Bihar Politics में हलचल तेज है। सरकार गठन से पहले जदयू की शर्तों और हरिवंश सिंह को राज्यसभा भेजने के BJP के फैसले से NDA में खींचतान बढ़ गई है। पढ़िए सत्ता हस्तांतरण का पूरा समीकरण।
Bihar Politics: सत्ता का नया फॉर्मूला? जदयू की शर्तें और BJP के फैसलों से बढ़ी खींचतान
पटना: Bihar Politics में एक बार फिर से सरकार बनाने को लेकर घमासान मच गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद ‘सत्ता हस्तांतरण’ (Power Transfer) की प्रक्रिया तेज तो हो गई है, लेकिन रास्ते में कई अड़चनें आ गई हैं। जदयू (JDU) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच खींचतान इतनी बढ़ गई है कि नई सरकार का गठन फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।सूत्रों के अनुसार, दिल्ली से लेकर पटना तक बैठकों का दौर जारी है, लेकिन हर बैठक के बाद मतभेद और गहराते जा रहे हैं। इस बार विवाद सिर्फ सीएम पद को लेकर नहीं है, बल्कि इससे कहीं आगे बढ़कर Bihar Politics के पूरे समीकरण को बदलने वाला है।
सरकार बनने से पहले जदयू की 3 बड़ी शर्तें
मौजूदा Bihar Politics के गणित को समझने के लिए जरूरी है कि हम जदयू द्वारा रखी गई शर्तों को विस्तार से समझें। जदयू ने साफ कर दिया है कि वह अब ‘हां में हां’ मिलाने वाली पार्टी नहीं रहना चाहती। पार्टी ने सरकार में अपनी हिस्सेदारी और अहमियत बढ़ाने के लिए तीन बड़ी शर्तें रखी हैं:
- गृह मंत्रालय: जदयू ने बिहार सरकार का सबसे अहम विभाग ‘गृह मंत्रालय’ अपने पास रखने की मांग की है। पार्टी का तर्क है कि प्रशासनिक नियंत्रण उनके पास रहना चाहिए।
- दो उपमुख्यमंत्री: पिछली बार की तरह इस बार भी जदयू दो उपमुख्यमंत्री (Deputy CM) पद की मांग कर रही है, ताकि सरकार में उसकी आवाज मजबूती से उठ सके।
- विधानसभा अध्यक्ष: यह सबसे अहम शर्त है। जदयू चाहती है कि विधानसभा का अध्यक्ष उसकी पार्टी का हो, ताकि भविष्य में किसी अनहोनी (अस्थिरता) की स्थिति में उसे फायदा मिले।
हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा भेजने पर विवाद
Bihar Politics में इन दिनों सबसे चर्चित मुद्दा हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा भेजे जाने का है। यह फैसला जदयू के लिए जहर के घूंट के समान साबित हुआ है।
जदयू सूत्रों के मुताबिक, पार्टी इस बात से बेहद नाराज है कि बीजेपी ने उनसे कोई विचार-विमर्श किए बिना यह फैसला कर दिया। जदयू का आरोप है कि हरिवंश नारायण सिंह को पार्टी पहले ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर चुकी थी और वे पार्टी की अहम बैठकों से अनुपस्थित रहते थे। ऐसे में बीजेपी का उन्हें राज्यसभा भेजना, जदयू के लिए अपमान जैसा है।एक वरिष्ठ जदयू नेता ने बिना नाम जाहिर करते हुए कहा, “यह BJP का खेल है। वे हमारी पार्टी को तोड़ना चाहते हैं। जिसे हमने बाहर का रास्ता दिखाया, उसे BJP ने राज्यसभा भेजकर पुरस्कृत किया। इससे हमारे विधायकों के बीच गलत संदेश जाता है।”
विधानसभा अध्यक्ष पद पर क्यों अड़ी है जदयू?
जदयू की ओर से की गई शर्तों में विधानसभा अध्यक्ष पद सबसे अहम है। आखिर जदयू इस पद पर इतना क्यों जोर दे रही है? इसके पीछे Bihar Politics का सालों पुराना अनुभव और आगे की सोच काम कर रही है।अगर जदयू का स्पीकर बनता है, तो उसके पास कई ताकतें होंगी:
- दल-बदल कानून: स्पीकर के पास यह तय करने की शक्ति होती है कि किस विधायक पर दल-बदल कानून लागू होगा।
- सरकार की स्थिरता: अगर भविष्य में BJP विद्रोह करती है, तो स्पीकर उन विधायकों को अयोग्य ठहरा सकता है।
- संकट का समाधान: यह पद जदयू को ‘चेक एंड बैलेंस’ की ताकत देगा।
जदयू का मानना है कि पिछली बार उन्होंने भरोसा किया था, लेकिन इस बार वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते।
BJP का गेम प्लान और आगे की रणनीति
बीजेपी इन सब परिस्थितियों पर चुप्पी साधे हुए है, लेकिन पर्दे के पीछे वह अपना गेम प्लान तैयार कर रही है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि जदयू के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है। अगर जदयू टूटती है, तो उसके पास न तो कोई जनाधार है और न ही नेता।हालांकि, Bihar Politics के जानकार मानते हैं कि बीजेपी इस बार नीतीश कुमार को कमजोर करने की कोशिश में है। राज्यसभा में हरिवंश को भेजना और अब शर्तों पर अटकना, यह सब रणनीति का हिस्सा है।
Bihar Politics: क्या है सत्ता का नया फॉर्मूला?
इन सब हालातों के बीच सवाल यह है कि आखिर Bihar Politics में सत्ता का नया फॉर्मूला क्या होगा? क्या नीतीश कुमार अपनी सारी शर्तें मनवा पाएंगे, या फिर बीजेपी उन्हें झुकने पर मजबूर कर देगी?राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, तीन संभावनाएं हो सकती हैं:
- समझौता फॉर्मूला: बीजेपी गृह मंत्रालय तो नहीं देगी, लेकिन दो डिप्टी सीएम और स्पीकर पद देकर जदयू को मना सकती है।
- बिना शर्त सरकार: अगर बीजेपी सख्त हो गई, तो जदयू को पिछली बार की तरह ही मजबूरन मानना पड़ सकता है।
- ब्रेकअप की आशंका: सबसे बुरी स्थिति यह होगी कि अगर बात नहीं बनी, तो NDA टूट सकती है और राज्य में राष्ट्रपति शासन (President Rule) की नौबत आ सकती है।
फिलहाल, दिल्ली में होने वाली अगली बैठक पर सबकी निगाहें टिकी हैं। तब तक Bihar Politics में उथल-पुथल जारी रहेगी।
निष्कर्ष
Bihar Politics ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां कुछ भी हो सकता है। जहां एक तरफ जदयू अहंकार और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, वहीं बीजेपी उसे उसकी औकात दिखाने का मौका ढूंढ रही है। हरिवंश नारायण सिंह का मामला तो मानो आग में घी डालने वाला साबित हुआ है।अब देखना यह होगा कि क्या नीतीश कुमार अपनी ‘पिच्छा छुड़ाओ बीजेपी’ वाली पुरानी रणनीति को दोहराएंगे, या फिर बीजेपी उन्हें एक बार फिर ‘छोटा भाई’ बनाकर रखेगी।
