12 मार्च चेत्र वदी नवमी के अवसर पर जानिए भरतजी के नाम से भारत की ऐतिहासिक और धार्मिक कथा। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी और प्रथम चक्रवर्ती भरतजी से जुड़ा भारतवर्ष का अद्भुत इतिहास।
भरत से भारत नाम की उत्पत्ति: भारतीय संस्कृति की महान परंपरा
भरत से भारत नाम की उत्पत्ति भारतीय इतिहास और संस्कृति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली कथा है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी के ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा।
१२ मार्च २०२६ को चैत्र वदी नवमी के पावन अवसर पर भगवान ऋषभदेवजी का जन्मकल्याणक दिवस मनाया जाता है। इसी दिन उनके ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती भरत का भी जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन को भरतोत्सव, भारतोत्सव या भारत पर्व के रूप में मनाने की परंपरा बताई जाती है।
भगवान ऋषभदेव और चक्रवर्ती भरत
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी ने मानव समाज को सभ्यता और जीवन जीने की कला सिखाई। उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत को इतिहास में प्रथम चक्रवर्ती सम्राट के रूप में जाना जाता है।उनके नाम से ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा, जो आज भी करोड़ों लोगों की पहचान है।
अयोध्या: जैन तीर्थंकरों की जन्मभूमि
अयोध्या को जैन धर्म में अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। यह जैन तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि है।अयोध्या में निम्न तीर्थंकरों का जन्म हुआ माना जाता है:
- आदिनाथ (ऋषभदेव)
- अजितनाथ
- सुमतिनाथ
- अभिनंदननाथ
- अनंतनाथ
यही वह पवित्र भूमि है जहां भगवान ऋषभदेव के 100 पुत्र और दो पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी का जन्म हुआ।
ऋषभदेव द्वारा सिखाई गई 72 कलाएं
प्राचीन काल में कल्पवृक्षों के समाप्त होने के बाद मनुष्य को जीवनयापन कठिन लगने लगा। तब राजकुमार आदिकुमार अर्थात ऋषभदेवजी ने समाज को जीवन जीने की कला सिखाई।
उन्होंने लोगों को सिखाया:
- असि (शस्त्र संचालन)
- मसि (लेखन कला)
- कृषि
- वाणिज्य
- शिल्पकला
भगवान ऋषभदेव को 72 कलाओं का प्रणेता माना जाता है।उन्होंने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लेखन कला सिखाई जिससे ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ।
पुत्री सुंदरी को अंक विद्या सिखाई।
चक्रवर्ती भरत का जन्म और शुभ संकेत
भरत के जन्म से पहले उनकी माता नंदा देवी को छह शुभ स्वप्न दिखाई दिए:
- सुमेरु पर्वत
- सूर्य
- चंद्रमा
- सरोवर में हंस
- धंसी हुई पृथ्वी
- समुद्र
- ऋषभदेवजी ने इन स्वप्नों का अर्थ बताया कि उनका पुत्र महान चक्रवर्ती सम्राट बनेगा।
- चक्रवर्ती भरत का वैभव और 14 रत्न
- जैन ग्रंथों में चक्रवर्ती सम्राट के पास 14 रत्न होने का वर्णन मिलता है।
- इनमें प्रमुख हैं:
- चक्र रत्न
- छत्र रत्न
- खड्ग रत्न
- गज रत्न
- अश्व रत्न
- स्त्री रत्न
- सेनापति रत्न
- इनके अलावा नौ निधियां भी होती थीं जो चक्रवर्ती सम्राट के वैभव का प्रतीक थीं।
भरत की दिग्विजय
राजा भरत ने षट्खंड पृथ्वी पर विजय प्राप्त की। उनके पास चक्ररत्न था जो दिग्विजय के समय उनके आगे चलता था।यह चक्र किसी भी बाधा को पार कर सकता था और तभी नगर में लौटता था जब सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त हो जाती थी।
वैराग्य और मोक्ष
इतने अपार वैभव और शक्ति के बावजूद राजा भरत ने जीवन की क्षणभंगुरता को समझ लिया।उन्होंने अंततः राजपाट त्याग कर निर्ग्रंथ मुनि के रूप में दीक्षा ली और तपस्या के माध्यम से सिद्धपद प्राप्त किया।आज भी जैन मंदिरों में भरत भगवान की निर्ग्रंथ प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।
भारत वर्ष नाम की उत्पत्ति
प्राचीन काल में इस देश को अजनाभ वर्ष कहा जाता था क्योंकि यह भगवान ऋषभदेव के पिता राजा नाभिराय के नाम से प्रसिद्ध था।बाद में चक्रवर्ती भरत के नाम पर यह भूमि भारत वर्ष कहलाने लगी।
दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर के बगीचे में भी भरतजी की प्रतिमा लगी है, जिसके नीचे यह उल्लेख है कि भारत का नाम उनके नाम पर पड़ा।
निष्कर्ष
भरत से भारत नाम की उत्पत्ति केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की गहरी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है।चक्रवर्ती भरत का जीवन हमें यह सिखाता है कि अपार शक्ति और वैभव के बावजूद अंततः धर्म और वैराग्य ही जीवन का सर्वोच्च मार्ग है।
लेखिका: पुष्पा पांड्या
वरिष्ठ चित्रकार एवं लेखिका
