पंचेन्द्रिय विषयों की आसक्ति छोड़ ज्ञान को आचरण में उतारें: आचार्यश्री उदारसागर
ज्ञान मार्ग दिखाता है, आचरण उस पर चलना सिखाता है
मनोज जैन नायक
मुरैना परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज और मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मिला है। इसके बावजूद मनुष्य पंचेन्द्रिय विषयों की आसक्ति में उलझकर जीवन के मूल उद्देश्य से दूर होता जाता है। आंखों को मनपसंद दृश्य, कानों को मधुर शब्द, जीभ को स्वाद और शरीर को अनुकूल स्पर्श चाहिए। इन विषयों में सुख खोजते हुए मनुष्य यह भूल जाता है कि इन्द्रियों से मिलने वाला सुख क्षणिक है, जबकि आत्मा का सुख स्थायी है।
ज्ञान तभी सार्थक, जब व्यवहार में दिखे
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि केवल ज्ञान अर्जित कर लेना जीवन के कल्याण के लिए पर्याप्त नहीं है। उस ज्ञान को अपने आचरण में उतारना भी आवश्यक है। शास्त्रों का अध्ययन करना और धर्म तथा सदाचार की बातें कहना तभी सार्थक है, जब उनका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार, सोच और जीवनशैली में दिखाई दे। ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को सही मार्ग का बोध कराना है, जबकि आचरण उस मार्ग पर चलने का पुरुषार्थ सिखाता है।
उन्होंने पंडित बनारसीदास जी के भावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जो व्यक्ति क्रिया और आचरण के बिना केवल ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, वह मूर्खों का शिरोमणि है। ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी यदि जीवन में बदलाव न आए और राग-द्वेष तथा विषयों के प्रति आसक्ति पहले जैसी बनी रहे, तो उस ज्ञान की सार्थकता अधूरी रह जाती है। व्यक्ति के भीतर विनम्रता, संयम और आत्मचिंतन का भाव जागना चाहिए। ज्ञान का प्रभाव उसके व्यवहार में दिखाई देना ही उसकी सच्ची उपयोगिता है।
ज्ञान और आचरण एक-दूसरे के पूरक
मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि ज्ञान और आचरण एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्ञान व्यक्ति को सही और गलत का बोध कराता है, जबकि सदाचरण उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। केवल ज्ञान का संग्रह कर लेना पर्याप्त नहीं; उसके अनुरूप जीवन जीना भी जरूरी है। ज्ञान के बिना आचरण दिशाहीन हो सकता है और आचरण के बिना ज्ञान पुस्तकीय जानकारी बनकर रह जाता है। इसलिए दोनों का समन्वय जीवन में आवश्यक है।
दोनों संतों ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि केवल धार्मिक क्रियाएं करना, पूजा-पाठ में शामिल होना या अनुष्ठान करना ही धर्म का पूरा अर्थ नहीं है। इन क्रियाओं के पीछे सम्यग्ज्ञान और निर्मल भावना भी होनी चाहिए। धर्म का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में विनम्रता, क्षमा, करुणा, संयम और सदाचार के रूप में दिखना चाहिए। धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के बाद भी यदि व्यवहार में कोई परिवर्तन न आए, तो व्यक्ति को आत्मचिंतन कर अपने जीवन का मूल्यांकन करना चाहिए।
इच्छाओं का कोई अंत नहीं
मुनिश्री ने कहा कि पंचेन्द्रियों के विषय मनुष्य को बार-बार आकर्षित करते हैं। इच्छाओं की पूर्ति में लगा व्यक्ति यह भूल जाता है कि इच्छाओं का अंत नहीं होता। एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है और मनुष्य लगातार बाहरी सुखों के पीछे दौड़ता रहता है। ऐसे में वह आत्मिक शांति और आत्मकल्याण के उद्देश्य से दूर हो सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि वास्तविक सुख बाहरी विषयों में नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आत्मचिंतन और मन की शांति में निहित है। व्यक्ति को दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने दोषों को पहचानने और उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। आत्मनिरीक्षण से व्यक्ति अपने व्यवहार की कमियों को समझ सकता है और उनमें सुधार की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
संयम और सदाचार से आत्मकल्याण का मार्ग
आचार्यश्री ने कहा कि सम्यग्ज्ञान के साथ किया गया आचरण आत्मा की शुद्धि की ओर ले जाता है। मनुष्य को केवल विद्वान बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए, बल्कि ज्ञान को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। ज्ञान दिशा दिखाता है और आचरण उस दिशा में आगे बढ़ने का पुरुषार्थ कराता है। इसलिए ज्ञान, संयम और सदाचार को जीवन में साथ लेकर चलना जरूरी है।
दोनों संतों ने श्रद्धालुओं से कहा कि भौतिक सुखों के पीछे भागते रहने से आत्मिक सुख प्राप्त नहीं होता। आत्मिक उन्नति के लिए विषयों के प्रति आसक्ति कम करना, मन पर नियंत्रण रखना और अपने व्यवहार में धर्म के सिद्धांतों को अपनाना आवश्यक है। संयम और सदाचार का अभ्यास व्यक्ति को आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करता है।
धर्मसभा के प्रवचन का सार यही रहा कि ज्ञान मार्ग दिखाता है और आचरण उस मार्ग पर चलना सिखाता है। ज्ञान को केवल स्मृति या पुस्तकों तक सीमित न रखकर जीवन और व्यवहार में उतारना ही सच्ची ज्ञान-साधना है। श्रद्धालुओं को प्रेरित किया गया कि वे पंचेन्द्रिय विषयों की आसक्ति से बचें, आत्मचिंतन करें और ज्ञान के अनुरूप आचरण करते हुए आत्मिक उन्नति की दिशा में प्रयास करें।
