं को सीमित करें।
आत्मकल्याण के लिए आत्मचिंतन आवश्यक
आर्यिका माताजी ने कहा कि आत्मकल्याण का मार्ग आत्मचिंतन से होकर गुजरता है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय अपने जीवन का आत्मविश्लेषण करना चाहिए। दिनभर में किए गए अच्छे और बुरे कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए तथा अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने दोषों को पहचानना ही आध्यात्मिक उन्नति का वास्तविक मार्ग है।
बच्चों और युवाओं को छहढाला का अध्ययन कराने का आह्वान
अपने प्रवचन में गुरुमां ने विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के धार्मिक संस्कारों पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक जैन परिवार का यह दायित्व है कि वह अपने बच्चों और युवाओं को छहढाला जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का अध्ययन कराए।
उन्होंने कहा कि यदि बचपन से ही धार्मिक और नैतिक संस्कार दिए जाएं तो युवा पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ेगी और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में मोबाइल और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवाओं का ध्यान भटका रहा है। ऐसे में धार्मिक अध्ययन उन्हें सही मार्ग पर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
विचारों की पवित्रता से ही होता है व्यक्तित्व का निर्माण
आर्यिका श्री संगममति माताजी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का जीवन उसके विचारों से निर्मित होता है।
उन्होंने कहा कि यदि विचार पवित्र होंगे तो व्यवहार भी श्रेष्ठ होगा और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण होगा।
उन्होंने कहा कि छहढाला का नियमित अध्ययन मनुष्य के विचारों को शुद्ध बनाता है और उसे आत्मोन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
वर्षायोग के दौरान चल रहे हैं नियमित धार्मिक कार्यक्रम
अम्बाह की जैन बगीची में वर्षायोग के दौरान प्रतिदिन धार्मिक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। प्रातःकालीन पूजा, स्वाध्याय, प्रवचन एवं विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।
आर्यिका श्री 105 संगममति माताजी के सान्निध्य में श्रद्धालु धर्म, संयम और आत्मचिंतन का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। वर्षायोग के दौरान अनेक धार्मिक अनुष्ठानों और स्वाध्याय कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है।
श्रद्धालुओं ने लिया आत्मकल्याण का संकल्प
धर्मसभा के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुमां के प्रेरणादायी प्रवचनों का श्रवण कर आत्मकल्याण, संयम और सदाचारपूर्ण जीवन अपनाने का संकल्प लिया।
श्रद्धालुओं ने कहा कि छहढाला के माध्यम से उन्हें आत्मा, कर्म और मोक्ष के सिद्धांतों को समझने की नई प्रेरणा मिली है। उन्होंने नियमित स्वाध्याय और धार्मिक अध्ययन करने का भी संकल्प व्यक्त किया।
धर्म और आत्मज्ञान से ही संभव है जीवन का वास्तविक कल्याण
आर्यिका श्री 105 संगममति माताजी ने अपने संदेश में कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियां प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ना है।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति छहढाला जैसे आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाए, तो वह न केवल स्वयं का कल्याण कर सकता है, बल्कि परिवार और समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
धर्मसभा का समापन मंगलकामना के साथ हुआ, जहां उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्म, संयम और आत्मचिंतन के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया। गुरुमां ने सभी को नियमित स्वाध्याय, सदाचार, आत्मनिरीक्षण और अहिंसा के सिद्धांतों का पालन करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि यही जीवन को सार्थक और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर बनाने का सबसे प्रभावी मार्ग है।
