“13 थे, 13 हैं और 13 ही रहेंगे”: नए अखाड़ों के गठन पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का स्पष्ट रुख
संवाददाता : अभिषेक त्रिवेदी
प्राचीन सनातन परंपराओं की रक्षा के लिए परिषद ने जताई प्रतिबद्धता
अनूपपुर। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने नए अखाड़ों के गठन को लेकर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि परिषद की सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा में किसी 14वें अखाड़े को शामिल नहीं किया जाएगा। परिषद के संपर्क प्रमुख, राष्ट्रीय मीडिया संयोजक एवं श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन के महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर दास जी महाराज ने इस संबंध में दोटूक बयान जारी किया है।
उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का स्वरूप प्राचीन संत परंपराओं और हमारे महापुरुषों द्वारा स्थापित 13 अखाड़ों की व्यवस्था पर आधारित है। इस परंपरा में किसी प्रकार का परिवर्तन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
संगठन बनाने की स्वतंत्रता, लेकिन परिषद की परंपरा में बदलाव नहीं
महाराज श्री करौली शंकर दास जी महाराज ने कहा कि भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक वर्ग और समाज को अपना संगठन, संस्था, परिषद या अखाड़ा बनाने का संवैधानिक अधिकार है। किसी भी नए सामाजिक या धार्मिक संगठन के गठन पर परिषद को कोई आपत्ति नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किन्नर अखाड़ा, वाल्मीकि अखाड़ा या अन्य सामाजिक अखाड़े अपने स्तर पर कार्य कर सकते हैं और उन्हें संरक्षण भी प्राप्त हो सकता है, लेकिन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की ऐतिहासिक व्यवस्था में केवल 13 पारंपरिक अखाड़ों को ही मान्यता प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि हमारे महापुरुषों द्वारा स्थापित इस महान सनातन परंपरा को न बिखरने दिया जाएगा और न ही कमजोर होने दिया जाएगा। सभी 13 अखाड़े इस विषय पर पूरी तरह एकजुट हैं।
14वें अखाड़े के प्रवेश को नहीं मिलेगी स्वीकृति
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद केवल इन्हीं 13 पारंपरिक अखाड़ों का प्रतिनिधित्व करती है। महाराज श्री ने कहा कि परिषद के मूल ढांचे में किसी भी 14वें अखाड़े को स्थान नहीं दिया जा सकता।
उन्होंने कहा कि अखाड़ों की व्यवस्था केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपरा, अनुशासन और संत समाज की एक विशेष व्यवस्था है। इसमें बदलाव के लिए सभी 13 अखाड़ों की सर्वसम्मति आवश्यक होगी।
कुंभ मेलों की व्यवस्थाएं प्राचीन परंपराओं पर आधारित
महाराज श्री ने कहा कि महाकुंभ, अर्धकुंभ और उत्तराखंड में आयोजित होने वाले कुंभ मेलों में अमृत स्नान, अखाड़ों के क्रम और अन्य व्यवस्थाएं प्राचीन परंपराओं एवं आपसी सहमति के आधार पर संचालित होती हैं।
उन्होंने बताया कि इन व्यवस्थाओं का उल्लेख शासन-प्रशासन के दस्तावेजों में भी दर्ज है। इसलिए इनमें किसी प्रकार के भ्रम या अचानक बदलाव की कोई संभावना नहीं है।
उन्होंने कहा कि कुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों की गरिमा और व्यवस्था इन 13 अखाड़ों की सहभागिता और अनुशासन से ही बनी हुई है।
भविष्य में भी निर्णय 13 अखाड़ों की सहमति से ही होंगे
महाराज श्री ने कहा कि परिषद किसी नई परंपरा की शुरुआत नहीं कर रही है। यदि भविष्य में समय और परिस्थितियों के अनुसार किसी विषय पर विचार-विमर्श की आवश्यकता पड़ती है, तो वह केवल 13 अखाड़ों की सर्वसम्मति से ही संभव होगा।
उन्होंने कहा कि अखाड़ों की ऐतिहासिक व्यवस्था और संत समाज की एकता को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। प्राचीन परंपराओं की मर्यादा और सम्मान सर्वोपरि है।
संत समाज से संयम और मर्यादा बनाए रखने की अपील
महाराज श्री ने सभी संतों से अपील करते हुए कहा कि किसी भी विषय पर वक्तव्य देते समय संयम और मर्यादा का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी संत पूजनीय हैं, लेकिन सनातन परंपराओं की रक्षा करना संत समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि भ्रम फैलाने से किसी का हित नहीं होगा। आवश्यकता है कि सभी लोग परंपराओं का सम्मान करते हुए आपसी सद्भाव बनाए रखें।
13 अखाड़ों की परंपरा रहेगी कायम
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने दोहराया कि 13 अखाड़ों की परंपरा और व्यवस्था भविष्य में भी यथावत बनी रहेगी। परिषद का उद्देश्य सनातन परंपराओं, संत समाज की एकता और कुंभ जैसी धार्मिक व्यवस्थाओं की गरिमा को सुरक्षित रखना है।
उक्त जानकारी करौली शंकर महादेव धाम से जुड़े शंकर सेना के जिला अध्यक्ष राजेश सिंह ने दी।
