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धर्म को जानने के साथ जीवन में उतारना भी आवश्यक: आचार्य उदारसागर

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Published On: 28 October 2026
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धर्म को जानने के साथ जीवन में उतारना भी आवश्यक: आचार्य उदारसागर

चारों अनुयोग धर्म के अलग-अलग पक्ष समझाकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं

मनोज जैन नायक

मुरैना बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने कहा कि धर्म को केवल सुनना या उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। धर्म की सार्थकता तब है, जब उसके सिद्धांत जीवन के व्यवहार और आचरण में दिखाई दें। उन्होंने जैन दर्शन के चारों अनुयोगों की महत्ता बताते हुए कहा कि प्रत्येक अनुयोग धर्म के एक विशिष्ट पक्ष को समझाता है और साधक को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आचार्यश्री ने प्रवचन में प्रथमानुयोग और करणानुयोग के बाद चरणानुयोग तथा द्रव्यानुयोग की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि इन चारों अनुयोगों का समन्वित अध्ययन धर्म की व्यापक समझ विकसित करता है। कोई अनुयोग धार्मिक कथाओं के माध्यम से रुचि जगाता है, कोई कर्मसिद्धांत और लोक की रचना को समझने में सहायता करता है, तो कोई आचरण और आत्मस्वरूप के बोध की दिशा दिखाता है। इसलिए साधक को किसी एक अनुयोग तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

चरणानुयोग बताता है श्रेष्ठ आचरण का मार्ग

चरणानुयोग की चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि इसमें गृहस्थ श्रावक धर्म और मुनि धर्म का वर्णन मिलता है। यह अनुयोग बताता है कि जीवन में चारित्र की वृद्धि किस प्रकार की जाए और उसे सुरक्षित रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखा जाए। धर्म के सिद्धांत तभी प्रभावी होते हैं, जब वे मनुष्य के व्यवहार और आचरण में उतरते हैं।

उन्होंने कहा कि संसार और शरीर की अनित्यता को समझकर व्यक्ति को अपने जीवन में संयम, सदाचार और विवेक अपनाना चाहिए। चारित्र केवल कहने-सुनने की बात नहीं है; उसे रोजमर्रा के जीवन में धारण करना आवश्यक है। आचार्यश्री ने श्रोताओं को प्रेरित किया कि वे अपने विचारों, व्यवहार और कर्तव्यों पर ध्यान दें तथा धर्म के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करें।

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सीढ़ी की प्रत्येक पायदान पर कदम रखकर व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंचता है, उसी प्रकार साधक श्रेष्ठ आचरण, संयम और धर्मसाधना के माध्यम से आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है। इस यात्रा में नियमित प्रयास और धैर्य का विशेष महत्व है। एक-एक सद्गुण को जीवन में अपनाने से व्यक्ति के आचरण में परिवर्तन आता है और साधना की दिशा स्पष्ट होती है।

आचार्यश्री ने शास्त्रों के नियमित पठन-पाठन, मनन और चिंतन पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि धार्मिक ग्रंथ व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करते हैं। शास्त्रों में बताए गए सिद्धांतों को समझकर और उनके अनुरूप आचरण करके जीवन में सद्गुणों का विकास किया जा सकता है। अध्ययन का उद्देश्य केवल जानकारी बढ़ाना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना और जीवन को बेहतर बनाना भी है।

द्रव्यानुयोग से आत्मस्वरूप का बोध

uiuiuiuiuiuiद्रव्यानुयोग की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि इसमें सात तत्त्वों और नौ पदार्थों का वर्णन मिलता है। इनके अध्ययन से जीव अपने वास्तविक स्वरूप, कर्मबंधन और मुक्ति के मार्ग को समझने की दिशा में आगे बढ़ता है। द्रव्यानुयोग केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं है; यह आत्मा के स्वरूप को जानने और आत्मानुभूति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि जब मनुष्य आत्मा और शरीर के अंतर को समझने का प्रयास करता है, तब उसके भीतर आत्मचिंतन की भावना जागृत होती है। जैन दर्शन का अध्ययन व्यक्ति को अपने भीतर झांकने, अपने विचारों का परीक्षण करने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार द्रव्यानुयोग आत्मज्ञान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आचार्यश्री के अनुसार, आत्मस्वरूप को समझने के लिए केवल बाहरी विषयों का अध्ययन पर्याप्त नहीं होता। व्यक्ति को अपने विचारों और भावों पर भी ध्यान देना चाहिए। आत्मचिंतन से यह समझने में सहायता मिलती है कि जीवन को किस दिशा में ले जाना है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए कौन-से प्रयास आवश्यक हैं।

चारों अनुयोगों का समन्वित अध्ययन जरूरी

kkkkkkkkkkkkkkkkkkkkचारों अनुयोगों की उपयोगिता को सरल उदाहरण से समझाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जिस प्रकार गाय के चारों स्तनों का दूध उपयोगी होता है, उसी प्रकार जैन धर्म के चारों अनुयोग भी महत्वपूर्ण हैं। किसी एक अनुयोग को समझकर दूसरे अनुयोगों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हर अनुयोग धर्म के अलग-अलग पक्ष को स्पष्ट करता है।

उन्होंने बताया कि प्रथमानुयोग धार्मिक कथाओं और प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से धर्म के प्रति रुचि उत्पन्न करता है। करणानुयोग कर्मसिद्धांत और लोक की संरचना जैसे विषयों को समझने में सहायता करता है। चरणानुयोग धर्माचरण और चारित्र की प्रेरणा देता है, जबकि द्रव्यानुयोग तत्त्वज्ञान तथा आत्मस्वरूप के बोध का मार्ग प्रशस्त करता है। इन चारों का समन्वित अध्ययन साधक को धर्म की व्यापक समझ प्रदान करता है।

आचार्यश्री के प्रवचन का सार यह रहा कि शास्त्रों का अध्ययन तभी सार्थक है, जब उससे जीवन में सदाचार, संयम और आत्मचिंतन की भावना विकसित हो। धर्म को समझने के साथ-साथ उसे आचरण में उतारना ही आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक कदम है।

धर्मसभा के शुभारंभ में श्रीमती गुंजन जैन ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। सभा का संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। इस अवसर पर श्रावक श्रेष्ठियों द्वारा आचार्यश्री अभिनंदन सागरजी महाराज के चित्र का अनावरण किया गया और दीप प्रज्वलन किया गया।

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