अहिंसा कटघरे में है या हमारी समझ? मोरपंख विवाद पर डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ का विस्तृत विचार। जानिए जैन समाज की अहिंसा परंपरा, मोरपंख का सत्य और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा पूरा पक्ष।
अहिंसा कटघरे में है या हमारी समझ? मोरपंख विवाद पर जैन समाज की पीड़ा और सत्य की पुकार
रिपोर्ट: डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’
राष्ट्रीय गौरव शास्त्री, जैन दर्शन ज्योतिष
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी, अखिल भारतीय जैन पत्र संपादक संघ
संगठन मंत्री, जैन राजनैतिक चेतना मंच (म.प्र.)
भ्रमणभाष: 9407222244
भारत की आत्मा और अहिंसा
अहिंसा कटघरे में है या हमारी समझ, यह प्रश्न आज केवल जैन समाज का नहीं बल्कि पूरे भारतीय समाज के सामने खड़ा दिखाई देता है।भारत की मिट्टी में ऐसी सुगंध है जो केवल खेतों और वनों से नहीं आती, बल्कि संतों की तपस्या, ऋषियों की वाणी और करोड़ों लोगों की करुणा से उत्पन्न होती है। यह वही भारत है जहाँ भगवान महावीर ने प्रत्येक जीव के जीवन के अधिकार की बात कही और जहाँ श्रीकृष्ण ने अपने मुकुट पर मोरपंख धारण कर प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य का संदेश दिया।आज जब मोरपंख को लेकर विवाद खड़ा किया गया है, तब करोड़ों लोगों के मन में अनेक प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
मोरपंख विवाद क्यों बना चर्चा का विषय?
हाल ही में मोरपंख के उपयोग को लेकर कुछ ऐसे वक्तव्य सामने आए जिन्होंने देशभर के जैन समाज को आहत किया। विवाद का केंद्र यह आरोप रहा कि मोरपंखों के पीछे हिंसा हो सकती है।प्रश्न पूछना किसी भी लोकतांत्रिक और बौद्धिक समाज की पहचान है। लेकिन जब किसी प्राचीन परंपरा पर बिना पर्याप्त अध्ययन और प्रमाण के संदेह किया जाता है, तब उससे भावनात्मक और सामाजिक दोनों स्तरों पर प्रभाव पड़ता है।जैन समाज का कहना है कि यदि किसी विषय पर चर्चा करनी है तो वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।
जैन समाज की अहिंसा परंपरा
जैन धर्म का मूल आधार ही अहिंसा है।भगवान महावीर का संदेश था:
“सभी जीव जीना चाहते हैं, कोई भी पीड़ा नहीं चाहता।”
इसी सिद्धांत को जीवन में उतारने के लिए जैन साधु-साध्वी अत्यंत सावधानी के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।उनकी दिनचर्या में भी अहिंसा का विशेष महत्व है:
- चलते समय भूमि को देखकर चलना
- सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना
- अनावश्यक हिंसा से बचना
- संयम और करुणा का पालन करना
- जीव मात्र के प्रति दया रखना
ऐसे समाज पर हिंसा का आरोप लगना स्वाभाविक रूप से पीड़ादायक माना जा रहा है।
पिच्छिका और मोरपंख का वास्तविक सत्य
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पिच्छिका से जुड़ा है।जैन मुनियों द्वारा उपयोग की जाने वाली पिच्छिका में सामान्यतः वे मोरपंख प्रयुक्त होते हैं जो मोर प्राकृतिक रूप से समय आने पर स्वयं छोड़ देता है।जानकारों के अनुसार:
- मोर प्रतिवर्ष स्वाभाविक रूप से अपने पंख त्यागता है।
- गिरे हुए पंखों को एकत्र किया जाता है।
- हिंसक तरीके से निकाले गए पंख पिच्छिका के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते।
- राष्ट्रीय पक्षी मोर की सुरक्षा भारतीय कानूनों द्वारा भी सुनिश्चित की गई है।
यही कारण है कि जैन समाज का एक बड़ा वर्ग इस विषय पर तथ्य आधारित चर्चा की मांग कर रहा है।
करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएँ क्यों आहत हुईं?
यह विवाद केवल मोरपंख तक सीमित नहीं है।यह करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और जीवन मूल्यों से जुड़ा विषय बन गया है।जब किसी समाज की पहचान ही अहिंसा से हो और उसी पर हिंसा का संकेत किया जाए, तब लोग इसे अपनी आध्यात्मिक परंपरा पर प्रश्नचिह्न के रूप में देखते हैं।यही कारण है कि देशभर में अनेक लोगों ने इस विषय पर अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं।
संवाद बनाम आरोप
समाज के अनेक विद्वानों का मत है कि ऐसे विषयों का समाधान संवाद से ही संभव है।यदि किसी पक्ष को संदेह है तो निम्न लोगों की उपस्थिति में चर्चा हो सकती है:
- जैन आचार्य
- जैन मुनि
- धर्मशास्त्र विशेषज्ञ
- वन्यजीव विशेषज्ञ
- पर्यावरणविद्
- सामाजिक प्रतिनिधि
तथ्यों पर आधारित संवाद समाज को जोड़ता है जबकि आरोप समाज में दूरी पैदा करते हैं।
क्या अहिंसा कटघरे में है या हमारी समझ?
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वास्तव में अहिंसा कटघरे में है?या फिर हमारी समझ, हमारी जानकारी और हमारे निष्कर्ष कटघरे में हैं?यदि किसी विषय का अध्ययन किए बिना निष्कर्ष निकाल लिए जाएँ तो भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है।भारत की सभ्यता हमेशा संवाद, सत्य और सहिष्णुता की पक्षधर रही है। यही परंपरा आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम किसी भी विषय को तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर समझें।
निष्कर्ष
डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय का विरोध नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाना है।वे मानते हैं कि:
- सत्य को प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
- संवाद का मार्ग हमेशा खुला रहना चाहिए।
- श्रद्धा और संवेदनाओं का सम्मान होना चाहिए।
- अहिंसा की परंपरा को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
अंततः समाज तलवार से नहीं, विश्वास से चलता है। और विश्वास तभी जीवित रहता है जब उसके साथ सत्य, सम्मान और संवेदना खड़ी हो।प्रश्न आज भी वही है — “अहिंसा कटघरे में है या हमारी समझ?”



