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रीवा में दर्दनाक दुर्घटना, जैन समाज स्तब्ध
आर्यिकाश्री उपसममति माताजी समाधि की खबर से पूरा जैन समाज गहरे शोक में डूब गया है। बुधवार सुबह रीवा जिला कलेक्ट्रेट के सामने हुई एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना ने जैन श्रमण संस्कृति के साधकों और श्रद्धालुओं को स्तब्ध कर दिया।
जानकारी के अनुसार सुबह शौच के लिए जाते समय एक ऑल्टो कार ने दो आर्यिका माताजी को टक्कर मार दी थी। इस दुर्घटना में पहले आर्यिका श्री श्रुतमति माताजी की समाधि हुई थी, जबकि दूसरी आर्यिकाश्री उपसममति माताजी की समाधि शाम 4:22 बजे रीवा स्थित जैन संत भवन में हो गई।
समाज प्रवक्ता राजेश जैन दद्दू ने इस दुखद घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि शाम 5:30 बजे माताजी का डोला उठाया गया। इस घटना के बाद पूरे भारतवर्षीय जैन समाज में शोक की लहर फैल गई है।
आर्यिकाश्री उपसममति माताजी समाधि से भावुक हुआ समाज
आचार्य श्री Vidyasagar Maharaj की दीक्षित शिष्या आर्यिकाश्री उपसममति माताजी की समाधि की खबर सुनते ही देशभर के जैन समाज में गहरा दुख व्याप्त हो गया।श्रद्धालुओं का कहना है कि माताजी अत्यंत सरल, शांत और आध्यात्मिक जीवन जीने वाली संत थीं। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जैन धर्म, साधना और आत्मकल्याण के मार्ग को समर्पित किया।जैन संत भवन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन पहुंचे और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
श्रुतमति माताजी की भी हुई थी समाधि
इस दुर्घटना में आर्यिका श्री श्रुतमति माताजी भी गंभीर रूप से घायल हुई थीं। उनकी सुबह ही समाधि हो गई थी।लगातार दो आर्यिका माताजी की समाधि होने से जैन समाज में अत्यंत दुख और पीड़ा का वातावरण है। संत समाज के साधक और अनुयायी इसे अपूरणीय क्षति मान रहे हैं।
राजेश जैन दद्दू ने दी जानकारी
समाज प्रवक्ता राजेश जैन दद्दू ने बताया कि यह घटना अत्यंत दुखद और असहनीय है। उन्होंने कहा कि जैन श्रमण संस्कृति के लिए यह क्षति कभी पूरी नहीं हो सकती।उन्होंने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित दोनों आर्यिका माताजी समाज के लिए प्रेरणास्रोत थीं और उन्होंने अपने तप, त्याग एवं साधना से हजारों लोगों को धर्ममार्ग की प्रेरणा दी।
आर्यिकाश्री उपसममति माताजी का जीवन परिचय
आर्यिकाश्री उपसममति माताजी का गृहस्थ अवस्था का नाम वाणी जैन था। उनका जन्म 26 मई 1979 को तमिलनाडु के चैय्यर में हुआ था।उनके पिता श्री देवकुमार जैन और माता श्रीमती लक्ष्मी जैन धार्मिक विचारों वाले परिवार से थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने बैचलर ऑफ कॉमर्स (बी.कॉम) प्रथम वर्ष तक अध्ययन किया।इसके पश्चात उनका मन आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर धर्ममार्ग अपनाया।
आचार्य विद्यासागर महाराज से ली दीक्षा
वर्ष 1999 में तमिलनाडु के पुन्नूर मलाई में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया। इसके बाद 13 फरवरी 2006 को सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर, दमोह में आचार्य श्री Vidyasagar Maharaj के सानिध्य में उन्हें आर्यिका श्री 105 उपशमती माताजी के रूप में दीक्षा प्राप्त हुई।दीक्षा के बाद उन्होंने देशभर में धर्म प्रचार, साधना, तप और जैन संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जैन समाज में शोक की लहर
आर्यिकाश्री उपसममति माताजी समाधि की खबर सोशल मीडिया और धार्मिक संगठनों के माध्यम से तेजी से फैल गई। देशभर के जैन मंदिरों और संगठनों में श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन किया जा रहा है।
समाज के लोगों ने प्रशासन से सड़क सुरक्षा को लेकर गंभीर कदम उठाने की मांग भी की है, ताकि भविष्य में ऐसी दुखद घटनाएं दोबारा न हों।श्रद्धालुओं ने कहा कि माताजी का त्याग, तपस्या और साधना सदैव समाज को प्रेरणा देती रहेगी।
जैन श्रमण संस्कृति को अपूरणीय क्षति
धार्मिक जानकारों के अनुसार आर्यिका माताजी का जीवन अनुशासन, संयम और साधना का अद्भुत उदाहरण था। उन्होंने हजारों लोगों को धर्म, सेवा और अहिंसा का संदेश दिया।उनकी समाधि को जैन समाज आध्यात्मिक जगत की बड़ी क्षति मान रहा है। समाजजन लगातार उनके प्रति श्रद्धा और भावांजलि अर्पित कर रहे हैं।
