2047 में भारत विकसित होगा या नहीं, पता नहीं; आज के गड्ढे जनता को भविष्य जरूर दिखा रहे हैं
विकसित भारत के सपने के साथ वर्तमान की सड़कों की हालत पर भी हो जवाबदेही
भाव लेखक: अंशुल जैन शास्त्री
मुझे दुख केवल सड़क पर गड्ढे देखकर नहीं होता। दुख उस व्यवस्था को देखकर होता है, जो विकसित भारत के सपने दिखाती है, लेकिन नागरिकों की वर्तमान बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाती। देश को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की बात हो रही है। बड़े मंचों से भविष्य की सुंदर तस्वीर प्रस्तुत की जाती है और भाषणों में विकास के नए अध्याय लिखे जाते हैं। लेकिन जब एक सामान्य नागरिक घर से निकलकर सड़क पर सफर करता है, तो उसे विकास की चमकदार तस्वीर नहीं, बल्कि गड्ढों से भरी सच्चाई दिखाई देती है।
सवाल यह नहीं है कि भारत 2047 में कितना विकसित होगा। सवाल यह है कि वर्ष 2026 में एक नागरिक सुरक्षित सड़क पर सफर क्यों नहीं कर सकता? क्या भविष्य का सपना देखने के साथ वर्तमान की परेशानियों को दूर करना भी हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?
सड़क निर्माण के बाद बार-बार खुदाई क्यों?
कहीं सड़क बनने के दो वर्ष बाद ही उखड़ जाती है, कहीं बारिश में बह जाती है, तो कहीं निर्माण के कुछ महीने बाद पाइपलाइन डालने के लिए उसे फिर खोद दिया जाता है। आज सड़क बनती है, कल पानी की पाइपलाइन के लिए खोदी जाती है और परसों गैस लाइन या किसी अन्य काम के नाम पर दोबारा तोड़ दी जाती है। ऐसी स्थिति देखकर लगता है मानो विकास का अर्थ सड़क बनाना नहीं, बल्कि बार-बार सड़क खोदना रह गया हो।
जब एक ही सड़क को बार-बार बनाने और खोदने की नौबत आती है, तो नागरिकों के मन में कई सवाल उठते हैं। सड़क निर्माण से पहले अलग-अलग विभागों के कामों की योजना क्यों नहीं बनाई जाती? विभागों के बीच समन्वय की कमी क्यों रहती है? एक बार सड़क बन जाने के बाद उसकी देखरेख की जिम्मेदारी किसकी है? और यदि निर्माण में लापरवाही होती है, तो जवाबदेही किसकी तय होती है?
इन सवालों का जवाब जरूरी है, क्योंकि सड़क निर्माण केवल एक सरकारी काम नहीं है। यह नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी, सुरक्षा और सार्वजनिक धन से जुड़ा विषय है।
जनता के टैक्स का पैसा और निर्माण की गुणवत्ता
जनता के टैक्स का पैसा कोई मुफ्त की संपत्ति नहीं है। उसमें मजदूर की मेहनत, किसान का पसीना, नौकरीपेशा व्यक्ति की कमाई और आम नागरिक की उम्मीदें शामिल हैं। नागरिक यह अपेक्षा करते हैं कि उनके टैक्स से बनने वाली सड़कें टिकाऊ हों और उनका उपयोग सुरक्षित ढंग से किया जा सके।
यदि सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, तो जांच क्यों नहीं होती? यदि काम में लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही क्यों तय नहीं होती? निर्माण के कुछ समय बाद सड़क खराब हो जाए, तो उसकी मरम्मत और निगरानी की व्यवस्था क्या है? इन सवालों पर स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए। सार्वजनिक धन से किए गए काम की गुणवत्ता की जांच और रखरखाव को गंभीरता से लेना जरूरी है।
गड्ढे बढ़ाते हैं दुर्घटना और परेशानी
सड़क के गड्ढे केवल असुविधा का कारण नहीं होते। वे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ाते हैं, एम्बुलेंस की राह कठिन बनाते हैं और लोगों का समय तथा ईंधन बर्बाद करते हैं। बारिश के दिनों में गड्ढों में पानी भर जाने से उनकी गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से परेशानी पैदा कर सकती है।
हर परिवार चाहता है कि घर से निकला उसका सदस्य सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुंचे और फिर घर लौटे। लेकिन खराब सड़क पर सफर करते समय लोगों के मन में दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी यह चिंता व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल होनी चाहिए। सड़क की समय पर मरम्मत और उचित रखरखाव से ऐसी परेशानियों को कम किया जा सकता है।
अतीत का मूल्यांकन हो, वर्तमान की जिम्मेदारी भी निभे
मुझे दुख तब भी होता है, जब संसद और राजनीतिक मंचों पर बार-बार पूछा जाता है—“पिछले सत्तर वर्षों में क्या हुआ?” इतिहास का हिसाब मांगना और हर सरकार के काम का मूल्यांकन करना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन वर्तमान की जिम्मेदारियों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। अतीत की कमियां गिनाने से वर्तमान की सड़कें अपने आप गड्ढामुक्त नहीं हो जाएंगी।
लोकतंत्र में जनता को केवल सपने देखने का अधिकार नहीं, बल्कि अपने टैक्स के बदले बेहतर सुविधाएं मांगने का भी अधिकार है। चुनाव के समय विकास के वादे किए जाते हैं और भविष्य के भारत की तस्वीर दिखाई जाती है। जनता यह भी पूछेगी कि जिस सड़क से वह आज गुजर रही है, उसकी हालत सुधारने के लिए क्या किया गया।
विकास का मूल्यांकन केवल बड़ी इमारतों, एक्सप्रेसवे और घोषणाओं से नहीं होना चाहिए। उस सामान्य सड़क की स्थिति भी देखी जानी चाहिए, जिस पर रोज हजारों लोग अपने जीवन की यात्रा करते हैं।
विकास के साथ कमियों को स्वीकार करना भी जरूरी

मैं यह नहीं कहता कि देश में विकास नहीं हुआ। मेरा कहना केवल इतना है कि विकास की उपलब्धियों के साथ उसकी कमियों को स्वीकार करना और उन्हें दूर करने का प्रयास करना भी जरूरी है। देश से प्रेम करने का अर्थ हर कमी पर मौन रहना नहीं, बल्कि सुधार की मांग करना है।
सरकार किसी भी दल की हो और प्रधानमंत्री कोई भी हो, उसकी जिम्मेदारी अंततः जनता के प्रति ही होनी चाहिए। नागरिकों को भाषणों से अधिक परिणाम, घोषणाओं से अधिक सुविधाएं और भविष्य के वादों से अधिक वर्तमान में सुरक्षा चाहिए।
अंत में सरकार से मेरा विनम्र निवेदन है—2047 तक विकसित भारत बनाने का सपना अवश्य देखिए, लेकिन उससे पहले आज की सड़कों के गड्ढे भरिए। क्योंकि जिस देश का नागरिक अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहा हो, वहां विकास की चर्चा के साथ सड़क सुरक्षा की चिंता भी उतनी ही जरूरी है।
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