मर्यादा भंग से आचार्य श्री समय सागर जी हुए उपवासरत
धर्म समाज में चिंता बढ़ी—राजेश जैन दद्दू बोले, “समाज जन कब सुधरेंगे?”
इंदौर/जबलपुर। जैन संतों की मर्यादा और अनुशासन का पालन करना श्रावकों का प्रथम कर्तव्य माना गया है, लेकिन जब भक्तिभाव में मर्यादाएँ टूटीं तो परिणाम अत्यंत गंभीर रहा। वर्तमान नवाचार्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज इन दिनों संघ सहित जबलपुर में विराजमान हैं। सोमवार की आहार चर्या के दौरान ऐसी स्थिति बनी कि आचार्य श्री को अपनी अंजुली त्यागकर उपवास करना पड़ा। समाजजन में इस घटना ने गहरी चिंता उत्पन्न कर दी है।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने घटना पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि “समाज जन कब सुधरेंगे? मर्यादाओं की ऐसी उपेक्षा अत्यंत दुःखद है।” उन्होंने स्पष्ट कहा कि श्रावकों द्वारा की गई इस अव्यवस्था ने न केवल आचार्य श्री की आहार चर्या में बाधा डाली, बल्कि जैन मर्यादा के गंभीर उल्लंघन का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
कैसे टूटी मर्यादा?—घटना का पूरा विवरण
दद्दू के अनुसार, जिस चौंके में आचार्य श्री का पड़गाहन हो रहा था, वहाँ के श्रावकों ने तो पूर्ण विनम्रता से व्यवस्था निभाई, लेकिन अनावश्यक रूप से 10–20 अतिरिक्त लोग भी चौंके में घुसकर फेरी लगाने लगे। यह भीड़ भक्तिभाव में इतनी डूबी हुई थी कि आचार्य श्री की रोकने वाली हाथ की संकेत भाषा को भी किसी ने नहीं समझा।
- कई लोग बिना अनुमति सीधे चौंके में बैठ गए
- 50 से अधिक लोग चौंके के भीतर अनावश्यक रूप से ठहरे रहे
- कुछ बाहरी लोग अपने नहीं, दूसरे के चौंके में थाली लेकर खड़े हो गए
- आग्रह करने पर भी लोग यह कहकर नहीं हटे कि “हम यहीं के ही हैं”
- झूठ बोलने तक की नौबत आ गई, जिससे शुद्धि में स्पष्ट दोष लगा
आचार्य श्री ने जब यह स्थिति देखी तो उन्होंने अंजुली छोड़ दी और चौंके में प्रवेश किए बिना ही मंदिर लौटकर उपवास धारण कर लिया।
यह दृश्य श्रावकों के लिए अत्यंत शर्मनाक तथा आत्ममंथन का विषय बन गया है।
आचार्य श्री समय सागर जी की मंगलदेशना—मर्यादा पालन पर स्पष्ट निर्देश
घटना के अगले दिन आचार्य श्री ने अपनी मंगल देशना में गहरी चिंता जताते हुए समाज को स्पष्ट संदेश दिया:
प्रत्येक चौंका अपनी-अपनी मर्यादा से संचालित हो
अर्थात, एक चौंके की पूजा-विधि में दूसरे चौंके के लोग हस्तक्षेप न करें।
जिस चौंके का पड़गाहन हो, उसी चौंके के श्रावक फेरी लगाएं
अन्य लोग केवल दर्शक बने रहें, व्यवस्था में बाधक न बनें।
पड़गाहन के समय 40–50 लोगों का चौंके में बैठ जाना अनुचित
यह न केवल अनुशासनहीनता है, बल्कि साधु-संघ को बाधित करता है।
बाहरी व्यक्तियों का दूसरे के चोके में जाकर थाली लेकर खड़े होना मर्यादा भंग
यह गंभीर दोष है जिससे शुद्धि प्रभावित होती है।
झूठ बोलकर चौंके में ठहरने की प्रवृत्ति छोड़ें
यह मन-शुद्धि व वचन-शुद्धि दोनों का उल्लंघन है।
आचार्य श्री ने कहा—
“श्रावक मुख से मन-शुद्धि, वचन-शुद्धि, काय-शुद्धि की बात तो करते हैं, पर आचरण में उसका पालन नहीं कर पाते। ऐसे व्यवहार से साधु-संघ को अनावश्यक अंतराय लगता है।”
राजेश जैन दद्दू का समाज से भावपूर्ण आह्वान
राजेश जैन दद्दू ने समाज जन को संबोधित करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि जैन श्रावक आत्मचिंतन करें और मर्यादाओं के पालन में कठोरता बरतें। उन्होंने कहा—
- भक्ति जितनी महत्वपूर्ण है, अनुशासन उतना ही अनिवार्य
- साधु-संघ की शांति और साधना में बाधा नहीं आनी चाहिए
- जैन मर्यादा विश्वभर में अपनी पवित्रता के लिए जानी जाती है
- इसकी रक्षा करना हर श्रावक का कर्तव्य है
उन्होंने विनम्र आग्रह किया कि
“नमोस्तु शासन जयवंत हो”
सिर्फ एक उद्घोष नहीं, बल्कि मर्यादा और अनुशासन की जीवंत अभिव्यक्ति बने।
