“तालिबान-स्टाइल” क्लासरूम से आतंकी साजिश तक — अल‑फलाह यूनिवर्सिटी की चौंकाने वाली कहानी
फरीदाबाद (हरियाणा)
भारत की राजधानी दिल्ली के समीप, अल‑फलाह यूनिवर्सिटी (फरीदाबाद) एक प्रतिष्ठित निजी शिक्षा संस्थान से अचानक विवादों के केंद्र में आ गया है। एक बड़ी जांच में यहाँ के कुछ अध्यापकों पर “तालिबान-स्टाइल” क्लासरूम संचालित करने, पाठ्यक्रम का दुरुपयोग करने और आतंकी मॉड्यूल से संबंध रखने के गंभीर आरोप लगे हैं।
आरोपों की पृष्ठभूमि
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10 नवंबर को दिल्ली के लाल किला के पास हुए कार बम धमाके की जांच में एक प्रमुख नाम सामने आया है — विश्वविद्यालय के एक असिस्टेंट प्रोफेसर उमर उन नबी। आरोप है कि उन्होंने धमाके में गाड़ी चलाई थी।
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इसके अलावा, यूनिवर्सिटी से जुड़े दो अन्य प्रोफेसरों को भी इसी आतंकी नेटवर्क से संबंध के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
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जांच एजेंसियों का प्रारंभिक मानना है कि यह मामला कुछ शिक्षण संस्थानों के भीतर चल रही कट्टरवादी गतिविधियों, ब्रेनवॉशिंग एवं आतंकी मॉड्यूल की ओर इशारा करता है।
“तालिबान-स्टाइल” क्लासरूम का क्या मतलब?
सूत्रों के अनुसार, उमर उन नबी और अन्य आरोपी इसमें ऐसे क्लासरूम संचालन में शामिल थे जहाँ –
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छात्रों पर धर्म-आधारित कट्टर विचारधारा थोपने की कोशिश की गई थी।
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पाठ्यक्रम का दायरा सीमित होकर राजनीतिक-विध्वंसक संदेशों की ओर झुका हुआ था।
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इनमें “प्रशिक्षण केंद्र” की तरह आतंकवादी दिशा-निर्देश देने वाला माहौल था, जिसे शिक्षण संस्थान का पर्दा देकर चलाया गया।
यह सब उस कथित व्यवस्था का हिस्सा बताया गया है जिसे “तालिबान-स्टाइल” कहकर वर्णित किया गया है—जहाँ शिक्षण के बहाने कट्टरवाद और हिंसा के विचार प्रोन्नत किए जा रहे थे।
यूनिवर्सिटी का ढांचा और आरोपों का संबंध
अल-फलाह यूनिवर्सिटी को 1997 में एक इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में शुरू किया गया था और बाद में इसे यूजीसी-मान्यता प्राप्त निजी विश्वविद्यालय में बदला गया।
यूनिवर्सिटी के भीतर मेडिकल कॉलेज भी संचालित है, जहाँ एमबीबीएस और एमडी पाठ्यक्रम चल रहे हैं।
जांच के दौरान यह सामने आया है कि आरोपी प्रोफेसरों में से कुछ ही यूनिवर्सिटी-संबद्ध थे। लेकिन आरोप हैं कि इनका नेटवर्क संस्थान के भीतर सक्रिय था।
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दावा किया है कि इन आरोपियों से उनका संबंध केवल “आधिकारिक ड्यूटी तक” सीमित था।
जांच एजेंसियों ने क्या पाया है?
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इस आतंकी मॉड्यूल की जड़ें सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं। जानकारी मिल रही है कि तुर्की में बैठे एक हैंडलर उकासा ने इस साजिश को दिशा दी थी।
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पुलिस और केन्द्रीय एजेंसियाँ फिलहाल यूनिवर्सिटी परिसर में सक्रिय हैं और संदिग्धों से पूछताछ जारी है।
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छात्रों एवं अभिभावकों में भय और असमंजस का माहौल है—कई छात्र शिक्षा छोड़ने तक पर विचार कर रहे हैं।
छात्र-परिसर में लीक हुआ माहौल
यूनिवर्सिटी में “तालिबान-स्टाइल” क्लासरूम संबंधी झलकियाँ इस तरह सामने आई हैं:
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मासूम छात्रों को धर्म-राजनीति-सैन्य विचारों के बीच खड़ा करना।
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चिकित्सकीय या इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में पाठ्य सामग्री के नाम पर कट्टर विचारधारा का अंतर्वेश।
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शिक्षण की आड़ में बाहरी नेटवर्क के एजेंडा को शिक्षण केंद्रों तक पहुँचाना।
ऐसे माहौल ने पारंपरिक शैक्षणिक व्यवस्था को चुनौती दी है और अनेक छात्र-परिवारों में भरोसे का संकट खड़ा किया है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया और लड़खड़ाती प्रतिष्ठा
यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा है कि उन्होंने घटना के तुरंत बाद मामले की गम्भीरता समझी है और पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं।
फिर भी, इन विवादों ने इस संस्थान की प्रतिष्ठा पर बड़ा धब्बा लगाया है। प्राइवेट मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में नामांकन घटने की संभावना जताई जा रही है।
आगे क्या होगा?
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जांच एजेंसियाँ पहले चरण की कार्रवाई पूरी कर चुकी हैं, अब आगे विस्तृत आर्थिक, नेटवर्क-संबंधी और कट्टरवाद-संबंधी पड़ताल जारी रहेगी।
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ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की सख्त निगरानी और रेगुलेशन की आवश्यकता सामने आई है, खासकर निजी विश्वविद्यालयों में।
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छात्रों, अभिभावकों एवं शिक्षण संस्थानों को चेतना बढ़ानी होगी कि शिक्षा का इस्तेमाल किसी भी राजनीतिक या हिंसात्मक एजेंडा के लिए न हो।
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सरकार-उच्च शिक्षा नियामक निकायों को इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए नई नीतियाँ बनानी होंगी, ताकि शिक्षा-क्षेत्र में आतंकवाद-प्रवृत्तियों को जगह न मिले।
निष्कर्ष:
यह मामला सिर्फ एक गाँव-उच्च शिक्षा संस्थान का विवाद नहीं, बल्कि समूची शिक्षा व्यवस्था के भीतर संभावित अंधाधुंध कट्टरवाद प्रविष्टि का संकेत है। जहाँ एक ओर शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान एवं चरित्र निर्माण होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर इस प्रकार की घटनाएँ हमें यह सचेत करती हैं कि किस तरह शिक्षा-संस्थान भी रणनीतिक रूप से दुरुपयोग हो सकते हैं। अल-फलाह यूनिवर्सिटी का यह खुलासा हमें याद दिलाता है कि शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक-मानवीय जिम्मेदारी भी है।
