धम्मो मंगलमुक्किट्ठं
आचार्य श्री १०८ वर्धमान सागर जी महाराज : कुन्दकुन्द परम्परा की आलोकधारा में तप, त्याग और समाधि की अमर साधना
डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’ चन्देरी
राष्ट्रीय गौरव शास्त्री, जैन दर्शन, ज्योतिष एवं स्वतंत्र विचारक
भ्रमणभाष: ९४०७२२२२४४
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसंति, जस्स धम्मे सया मणो॥
भारतीय अध्यात्म की अनादि परम्परा में समय-समय पर ऐसे महापुरुष अवतरित होते हैं, जिनका जीवन केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युगों तक मानवता का पथ आलोकित करता है। उनका तप इतिहास बनता है, त्याग संस्कृति बनता है और संयम आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाता है। दिगम्बर जैन परम्परा के पूज्य आचार्य श्री १०८ वर्धमान सागर जी महाराज ऐसे ही विरल संत थे, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन आत्मकल्याण, धर्मप्रभावना, शास्त्राध्ययन, तप, त्याग और वीतराग साधना के लिए समर्पित कर दिया।
जैन दर्शन के महान दार्शनिक आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने समयसार में आत्मा को समस्त साधना का केन्द्र बताया है। उनका संदेश है कि जो आत्मा को जान लेता है, वही समस्त तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है। बाह्य जगत परिवर्तनशील है, किन्तु आत्मा अनादि-अनन्त और शाश्वत है। यही दिव्य दर्शन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के जीवन में साकार दिखाई देता था। उनका प्रत्येक प्रवचन साधकों को बाहरी संसार से अधिकमें अपने भीतर उतरने की प्रेरणा देता था।

“अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो॥”
अर्थात् सबसे कठिन विजय स्वयं पर विजय प्राप्त करना है। आचार्य श्री ने इसी आत्मविजय को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उनका संयम केवल बाह्य नियमों तक सीमित नहीं था, बल्कि मन, वचन और काया की निर्मल साधना का जीवंत स्वरूप था।
उनकी वाणी में आगमों का तेज था, किन्तु उसमें करुणा की मधुरता भी थी। वे धर्म को केवल पूजा-पाठ अथवा अनुष्ठानों तक सीमित नहीं मानते थे। उनका स्पष्ट संदेश था कि यदि अहिंसा व्यवहार में नहीं उतरी, यदि क्षमा हृदय में नहीं जागी और यदि अपरिग्रह जीवन में नहीं आया, तो धर्म केवल शब्द बनकर रह जाएगा।
उन्होंने अपने विहारों, प्रवचनों और धर्मप्रभावना के माध्यम से असंख्य लोगों के जीवन में आध्यात्मिक चेतना का दीप प्रज्वलित किया। शास्त्र-अध्ययन, स्वाध्याय, तीर्थभक्ति, चरित्र-निर्माण, आत्मानुशासन और संयम उनके उपदेशों के प्रमुख विषय रहे। उनके सान्निध्य में अनेक लोगों ने व्यसन छोड़े, सदाचार अपनाया और धर्ममय जीवन का संकल्प लिया।
उनका व्यक्तित्व तेजस्विता और विनम्रता का अद्भुत समन्वय था। वे जितने महान विद्वान थे, उतने ही सहज, सरल और आत्मीय भी। उनके समीप आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता था कि सच्चा संत वही है जिसकी कथनी और करनी में पूर्ण एकरूपता हो।
जैन दर्शन का मूल सूत्र है—
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥”
सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—यही मोक्ष का मार्ग है। आचार्य श्री का सम्पूर्ण जीवन इस सूत्र की सजीव व्याख्या था। उन्होंने धर्म को ग्रंथों से निकालकर व्यवहार में उतारा और समाज को यह सिखाया कि आत्मा की शुद्धि ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
समाधि-मरण : तप की पूर्णाहुति
“समयं गोयम! मा पमायए।”
(हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।)
जैन दर्शन में जीवन का सौन्दर्य केवल दीर्घायु में नहीं, बल्कि सम्यक् जीवन में निहित है। जिस प्रकार साधना का प्रत्येक क्षण आत्मा को निर्मल बनाता है, उसी प्रकार जीवन का अंतिम क्षण भी यदि समता, जागरूकता और वीतराग भाव से व्यतीत हो, तो वही समाधि-मरण कहलाता है। यह मृत्यु नहीं, आत्मा की विजय का महापर्व है।
आचार्य श्री १०८ वर्धमान सागर जी महाराज ने अपने सम्पूर्ण जीवन में जिस संयम, तप और आत्मानुशासन का पालन किया, उसी की पूर्णता उनके समाधि-मरण में भी दिखाई दी। उनका अंतिम जीवन-अध्याय भी उतना ही शांत, निर्मल और आध्यात्मिक था, जितना उनका संपूर्ण साधु जीवन।
“धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।”
यह गाथा उनके जीवन का परिचय थी। अहिंसा उनके व्यवहार में थी, संयम उनके व्यक्तित्व में था और तप उनकी प्रत्येक श्वास में था। उन्होंने धर्म को कभी प्रदर्शन का विषय नहीं बनाया; उनके लिए धर्म आत्मा की शुद्धि का विज्ञान था।
आज जब संसार भौतिक उपलब्धियों को सफलता का मानदण्ड मानता है, तब आचार्य श्री का जीवन यह स्मरण कराता है कि सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं पर विजय है। जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया। जिसने इच्छाओं को सीमित कर लिया, उसने अनन्त शांति को प्राप्त कर लिया।
उनका समाधि-मरण हमें यह संदेश देता है कि मृत्यु भय का विषय नहीं, यदि जीवन साधना का पर्याय बन जाए। सल्लेखना पलायन नहीं, बल्कि समता का परम उत्सव है। यह शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं; यह देह का विसर्जन है, चेतना का उत्कर्ष है।
आज उनके श्रीचरण भले ही हमारी दृष्टि से ओझल हो गए हों, पर उनका तप, त्याग, ज्ञान और संयम आने वाली पीढ़ियों को निरन्तर प्रेरणा देता रहेगा। संत कभी केवल अपने समय के नहीं होते; वे काल की सीमाओं से परे जाकर युगों के मार्गदर्शक बन जाते हैं।
मेरा सौभाग्य : गुरुवर के सान्निध्य की अविस्मरणीय स्मृतियाँ
मेरे जीवन का यह परम सौभाग्य रहा कि मुझे पूज्य आचार्य श्री १०८ वर्धमान सागर जी महाराज के पावन दर्शन, उनके श्रीमुख से धर्मचर्चा सुनने तथा अनेक अवसरों पर उनके सान्निध्य का लाभ प्राप्त हुआ। विशेष रूप से श्री खंदारजी अतिशय क्षेत्र में उनके ग्रीष्मकालीन प्रवास के दौरान आहारदान का पुण्य प्राप्त होना मेरे जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धियों में से एक है।
उनके समीप बैठकर ऐसा अनुभव होता था मानो आत्मा के भीतर का समस्त विक्षोभ शांत हो गया हो। उनके मुखमण्डल पर तप की आभा थी, वाणी में आगमों की गंभीरता और हृदय में असीम करुणा। वे जितना बोलते थे, उससे कहीं अधिक अपने मौन, अपने तप और अपने चरित्र से शिक्षा देते थे।
आज उनके समाधि-मरण का समाचार सम्पूर्ण जैन समाज के लिए भाव-विह्वल करने वाला है। किन्तु जैन दर्शन हमें सिखाता है कि ऐसे महापुरुषों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि आँसू नहीं, बल्कि उनके आदर्शों का अनुकरण है। यदि हम अहिंसा को व्यवहार बनाएँ, सत्य को वाणी बनाएँ, अपरिग्रह को जीवन बनाएँ और आत्मचिंतन को दैनिक साधना बनाएँ, तभी उनके प्रति हमारी श्रद्धा सार्थक होगी।
हे गुरुवर! आपने हमें सिखाया कि तप ही तेज है, संयम ही शक्ति है और आत्मा ही सत्य है। आपका देहावसान एक युग का अंत नहीं, बल्कि अनन्त प्रेरणा का उदय है। आपकी वीतराग वाणी, आपका तप और आपका आदर्श जैन धर्म के आकाश में ध्रुवतारे की भाँति सदैव प्रकाशमान रहेगा।
णमो अरिहंताणं।
विनयपूर्वक कोटिशः श्रद्धांजलि।
