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अष्टाह्निका महापर्व: आत्मजागरण, आराधना और मोक्षमार्ग की दिव्य साधना का पर्व — अंशुल जैन शास्त्री

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Published On: 23 July 2026
Anshul Jain Shastri speaking on the spiritual significance of Ashtahnika Mahaparva in Jainism
— Anshul Jain Shastri speaking on the spiritual significance of Ashtahnika Mahaparva in Jainism

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अष्टाह्निका महापर्व: आत्मजागरण, आराधना और मोक्षमार्ग की दिव्य साधना का पर्व — अंशुल जैन शास्त्री

संवाददाता: मनोज जैन नायक
मुरैना/द्रोणगिरी।
जैन धर्म में अनेक ऐसे पर्व हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि मनुष्य के आत्मिक उत्थान, संयम, साधना और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने का संदेश देते हैं। इन्हीं महान आध्यात्मिक पर्वों में अष्टाह्निका महापर्व का विशेष स्थान है। यह पर्व श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि, भगवान जिनेन्द्र के गुणों के स्मरण तथा धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

जैन विद्वान अंशुल जैन शास्त्री (द्रोणगिरी) ने अष्टाह्निका महापर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व केवल पूजा-अर्चना या धार्मिक परंपराओं के निर्वहन का अवसर नहीं है, बल्कि आत्मा को निर्मल बनाने, कषायों को क्षीण करने और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का दिव्य अवसर है। उन्होंने कहा कि अष्टाह्निका हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य सांसारिक सुख-सुविधाओं का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और आध्यात्मिक उन्नति है।

अष्टाह्निका महापर्व क्या है?

जैन धर्म में अष्टाह्निका महापर्व अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व वाला पर्व माना जाता है। यह पर्व वर्ष में तीन बार मनाया जाता है—

  • आषाढ़ शुक्ल पक्ष
  • कार्तिक शुक्ल पक्ष
  • फाल्गुन शुक्ल पक्ष

इन तीनों महीनों में अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिनों की अवधि को अष्टाह्निका कहा जाता है।

इन आठ दिनों में जैन समाज के श्रद्धालु विशेष पूजा, विधान, स्वाध्याय, तप, जप, ध्यान एवं धर्मचिंतन के माध्यम से अपनी आत्मा को शुद्ध बनाने का प्रयास करते हैं। यह पर्व बाहरी उत्सव की अपेक्षा आंतरिक साधना और आध्यात्मिक अनुशासन का संदेश देता है।

नन्दीश्वर द्वीप की दिव्य आराधना का स्मरण

अंशुल जैन शास्त्री ने बताया कि जैन आगमों के अनुसार अष्टाह्निका के दिनों में नन्दीश्वर द्वीप स्थित जिनालयों में देवगण अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ तीर्थंकर भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं।

जैन दर्शन के अनुसार भरत क्षेत्र के सामान्य मनुष्य नन्दीश्वर द्वीप तक प्रत्यक्ष रूप से नहीं पहुंच सकते। इसलिए श्रद्धालु पृथ्वी पर रहकर उसी दिव्य आराधना का भावपूर्वक स्मरण करते हैं।

इसी भावना से अष्टाह्निका के दौरान मंदिरों में विशेष विधान, पूजन, अभिषेक, स्वाध्याय, ध्यान, तप और धर्मचर्चा का आयोजन किया जाता है, जिससे श्रद्धालु देवों की आराधना का भाव अपने जीवन में उतार सकें।

केवल अनुष्ठान नहीं, आत्मचिंतन का महापर्व

अंशुल जैन शास्त्री के अनुसार अष्टाह्निका का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह पर्व प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर झांकने का अवसर प्रदान करता है।

मनुष्य को इस दौरान अपने भीतर छिपे—

  • क्रोध
  • मान (अहंकार)
  • माया
  • लोभ
  • राग
  • द्वेष

जैसे आंतरिक शत्रुओं की पहचान करनी चाहिए और उन्हें समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।

यही आत्मनिरीक्षण अष्टाह्निका की सच्ची साधना है।

भगवान जिनेन्द्र के गुणों का चिंतन

अष्टाह्निका महापर्व में भगवान जिनेन्द्र के अनंत गुणों का स्मरण और चिंतन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

श्रद्धालु विशेष रूप से भगवान के—

  • अनंत ज्ञान
  • अनंत दर्शन
  • अनंत सुख
  • अनंत वीर्य

जैसे दिव्य गुणों का चिंतन करते हैं।

अंशुल जैन शास्त्री का कहना है कि जब मनुष्य भगवान के गुणों का चिंतन करता है, तब उसके भीतर भी सद्गुणों का विकास होता है और उसका जीवन संयम, करुणा, शांति तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनने लगता है।

अष्टाह्निका में विधान का विशेष महत्व

जैन धर्म में अष्टाह्निका के दौरान विभिन्न प्रकार के धार्मिक विधान आयोजित किए जाते हैं।

अंशुल जैन शास्त्री ने स्पष्ट किया कि विधान केवल पूजा-पाठ या पारंपरिक धार्मिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आत्मा को शुभ भावों से भरने वाली आध्यात्मिक साधना है।

विधान का प्रत्येक मंत्र, प्रत्येक अर्घ्य, प्रत्येक स्तुति और प्रत्येक पूजा का उद्देश्य भगवान से सांसारिक वस्तुएं मांगना नहीं होता।

बल्कि इसका उद्देश्य स्वयं को भगवान के गुणों के अनुरूप बनाने का प्रयास करना होता है।

विधान कैसे बनता है आत्मशुद्धि का माध्यम?

उन्होंने बताया कि जब श्रद्धालु श्रद्धा, विनय, समर्पण और निर्मल भाव से विधान करता है, तब उसका मन धीरे-धीरे शुद्ध होने लगता है।

ऐसी साधना से—

  • सम्यक श्रद्धा मजबूत होती है।
  • धर्म के प्रति आस्था बढ़ती है।
  • शुभ भावों का विकास होता है।
  • मन की अशांति दूर होती है।
  • आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

जैन दर्शन के अनुसार ऐसी आराधना कर्मनिर्जरा का महत्वपूर्ण कारण बनती है।

विधान का वास्तविक फल क्या है?

अंशुल जैन शास्त्री ने कहा कि आज अनेक लोग धार्मिक अनुष्ठानों को केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम मान लेते हैं, जबकि जैन दर्शन इससे कहीं अधिक गहन संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि विधान का सर्वोच्च फल—

  • आत्मिक शुद्धि
  • पापकर्मों की निर्जरा
  • शुभ कर्मों का बंध
  • मानसिक शांति
  • संयम के प्रति श्रद्धा
  • मोक्षमार्ग की प्रेरणा

है।

यदि श्रद्धालु केवल सांसारिक लाभ की अपेक्षा से विधान करता है तो वह उसके वास्तविक उद्देश्य को समझ नहीं पाता।

पूजा का वास्तविक अर्थ

अंशुल जैन शास्त्री के अनुसार पूजा का अर्थ केवल भगवान के सामने दीप जलाना या हाथ जोड़ना नहीं है।

वास्तविक पूजा तब होती है जब मनुष्य—

  • भगवान के गुणों को अपने जीवन में उतारे।
  • सत्य का पालन करे।
  • अहिंसा को अपनाए।
  • संयम का अभ्यास करे।
  • लोभ, क्रोध और अहंकार का त्याग करे।
  • सभी जीवों के प्रति करुणा रखे।

यही सच्ची आराधना है।

आत्मा का वास्तविक सौंदर्य

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य बाहरी आकर्षण, धन, पद और प्रतिष्ठा को जीवन का लक्ष्य मान बैठा है।

लेकिन जैन दर्शन यह बताता है कि आत्मा का वास्तविक सौंदर्य बाहरी आभूषणों में नहीं, बल्कि—

  • शुद्ध भावों
  • सम्यक दर्शन
  • संयम
  • तप
  • त्याग
  • करुणा
  • क्षमा

में निहित है।

अष्टाह्निका महापर्व इन्हीं मूल्यों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।

युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश

अंशुल जैन शास्त्री का मानना है कि वर्तमान पीढ़ी के लिए भी अष्टाह्निका अत्यंत उपयोगी पर्व है।

आज की भागदौड़, तनाव और भौतिक प्रतिस्पर्धा के बीच यह पर्व युवाओं को मानसिक संतुलन, आत्मअनुशासन और सकारात्मक जीवन दृष्टि प्रदान करता है।

धर्म के माध्यम से जीवन में संतुलन स्थापित करने का संदेश अष्टाह्निका का महत्वपूर्ण पक्ष है।

समाज में बढ़ती है आध्यात्मिक चेतना

अष्टाह्निका के दौरान मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होकर सामूहिक आराधना करते हैं।

इससे—

  • धार्मिक वातावरण निर्मित होता है।
  • सामाजिक एकता मजबूत होती है।
  • नई पीढ़ी को जैन संस्कृति का परिचय मिलता है।
  • परिवारों में धार्मिक संस्कार विकसित होते हैं।
  • समाज में सेवा और सद्भाव की भावना बढ़ती है।

आत्मकल्याण का सुनहरा अवसर

अंशुल जैन शास्त्री ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की कि वे अष्टाह्निका महापर्व को केवल दर्शक बनकर न देखें, बल्कि इसमें सक्रिय रूप से भाग लेकर आत्मकल्याण का प्रयास करें।

उन्होंने कहा कि श्रद्धालु इन आठ दिनों में—

  • भगवान जिनेन्द्र के गुणों का चिंतन करें।
  • सिद्धों की आराधना करें।
  • स्वाध्याय करें।
  • ध्यान एवं तप का अभ्यास करें।
  • शुभ भावों का विकास करें।
  • आत्मनिरीक्षण करें।
  • जीवन को संयम और धर्म की दिशा में आगे बढ़ाएं।

मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने का संदेश

जैन दर्शन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है और अष्टाह्निका महापर्व उसी दिशा में प्रेरित करने वाला एक महान आध्यात्मिक पर्व है।

यह पर्व मनुष्य को बताता है कि संसार के भौतिक सुख क्षणभंगुर हैं, जबकि आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति ही स्थायी आनंद का मार्ग है।

अंशुल जैन शास्त्री ने अपने संदेश के अंत में कहा कि अष्टाह्निका महापर्व की वास्तविक सार्थकता तभी है जब श्रद्धालु केवल पूजा-विधान तक सीमित न रहकर भगवान जिनेन्द्र के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। आत्मशुद्धि, संयम, सम्यक दर्शन और शुभ भावों का विकास ही इस महापर्व का वास्तविक उद्देश्य है। यही अष्टाह्निका की सच्ची आराधना है, यही इसका वास्तविक फल है और यही मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भी।

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