आचार्य विशुद्धसागर जी की देशना में धर्म, पुण्य, योग्यता और सल्लेखना का मर्म बताया। जानिए पुण्य बढ़ाने के 6 सूत्र और मृत्यु को महोपकारी क्यों कहा।
आचार्य विशुद्धसागर जी की प्रेरक देशना: “धर्म सर्वश्रेष्ठ है, धर्म ही सुख-शांति का आधार है”
रिपोर्टर — राजेश जैन दद्दू, इंदौर
स्थान — श्री ऋषभोदय तीर्थ क्षेत्र, ऋषभ विहार, दिल्ली
नई दिल्ली। आचार्य विशुद्धसागर जी की देशना में धर्म, पुण्य, योग्यता और सल्लेखना के गूढ़ मर्म को सरल शब्दों में समझाया गया। दिल्ली स्थित श्री ऋषभोदय तीर्थ क्षेत्र, ऋषभ विहार में विराजित दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक महामहिम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने 22 अगस्त 2026 की धर्मसभा में सारगर्भित प्रवचन दिया।धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आज की मंगल देशना में गुरुदेव ने जीवन में धर्म के महत्व के साथ पुण्य बढ़ाने, योग्यता प्राप्त करने और सल्लेखना के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला।
आचार्य विशुद्धसागर जी की देशना: धर्म सर्वश्रेष्ठ है
गुरुदेव ने कहा, “धर्म सर्वश्रेष्ठ है। धर्म सुख का साधन है। धर्म ही मंगल है, धर्म ही उत्तम है, धर्म ही शरण है। धर्म ही सुख-शांति का आधार है। धर्म ही सद्गति का साधन है।”उन्होंने कहा कि संसार में सुख-शांति पाना है तो धर्म के मार्ग पर चलना ही एकमात्र उपाय है। धर्म मनुष्य को सद्गति की ओर ले जाने के साथ उसके जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
पुण्य कैसे बढ़ाएं? बताए छह सूत्र
आचार्य विशुद्धसागर जी की देशना में पुण्य की महिमा बताते हुए गुरुदेव ने कहा, “पुण्य महाशक्ति है। पुण्य-बल महाबल है। पुण्य वरदान है। पुण्य कामधेनु गाय है। पुण्य कल्पवृक्ष के समान उपकारी है।”मानव को पुण्य बढ़ाने के लिए गुरुदेव ने छह सूत्र बताए—
- भगवान की भक्ति करना चाहिए।
- सच्चे गुरुओं की सेवा करो।
- सद्-साहित्य का अध्ययन करो।
- प्राणियों पर दया-करुणा करो।
- सत्य-अहिंसा पूर्वक जीवन यापन करो।
- मुनियों और तपस्वियों को आहार-औषधि दान करो।
योग्यता बढ़ाओ, सफलता पाओ
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति को अपनी योग्यताएं बढ़ाना चाहिए। “जो योग्य होता है, उसे योग्य-पद समय पर स्वयमेव ही प्राप्त हो जाता है। योग्यता जहां होती है, वहां सफलताएं शीघ्र ही फलित होती हैं।”उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि योग्य व्यक्ति को ही योग्य-पद प्रदान करना चाहिए। अयोग्य व्यक्ति को उच्च-पद नहीं देना चाहिए। अयोग्य व्यक्ति को उच्च-पद प्राप्त हो भी जाए तो वह छीन लिया जाता है। इसलिए सफलता पाना है तो योग्यता प्राप्त करो। योग्यता ही उच्चता प्रदान करती है।
सल्लेखना-मृत्यु को बताया महोत्सव
आचार्य विशुद्धसागर जी की देशना में सल्लेखना के मर्म को स्पष्ट करते हुए गुरुदेव ने कहा कि जगत में लोग कषाय के वश होकर कोई विष सेवन करके, कोई पानी में डूबकर और कोई फांसी लगाकर मरता है, ये सब मरण अपघात हैं, आत्महत्या हैं।गुरुदेव ने कहा, “जीवन के अंत में, आत्म-कल्याण की भावना पूर्वक, उपसर्ग आने पर, जिसका उपचार न हो सके ऐसा रोग होने पर, अकाल पड़ने पर, अन्य कोई मृत्यु का कारण उपस्थित होने पर जो सल्लेखनापूर्वक प्राणों का त्याग किया जाता है, वह समाधि है।”उन्होंने कहा कि जैन धर्म जहां जन्म पर महोत्सव मनाता है, वहीं मृत्यु अर्थात सल्लेखना समाधि को भी महोत्सव के रूप में मनाता है।
मृत्यु महोपकारी, आत्मा की मृत्यु नहीं होती
गुरुदेव ने कहा कि मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए। “मृत्यु महा-उपकारी होती है। मृत्यु के उपरांत नवीन शरीर प्राप्त होता है। आत्मा की मृत्यु नहीं होती है। मृत्यु मात्र भव परिवर्तन है, देह परिवर्तन है।”जैसे व्यक्ति जीर्ण-शीर्ण पुराने वस्त्रों को नवीन वस्त्र प्राप्त होने पर प्रसन्नतापूर्वक छोड़ देता है, उसी प्रकार धर्मात्मा, सज्जन और साधु-जन जीवन के अंत समय में देह को प्रसन्नतापूर्वक छोड़ देते हैं। मृत्यु महा-उपकारी है, क्योंकि वह नवीन भव प्रदान करती है।अंत में गुरुदेव ने कहा, “जहां गुरु का पादमूल हो, गुरुवाणी झिर रही हो, प्रभु का बिम्ब हो, सिद्धान्त शास्त्र हों, यतियों का समूह हो, वहां यदि मृत्यु होती है तो भव्य जीव की उत्तम गति होती है।”
गुरुवाणी के 4 सूत्र
धर्म: धर्म ही मंगल, उत्तम और शरण है।
पुण्य: भक्ति, गुरु सेवा, स्वाध्याय, दया और दान से पुण्य बढ़ता है।
योग्यता: योग्यता से ही पद और सफलता स्थायी होती है।
समाधि: गुरु सानिध्य में सल्लेखना मृत्यु भी महोत्सव बन जाती है।
नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु
