आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी ससंघ का अष्टापद बद्रीनाथ तीर्थ आगमन निश्चित। पट उद्घाटन हेतु समाज में उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार।
राजेश जैन दद्दू
इंदौर
आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी अष्टापद आगमन | शुभ समाचार
आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी अष्टापद आगमन जैन समाज के लिए अत्यंत गौरव और आध्यात्मिक आनंद का विषय बन गया है। सर्वोच्च उपलब्धि आदिनाथ भगवान की निर्वाण स्थली अष्टापद बद्रीनाथ तीर्थ के पट उद्घाटन हेतु पूज्य माताजी ससंघ का आगमन सुनिश्चित हो गया है।
यह सहमति केवल एक कार्यक्रम की स्वीकृति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जैन समाज के लिए आत्मिक ऊर्जा, साधना और धर्म चेतना का शुभ संकेत है।
अष्टापद बद्रीनाथ: मोक्ष का दिव्य द्वार
अष्टापद बद्रीनाथ तीर्थ जैन धर्म की सर्वोच्च आस्था का केंद्र है। यह वही पावन भूमि है जहाँ प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने निर्वाण प्राप्त किया।
यह तीर्थ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि साधना, तप और मोक्ष की अनुभूति है।
पट उद्घाटन का अवसर स्वयं में दुर्लभ होता है, और ऐसे अवसर पर किसी महान साधिका का ससंघ आगमन इसे ऐतिहासिक बना देता है।
आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी: तप, त्याग और प्रभाव
संत शिरोमणि
आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज
की परम प्रभावक शिष्या,
आध्यात्मिक श्रमणी एवं सजग साधिका
आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी
आज जैन समाज की प्रेरणा स्रोत हैं।
उनका प्रत्येक विहार, प्रवचन और आगमन समाज को धर्म मार्ग पर दृढ़ करता है। अष्टापद जैसे दिव्य तीर्थ पर उनका ससंघ आगमन तपस्वी परंपरा की गरिमा को और ऊँचा करता है।
ट्रस्ट कमेटी का निवेदन और सहमति
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जानकारी देते हुए बताया कि
अष्टापद बद्रीनाथ तीर्थ ट्रस्ट कमेटी के—
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अध्यक्ष आदित्यजी कासलीवाल
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महामंत्री श्री कीर्ति जी पांड्या
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ट्रस्टी श्री विजय जी काला
ने पूज्य माताजी को श्रीफल भेंट कर विधिवत निवेदन किया था। यह निवेदन श्रद्धा, विनय और धर्मभाव से परिपूर्ण था।
नवाचार्य श्री समयसागर जी महाराज की अनुमति
पूज्य माताजी ने इस महत्वपूर्ण निर्णय से पूर्व
आचार्य शिरोमणि श्री समयसागर जी महाराज
से मार्गदर्शन एवं स्वीकृति प्राप्त की।
गुरु आज्ञा के पश्चात अष्टापद बद्रीनाथ तीर्थ के पट उद्घाटन हेतु सहर्ष स्वीकृति प्रदान की गई, जिससे सम्पूर्ण समाज में हर्ष और श्रद्धा का वातावरण बन गया।
समाज में उल्लास का वातावरण
जैसे ही यह शुभ समाचार समाज तक पहुँचा—
- साधु–साध्वियों में प्रसन्नता
- श्रावक–श्राविकाओं में उत्साह
- ट्रस्ट कमेटी में आत्मिक संतोष
देखने को मिला। यह आगमन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि धर्म प्रभावना का विराट अवसर है।
पट उद्घाटन का आध्यात्मिक महत्व
पट उद्घाटन का अर्थ है—
- साधना का शुभारंभ
- श्रद्धा का सार्वजनिक उद्घोष
- तीर्थ चेतना का पुनर्जागरण
और जब यह कार्य आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी ससंघ के सानिध्य में हो, तो उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
जैन समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण
यह अवसर—
- नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ने वाला
- तपस्वी परंपरा को सशक्त करने वाला
- अष्टापद तीर्थ की गरिमा बढ़ाने वाला
सिद्ध होगा। आने वाले समय में यह आयोजन जैन इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा।
निष्कर्ष
आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी अष्टापद आगमन
केवल एक समाचार नहीं, बल्कि जैन समाज की आध्यात्मिक उपलब्धि है। यह आगमन साधना, श्रद्धा और धर्म प्रभावना का संगम बनकर समाज को नई दिशा देगा।
